प्रेम नन्दन की पांच कविताएं

 प्रेम नंदन

जन्म - 25 दिसम्बर 1980,को फतेहपुर (उ0प्र0) के फरीदपुर गांव में|

शिक्षा - एम.ए.(हिन्दी)बी.एड.। पत्रकारिता और जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा।

लेखन - कविता, लघुकथाकहानी, आलोचना ।

परिचय - लेखन और आजीविका की शुरुआत पत्रकारिता से। दो-तीन वर्षों तक पत्रकारिता करने तथा तीन-चार वर्षों तक भारतीय रेलवे में स्टेशन मास्टरी  के पश्चात सम्प्रति सिर्फ मास्टरी |

प्रकाशन- 1-यही तो चाहते हैं वे (शीघ्र प्रकाश्य)

2-कवितायेंकहानियां एवं  लघुकथायें एवं आलोचना विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं एवं ब्लॉगों में प्रकाशित।

संपर्क – उत्तरी शकुन नगर, सिविल लाइन्स, फतेहपुर, (उ०प्र०)|

मोबइल – 09336453835

ईमेल - premnandan10@gmail.com

1 - दूषित होती ताजी साँसें

अभी-अभी किशोर हुईं

मेरे गाँव की ताजी साँसें

हो रही हैं दूषित

सूरत, मुम्बई, लुधियाना में...

 

लौट रहीं हैं वे

लथपथ,

बीमारियों से ग्रस्त

दूषित, दुर्गन्धित ।

 

उनके संपर्क से

दूषित हो रही हैं

साफ, ताजी हवाएँ

मेरे गाँव की !

 

2 - आग, पानी और प्यास

 

जब भी लगती है उन्हें प्यास

वे लिखते हैं

खुरदुरे कागज के चिकने चेहरे पर

कुछ बूँद पानी

और धधकने लगती है आग !

 

इसी आग की आँच से

बुझा लेते हैं वे

अपनी हर तरह की प्यास !

 

मदारियों के

आधुनिक संस्करण हैं वे

आग और पानी को

कागज में बाँधकर

जेब में रखना

जानते हैं वे!

 

 

3 - यही तो चाहते हैं वे

 

लड़ना था हमें

भय, भूख, और भृष्टाचार के खिलाफ !

 

हम हो रहे थे एकजुट

आम आदमी के पक्ष में

पर कुछ लोगों को

नहीं था मंजूर यह !

 

उन्होंने फेंके कुछ ऐंठे हुए शब्द

हमारे आसपास

और लड़ने लगे हम

आपस में ही !

 

वे मुस्कुरा रहें हैं दूर खड़े होकर

और हम लड़ रहें हैं लगातार

एक दूसरे से

बिना यह समझे

कि यही तो चाहते हैं वे !

 

4 -निर्जीव होते गांव

 

रो रहे हैं हँसिए

चिल्ला रही हैं खुरपियाँ

फावड़े चीख रहे हैं ।

कुचले जा रहे हैं

हल, जुआ, पाटा,

ट्रैक्टरों के नीचे ।

 

धकेले जा रहे हैं गाय-बैल,

भैंस-भैसे कसाई-घरों में ।

 

धनिया, गाजर , मूली ,  टमाटर ,

आलू, लहसुन ,प्याज, गोभी ,

दूध ,दही, मक्खन, घी ,

भागे जा रहे हैं

मुँह-अँधेरे ही शहर की ओर

और किसानों के बच्चे

ताक रहे हैं इन्हें ललचाई नजरों से !

 

गाँव में

जीने की ख़त्म होती

आशंकाओं से त्रस्त

खेतिहर नौजवान पीढ़ी

खच्चरों की तरह पिसती है 

रात-दिन शहरों में

गालियों की चाबुक सहते हुए ।

 

गाँव की जिंदगी

नीलाम होती जा रही है

शहर के हाथों ;

और धीरे- धीरे ...

निर्जीव होते जा रहे हैं गाँव !

 

 

5 - रिश्ते

 

रिश्ते ,

धूप, बारिश, हवा नहीं होते

फूल, खुशबू, रंग होते हैं,

 

जरूरत होती है -

जिन्हें सहेजने ,

बचाये रखने के लिए

धूप , बारिश , हवा की !

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