बुढ़ापे में पत्नी और पैसा ही काम आते हैं

जयप्रकाश मानस

किस्त : 11

8 सितम्बर, 2015

कौन हिंदुस्तानी, कौन पाकिस्तानी

1965 के युद्ध के बाद रेडियो पाकिस्तान से फ़िराक़ गोरखपुरी की ग़ज़लें बजनी बंद हो गईं थीं, पता चला कि अब किसी भी हिंदुस्तानी शायर का कलाम नहीं बजेगा। किसी ने रेडियो पाकिस्तान, कराची की दीवार पर इश्तिहार चिपका दिया कि फ़िराक़ गोरखपुरी को नहीं बजाते तो ग़ालिब और इक़बाल पर भी पाबंदी लगा दो, वो भी हिंदुस्तानी थे।कुछ साल बाद रेडियो पाकिस्तान ने फ़िराक़ साहब को फिर से पाकिस्तानी मान लिया ।

 

रद्दी किताब, रद्दी आलोचक, रद्दी लेखक

मूल्यांकन के लिए जब एक ही पीठ और उस पीठ के पीठाचार्य की गंधमय पीक को ही अमृत मेंहदी मानकर, अपनी आत्मा में रंगाकर, ब्लॉगी, इंटरनेटी, फेसबुकिया पगलाहट के ज्वर में कोई कई-कई रातों तक जागता मरे तो उस युवा की अकाल मौत पर करियेगा क्या ! मृत्यु पुल नहीं, गड्ढ़े रचती है । पुल पर अमरत्व रचा जाता है, पुल आत्महत्या नहीं, आगे की दिशा है । पुल ज़िंदगी है, पर जब ज़िंदगी वाले ही गड्ढ़ों के अनुशंसक हों, आकांक्षी हो तो उस पर चलते हुए शर्म के सिवाय कोई और भावना कैसे अपना मत देकर बदनाम होना चाहेगी ? सोचिए…सोचिए….बहरहाल…….संयोग से पीठाचार्य और पीठ-लीद-विश्वासी लेखक दोनों राजधानीवासी भी हों तो और दूरदर्शनी (मूलतः अदूरदर्शी शोकों के आदी) हवाबाज़ी को मुक्ति मान के अमर होने को उद्यत हों तो आपको उसकी कथित किताब को शहर के रद्दी बिक्रेताओं को सौंपने से कौन रोकेगा ? क्या पीठ के अनुचर ? क्या पीठ की अदूरदर्शनी लीलाओं के दर्शक ? क्या आपके प्रायोजक ? किताबें विश्वविद्यालय के प्राध्यापक (पता नहीं क्या-क्या पद होते हैं वहाँ ) विश्वविद्यालय के गुंडास्वामी के आदेश से ही महत्व की होतीं तो आपको खुद अपने प्रचार के लिए इतनी जद्दोजहद करनी नहीं पड़ती ।आराम भी करो कभी ! दिल्ली का इतिहास समय निकाल कर पढ़ लो ।

 

एलएलपीपी यानी…

परसों राँची वि वि में हिन्दी के विभागाध्यक्ष डॉ. जंग बहादुर पांडेय जर्मनी में अपनी विजिटिंग प्रोफ़ेसरी के दिनों का अनुभव सुनाते वक़्त बार-बार कहेजा रहे थे – “मैं ठहरा LLPP, मैं ठहरा LLPP !

बाद में मैंने पूछा तो वे मुस्कराते हुए बोले – “का मानस जी, ऐतना भी नहीं जानते…..LLPP यानी लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर ! “

डॉ. साब, तब तो इस मामले में हम भी LLPP ठहरे ना …..का बोलते हैं ?…..बोला जाये !

 

मुसाफ़िर राह की बातों को अक्सर भूल जाते हैं

क्या हम अपने किसी प्रिय व्यक्ति को उसकी अनुपस्थिति में भी गाहे-बगाहे यादकर लिया करते हैं ? हमसे से बहुत कम लोग ही होंगे जो ऐसा करने के लिए मन से विवश होते हों । क्या मैं भी दिल से ऐसा कर पाता हूँ ? एक मन तो कहता है – हाँ । फिर एकाएक मुझे जाने क्यों अकबर इलाहाबादी का यह शे’र याद आ जाता है –

तूझे ए बज़्म हस्ती कौन काफ़िर याद आयेगा

मुसाफ़िर राह की बातों को अक्सर भूल जाते हैं ।

 

सच्चा वीर वही

भारत में जाति-विरोधी सच्चा वीर वही जो सबसे पहले अपने नाम के साथ जातिवाचक सरनेम लिखे बिना जीकर बताये, अपने जातिविहीन बच्चों को आगे बढ़ाकर दिखाये, अपनी जाति के संगठनों, परंपराओं, संस्कारों, आदेशों की झंडाबरदारी न करे, किसी जाति-विशेष के होने के लिए मिल रहे सरकारी दान को ठुकराकर खुद जातिहीन नागरिक होकर दिखाये ।

 

चाचा चाची की सीख

डॉ. शरद पगारे उन कम उपन्यासकारों में हैं जिनकी कृतियों का अनेकानेक भाषाओं में स्वतःस्फूर्त अनुवाद हो चुका है । ऐतिहासिक उपन्यासकारों में अनन्य! विगत 30 बरसों से वे दोनों मुझे सगे भतीजे की तरह ही स्नेह देते हैं और मैं उन दोनों को चाचा-चाची की तरह ही ।अब 84 साल के बुजुर्ग हैं पगारे अंकल । कल उन्होंने प्यार से एक सीख दी : “बेटा, मैंने जीवन भर विश्व इतिहास का अनुशीलन किया है । बड़े-बड़े तुर्रम खां के जीवन की तह तक उतरकर समझा है । बुढ़ापे में सिर्फ़ दो ही साथ देती हैं एक पत्नी और दूसरा पैसा ।ये दो न हीं तो बुढ़ापा नर्क बन जाता है ।

 

पत्नीऔ र शब्दकोश

 “विद्वान पुरुष वही, जिसके सानिध्य में पत्नी और शब्दकोश हों । शयन कक्ष में जब कभी हाथ इधर-उधर फैलें तो इनका ही स्पर्श हो।” रामधारी सिंह दिनकर की डायरी पर बात करते हुए जर्मनी में हिन्दी के पूर्व विजिटिंग प्रोफेसर, रांची विश्वविद्यालय के विभागाध्यक्ष (हिन्दी) डॉ जंगबहादुर पांडेय ने आज ‘जर्मनी में हिन्दी’ पर अपना अनुभव भी सबके साथ साझा किया। उन्होंने कहा – बालाजी दर्शन के पश्चात जब दिनकर जी से पूछा गया कि आपने बालाजी से आख़िरकार माँगा क्या तो दिनकर ने कहा था : शेष जीवन जयप्रकाश नारायण को देना चाहता हूँ ।दुर्योग कि उसी रात दिनकर जी चल बसे । उनके तकिये के नीचे मिला : मोनिया विलियम्स का शब्दकोश ।

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