भगवान हो सकता है कलेक्टर

जयप्रकाश मानस www.srijangatha. com कार्यकारी संपादक, पांडुलिपि (त्रैमासिक) एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा रायपुर,

एक कवि की डायरी : किस्त 6

25 अगस्त, 2015

एक कली दो पत्तियाँ

हर शुक्रवार

फाइल में उलझे-उलझे बरबस याद आ गये महान संगीतकार भूपेन दा और उनका यह सुमधुर गीत - मन है कि भीतर-ही-भीतर गुनगुना रहा -एक कली दो पत्तियाँ नाजुक नाजुक उँगलियाँ तोड़ रही है कौन ये एक कली दो पत्तियाँ।रतनपुर बागीचे में फूल के खिलखिलाती, सावन बरसाती हँस रही है कौन ये मोगरी जगाती, मोगरी जगाती...

 

पियाहीन डरपत मन मोरा

मनोहर नायक जी के सौजन्य से एक प्रसंग सुनते हैं आज । 1981के अंत-अंत में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ इलाहाबाद आए । तयशुदा कार्यक्रम के तहत वे फ़िराक़ गोरखपुरी (रघुपति सहाय) से मिलने पहुँचे । फ़ैज़ के बैठते ही फ़िराक़ शुरू हो गए... ''फ़ैज़ एक शेर का अर्थ मैं चालीस बरस तक ग़लत समझता रहा। शेर तुलसीदास का है - 'घन घमंड नभ गरजत घोरा, पिया हीन डरपत मन मोरा...मैं समझता था कि राम कैसा डरपोक है। उसमें साहस नहीं है। बाद में एहसास हुआ कि अरे सीता ही उसकी ताक़त है।'

फ़िराक़ आगे बोले, 'तुलसी ने सीता स्वयंवर के समय क्या उम्दा उपमा दी है कि सीता जिस राजा के सामने जाती हैं, वह तेजहीन हो जाता है...।''

 

सच कह रहा होऊँ तो !

कलेक्टर भगवान हो सकता है । भगवान भी कलेक्टर हो सकता है । कोई-कोई कलेक्टर भगवान होता है । कभी-कभी भगवान कलेक्टर हो जाता है । भगवान का कलेक्टर होना ज़रूरी हो, न हो । कलेक्टर का भगवान होना उससे कम ज़रूरी नहीं - इस मुल्क में ।इन सब स्थापनाओं के बाद भगवान और कलेक्टर की इंसानी संवेदनशीलता सबसे अधिक ज़रूरी है । सच कह रहा होऊँ तो यह संवेदना एक जगह मिलती हैं - नाम कहें तो संजय अलंग । औकात कहें तो कलेक्टर ।संवेदना पूछें तो  ठेठ और ठाठ में भी भारतीय कवि से न कम न अधिक ।उनकी यदि नयी किताब आये तो उस पर खुशी किसी को हो न हो, हम जैसे संवेदनप्रिय और इंसानी ज़ज्बातों के दीवानों को बेइंतहा खुशी तो होगी ही ।तो हम खुश हैं और हमारी खुशफ़हमी को इस दुनिया की कोई भी सत्ता लूट सकती नहीं, हाँ कुढ़ ज़रूर सकती है ।कुढ़ने वालों को भला रोक सका है कोई ! पर अधिक दिन हमसे दूर रहे तो हमारी नाराज़गी सिर्फ़ उन्हें ही झेलनी होगी। बताये देते हैं ना

दुखद है

ख्यात कथाकार शैलेश मटियानी  जीवन भर गरीबों की समस्‍याओं को उजागर करते रहे लेकिन उनका परिवार गरीबी से फटेहाल है ।पिता शैलेश ने सौ से अधिक किताबें हिंदी-संसार को दिया किन्तु उऩकी मौत के बाद उनके बड़े बेटे राकेश मटियानी इलाहाबाद से हल्द्वानी चले आए । अब हालात यह है कि घर चलाने के लिए वे फेरी लगाकर पिता की पुरानी किताबों और स्टेशनरी भी फेरी लगाकर बेच रहे हैं ।माँ नीला मटियानी को भी एचआरडी की पेंशन समय पर नहीं मिलती । उत्तर प्रदेशसरकार की ओर से दिया गया मकान जर्जर हो चुका है ।

राकेश कहते हैं - कम-से-कम पिताजी की किताबें स्कूलों में लगा दी जाएँ परिवार का संघर्ष कुछ कम हो जाता ।

उनकी याद आज

हमारे वरिष्ठ कवि अशोक सिंघई आज होते तो उनका जन्म दिन मन रहा होता । जाने क्यों वे हमें पिछले दिनों छोड़कर चले गये । मैंने उन्हें सदैव 'भैया' ही कहा और वे मुझे 'भाई' ही कहते रहे । उन्होंने भिलाई में साहित्यिक सौहार्दता को बनाये रखने में सदैव प्रगतिशीलता का परिचय दिया । उनकी याद आज शिद्दत से मुझे परेशान कर रही है ।

 

बाप रे बाप !

आज श्रीमती जी ने मुझसे कहा - ''पिछले साल इसी समय एक किलो प्याज़ की क़ीमत 15 रुपये के आसपास थी । आज 60 रुपये किलो यानी 400 प्रतिशत की वृद्धि। बाप रे बाप ! इस देश में हो क्या रहा है जी ? लगता है अब प्याज को सूँघकर ही काम चलाना पड़ेगा ।''

You may also like...

Leave a Reply