भावना की तीन कविताएं

संवेदनाओं का पौधा

अधिकांश औरतें
जब व्यस्त होती हैं खरीदने में
साड़ी और सलवार सूट

तो लेखिकाएं खरीदती हैं
अपने लिए
कुछ किताबें ,पत्रिकाएॅ और कलम

अधिकांश औरतें
जब ढूंढती हैं
इन्टरनेट पर
फैशन का ट्रेंड

तो लेखिकाएं तलाशती हैं
ऑनलाइन किताबों की लिस्ट

अधिकांश औरतें
जब नाखून में नेलपाॅलिश
पैरों मे महावर लगा
करती हैं खुद को सुंदर दिखने की जतन

तो लेखिकाएं
रंग छोड़ती नाखूनों से
पलटती हैं किताबों के पन्ने
या रिश्तों की मजबूती के लिए
शब्दों से उगाती हैं
संवेदनाओं का पौधा

2
रेशमाबाई

रेशमाबाई
सिर्फ एक नाम नहीं
रेडलाइट एरिया की औरत की

यह पहचान है
पुरूष की पाशविक प्रवृति की

औरत की लाचारी
भूख की अकुलाहट
अशिक्षा रूपी अंधकार
बेकार हाथ

जब तक नहीं रौंदते किसी को
तब तक कोई रेशमा
नहीं बनती “रेशमा बाई”

3

रात के ठीक बारह बजे

रात के ठीक बारह बजे
जब मुन्नी बिटिया
किसी परी के देश में
विचर रही होगी बेपरवाह
ठीक उसी वक्त
मेरे जेहन में भी
विचरने लगता है
विचारों का झोंका
उतरने को कागज पर

ठीक उसी वक्त
घड़ी टिक -टिक करती हुई
प्रवेश करती है
नए दिन में

ठीक उसी वक्त
बदल जाता है
दीवार पर लटके
कैलेंडर का एक दिन

ठीक बारह बजे ही सुनाई पड़ती है
चौकीदार की कड़क आवाज़
जागते रहो ,जागते रहो
और भौंकने लगते हैं कुत्ते

रात के ठीक बारह बजे ही
याद आती है
नानी -दादी की कहानी
कि ऐसे ही समय निकलता है
बाॅसों की झुरमुटों से भूत

ठीक बारह बजे ही
मिलती है
भूत और वर्तमान की सीमा -रेखा
शायद इसीलिए
ठीक बारह बजे जन्मे थे
किशन कन्हैया

पर,आज
ठीक बारह बजे
लिख रही हूँ एक कविता
मुझे सहमा देती है
वक़्त की सहनशीलता
कि कैसे झेल पाता है यह
एक दिन के गुजरने की पीड़ा

भावना ,मुजफ्फरपुर

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