भावना सिन्हा की तीन कविताएं

डॉ भावना सिन्हा जन्म तिथि -19 जुलाई शिक्षा - पीएचडी (अर्थशास्त्र ) निवास - गया ,बिहार ईमेल -- sbhawana190@ gmail.com प्रकाशित कृतियां-- यथावत, अंतिम जन, पुस्तक संस्कृति आदि कुछ पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित ।
 
 
1. पांच बज गए
 
पांच बज गए
अभी तक नहीं आए पापा
 
पापा  अब तक क्यों नहीं आए
कहीं आज दवाइयां  लेना भूल नहीं गए
कहीं  बस  छूट  तो नहीं गई 
कहीं  कुछ .......................
 
घड़ी की टिक- टिक के साथ 
बढ़ जाती है  दिल की धड़कन  बेटियों की
 
यूँ तो
डांट- डपट से बचने
सारा दिन 
पिता की नज़र से
छिपती फिरती हैं 
 
लेकिन  समय से पिता को  घर में  न पाकर 
लड़कियाँ   भूल जाती हैं  हंसना चहकना
 
बेचैनी में 
झांक आती हैं  बाहर कई बार
बार - बार
 
और  दिखते ही पिता के
सड़क पर
 नंगे पांव  दौड़ पड़ती हैं बेटियाँ ।
 
 
2.  घर से भागी हुई लड़की 
 
घरेलू झगड़ों से ऊब कर
या
बेहतर कैरियर के तलाश में 
घर से भाग जाती है लड़की जब
चरित्रहीनता का एकमात्र पूर्वानुमति निष्कर्ष 
ठोक बजा कर थोप दिया जाता है
दावे के साथ
 
लड़की का घर से भाग जाना
चिन्ता की अपेक्षा 
शर्म का विषय अधिक होता है
 
लड़की के घर छोड़ जाने पर
पिता सिर मुंडा लेते हैं 
खाट पकड़ लेती माँ 
बंद रहते दरवाजे अधिकतर
 
गर लौट भी आती है तो
असहमतियों के दबाव में 
बदल लेती है अपना स्वभाव 
जूझती नदी का रूपक बन जाती है लड़की
 
हत्यारा फिर भी माफ 
कर दिया जाता है एक दिन 
घर से भागी हुई लड़कियों के संबंध में नहीं होता कभी 
उदार समाज
 
लड़की जहाँ भी जाती है 
खुसुर  फूसूर  ताउम्र
चलती है उसके साथ।
 
 
3. स्कूटी चलाती बेटी 
 
 
एक दिन देखती हूँ क्या कि  --
सहेलियों को अपने पीछे बिठाकर 
फर्राटे से स्कूटी चलाती हुई
चली आ रही है बेटी 
 
फटी की फटी रह गई मेरी आंखें
 
कब- कहाँ -  कैसे 
सीखा है बेटी  ने स्कूटी चलाना
घर – भर के लिए 
यह अचरज का विषय है
और  बहस का मुद्दा भी
 
कम वय में 
अधिक छूट देने से बिगड़ जाते हैं  बच्चे 
" कहीं कुछ  न कर बैठें ऐसा-वैसा   "
भुनभुनाती हैं दादी 
 
जबकि
रोक टोक से बच्चों में 
कुंठा   घर कर  जाती है --
अपने  तर्कों  से  बीच में ही
हस्तक्षेप करती हूँ मैं 
इन तमाम बहसों के दौरान 
चुपचाप मुसकराते रहते हैं पापा
 
जो भी हो!
 
बेटी का स्कूटी चलाना
समाज में 
स्थापित इस सत्य कोई नकारना है  --
बेटियाँ  बोझ होतीं  हैं  
 
आजकल ..
अपने छोटे छोटे काम 
चुटकियों में  निबटा रही अकेले ही
यहाँ तक कि--
बनवा लाती है
मेरा भी चश्मा 
थके हारे 
ऑफिस से लौटे पापा को  
परेशान नहीं  होना पड़ता अब 
 
स्कूटी चलाना 
बेटी का अपना निर्णय है   
खुश हूँ--
जहाँ  इतने सालों में 
आत्मसंशय  से मैं नहीं हो सकी मुक्त 
बेटी! अभी से है मजबूत अपने इरादों में !
 
अब तो वो ...
ढूँढ- ढूँढ कर बहाने 
चला रही है स्कूटी 
और!
मैं मंत्रमुग्ध 
देखती रहती हूँ उसे
आते-आते 
 
अपनी  धुन में मग्न 
स्कूटी चलाती  बेटी 
आसमान में 
उड़ती  चिड़िया- सी लगती है मुझे ।

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