भास्कर चौधुरी की दस कविताएं

भास्कर चौधुरी

पता : 1 / बी / 83,

       बालको

       जिला : कोरबा (छ.ग.)

       495684

       मोबाइल न. : 9098400682

Bhaskar.pakhi009

@gmail.com

परिचय

 

जन्म: 27 अगस्त 1969

      रमानुजगंज, सरगुजा (छ.ग.)

शिक्षा: एम. ए. (हिंदी एवं अंग्रेजी) बी एड

 

प्रकाशन: एक काव्य संकलन ‘कुछ हिस्सा तो उनका भी है’ एवं गद्य संकलन (यात्रा वृतांत) ‘बस्तर में तीन दिन’ प्रकाशित। लघु पत्रिका ‘संकेत’ का छ्टा अंक कविताओं पर केंद्रित. कविता, संस्मरण, समीक्षा आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।

यात्रा:    सुनामी के बाद दो दोस्तों के साथ नागापट्टिनम की यात्रा. वहाँ ‘बच्चों के लिए बच्चों के द्वारा’ कार्यक्रम के तहत बच्चों को मदद पहुँचाने की कोशिश, आनंदवन, बस्तर, उत्तराखंड,  शांतिनिकेतन की यात्रायें।

1

ऐसी ही है दुनिया ...

मैंने बंद कर ली आँखें

और सोचा शुतुर्मुर्ग की तरह

कि अंधी है दुनिया

 

जम्हाई ली मैंने

और सोचा चिड़ियाघर में

कैदी शेर की तरह

उबासियाँ ले रही है सारी दुनिया

 

चुप हो गया मैं

और सोचा सीतनिद्रा में पड़े

ध्रुवी भालू की तरह

कि इन दिनों ऐसी ही है दुनिया... !!

2

सफल आदमी

यह औरत ही है

जो घर को सम्हाल कर रखती है

कहा उसने

 

यह औरत ही है

जो आदमी को उसकी मंजिल तक पहुँचाती है

कहा उसने

 

और

सामाने बैठी औरतों की

ज़ोरदार तालियों के बीच

वह उतर आया

मंच से आहिस्ते आहिस्ते

झूमते झूमते !!

3

 गौरैये

वे 
न तो 
ढोल पीटते हैं 
न रचते हैं 
प्रेम पर असंख्य कविताएँ 
वे तो बस 
प्रेम करते हैं 
प्रेम करते रहते हैं ...

4

जल

रोबोट खोज रहे हैं 
मंगल की गहराइयों में जल

और यहाँ धरती पर 
उतर रही हैं स्त्रियाँ 
कुओं की तलहटी में

स्त्रियाँ घड़े और 
खाना पकाने वाले बरतनों में 
एकत्र कर रही हैं 
बूंद-बूंद जल …

शायद 
मनुष्य की महानता का चरम हो 
 मंगल पर जल की खोज

और इधर धरती पर 
जल खोजती स्त्रियों में 
मनुष्य को मिल जाए
स्त्रियों की महानता के सबूत !! 

5

साबुत 
वे निगल गए नदी को साबुत 
और अब उगल रहे हैं 
पानी मिली राख 
धरती के गालों पर मलने के लिए शायद 
धरती के सौंदर्य का यही एक तरीका बच गया है.

6

लगाव

फैला हुआ परिवार है

भरे पूरे हैं परिवारजन

नहीं है

सम्बधों का अभाव

पर कहाँ है लगाव !

7

अनुपम मिश्र को याद करते हुए

पानी ने जोड़ा

अनुपम को दुनिया से

अनुपम ने पानी जोड़ा पानी से

सचमुच पानी ही थे अनुपम

उनके तलाबों की तरह भरे हुए लबालब

पानी से तरबतर थे उनके सम्बंधों के खेत

गाँव शहर और देश की सीमा से परे

हरे हरे...

8

कवि !

कवि !
कहाँ खड़े हो तुम 
किसके पक्ष में 
वे जो स्कूली बच्चे हैं 
पत्थर फेंक रहे हैं 
ढंके हुए हैं मुंह गमछे से 
या वे जो
गोलियाँ चला रहे हैं 
कल ही जिन्होंने पच्चीस जवानों को
भून दिया गोलियों से 
उनके पक्ष में

 

कवि !
कहाँ खड़े हो तुम
किसके पक्ष में 
वे जिनके हाथों में पकड़ाया गया है
वह पैलेट गन है
या जिनकी पैलेट गोलियों से
फूट गई दर्जनों किशोरों की आँखें

कवि !
कहाँ खड़े हो तुम 
किसके पक्ष में 
क्या उस सरकार के पक्ष में 
जिसकी आँखों में जनता 
हिंदू या मुसलमान है 
राष्ट्रभक्त या देशद्रोही है 
जिसकी चर्चा में मज़दूर किसान 
दूर दूर तक नहीं है..

कवि !
कहाँ खड़े हो तुम
या खड़े नहीं 
औंधे मुंह गिरे पड़े हो तुम 
दबी हुई तुम्हारी ज़ुबान 
पक्ष विपक्ष भूल गये हो तुम...

9

ओ किसान

तुम्हारे गालों पर जो गड्ढे हैं

छोटे-बड़े

ये जो रेखाएँ हैं 

आड़ी-तिरछी

माथे पर

ये जो उग आए हैं

खूटों से

दाढ़ी तुम्हारी

तुम्हारे खेतों की तरह ही तो दिखते हैं...

 

ये जो आँसू है

भरे हुए लबालब

तुम्हारी खाली सूनी आँखों में

बेमौसम बारिश से जैसे खेत

चौपट जिसके नीचे खड़ी फसल

 

पहले भी तो

हुआ ऐसा बारों-बार

सूखी-सूखी धरती जब

बारिश ने धता बता दिया

 

पहले भी तो

हुआ ऐसा बारों-बार

जब पश्चिम में उठा बवंडर

और पूरब में पत्थर पड़े

पड़ी बारिश की मार

 

तब तुमने हाथों को दोनों

गालों पर रखा

उकड़ूँ होकर बैठ गए तुम

वहीं मेड़ पर

तब भी तुमनें डालों  को देखा था

हरा-भरा जो पेड़ खड़ा था

जो तूफानों को झेल चुका था

केरियाँ जिसकी सारी झड़ चुकी थी

फिर भी वह अड़ा पड़ा था

ओ किसान !

भूल गए तुम

तुम्हारे ही हाथों तो

उस पेड़ का नन्हा बीज पड़ा था...

 

आज उसी पेड़ की डगाल

जो झुकी हुई

तुम्हारे ही खेत की ओर

गमछे के फंदे से

लटक गए तुम

खुली चौड़ी आँखें तुम्हारी

देख रही किस ओर....

ओ किसान !!

10

चिंता

दिन के उजाले में

बंद कर भी दें अगर

कमरे की सारी खिड़कियाँ- 

दरवाजे

चादर से मुंह ढाँप

करें उपक्रम सोने का

सोचें की

चिंताओं से कोई भी

महफ़ूज़ हैं आप

या कि

चिंताएँ सारी की सारी

ढांपते ही मुंह

परे हो जाती हैं आप से

तो आप ग़लत हैं

 

उजाले की तरह

चिंता भी

पा ही जाती हैं घुसने की जगह

कभी खिड़कियों में दरारों से

तो कभी

चादर में धागों की बुनावट के बीच

कहीं से ...  

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