मनीषा जोबन देसाई की कविता ‘काफी नहीं?’

बैठे रहते है जब हम

खोये हुए सपनो की खोज मे ,

आसमान से टपकते

पानी से संवेदना हथेली पर

शायद फिर से संजो ले !

 

पर ..

ये जो समय है, वो

दूर से चमक कर

टूटते हुए तारे की तरह

बिखर बिखर जाता है,

और ..आंसुओ की सतह पर

सदियों तक चमकता रहता है,

 

फिर भी ज़िंदा हूँ

काफिीनहीं ?

 

 

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