मनी यादव की एक ग़ज़ल

टूटे मकाँ में रहता तो गुलदान बुरा है
ग़ुरबत में मुहब्बत का भी अंजाम बुरा है
भूखा था वो मासूम जिसे चोर कहा तुमने
खुद का तेरा भी झांक गिरेबान बुरा है
था आसरा मुझको भी बहुत अच्छे दिनों का
अच्छा भी सियासत में तो पैगाम बुरा है
कोशिश न करो इश्क़ को आसान बनाने की
पत्थर न हो जिस गाम में हर गाम बुरा है

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