मनी यादव की दो ग़ज़लें

एक
तल्खियां खून की विरासत है
छोड़ ना यार ये सियासत है
मुफ़लिसी जा रही है महफ़िल में
मुफ़लिसी को कफ़न की दावत है
हुस्न तेरा मिटा के दम लूंगा
सांस तुझसे मेरी बगावत है
वाकया ये समझ नहीं आता
रात को दिन से क्यों शिकायत है
भागता क्यों है तू "मनी" ग़म से
ग़म तो अल्लाह की इबादत है

दो
मुकद्दर राख बनकर उड़ गया है
कोई हमराज़ बनकर उड़ गया है
उड़ानों की कशिश में मेरा तन भी
दिलों का माप बनकर उड़ गया है
हमारी आंख में टिकता नही है
ये आंसू भाप बनकर उड़ गया है
बहुत कोशिश की दिल को कैद कर ले
ये ताइर आप बनकर उड़ गया है

 
 
 
 

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