महान होने का मतलब

जयप्रकाश मानस

हर शुक्रवार

किस्त -दस

 

3 सितम्बर, 2015

फूले कास सकल मही छाई

रायपुर और नया रायपुर के बीच 30-35 किलोमीटर का फ़ासला है । दोनों तरफ़  हरे-भरे खेत, घास या फूलों की क्यारियाँ । आज मंत्रालय जाते वक्त एकाएक दिख पड़े कास के सफेद फूल । बरबस याद आ गये प्राइमरी स्कूल के धींवर गुरुजी और बचपन में पढ़ी हुई यह प्रिय कविता -वर्षा विगत शरद रितु आई, देख हूँ लक्ष्मण परम सुहाई फूले कास सकल मही छाई, जनु बरसा कृत प्रकट बुढ़ाई ।तो क्या इधऱ बारिश हुई ही नहीं और शरद ऋतु आ पहुँची छत्तीसगढ़ ! कल से यही प्रश्न मथे जा रहा है मुझे -''कैसे करेंगे हमारे किसान ?''

 

5 सितंबर, 2015

गोबर और गणेश

हम सबमें दो चींजें होती ही हैं - गोबर और गणेश। किसी को गोबर भी गणेश दिखता है और किसी को गणेश भी गोबर। हम सबमें न केवल गोबर होता है न केवल गणेश !हम सब केवल गोबर तलाशते हैं या गणेश !!हम सब गोबर-गणेश को पसंद नही करते !!!हमें किसने अधिकृत किया - यही पसंद करते मरें !!!क्या गोबर ने ? क्या गणेश ने ??

 

महान होने का मतलब

सबसे अधिक महान सबसे अधिक सरल भी होते हैं। महानता जटिल और कठिन होना नहीं। महान होना कठिनाई और जटिलता के रावण को बालि की तरह अपनी काँख में दबोचे रख कर मौन रहना है। फेसबुकियाई अंदाज़ में रोज़ अपनी ही तस्वीर दिखाकर महान बनने के लिए बकर-बकर करते रहना भी नहीं। महान होने के लाखों लक्षणों में केवल एक लक्षण है संवेदनशील लेखक होना। लेखक होना सर्वश्रेष्ठ महान् होना नहीं ।दरअसल महानता लेखक का अनुमान नहीं, उसके सच्चे स्वप्न का विज्ञान है ।लेखक होना महान् होना कदापि-कदापि नहीं ! एक मोची, एक धोबी, एक नाई, एक सब्जी बिक्रेता, एक किसान, एक पंचर बनाने वाला भी उससे कहीं महान होता है ।महानता केवल लिखने वालों की बपौती नहीं ।महान होना मनुष्यता के चरम स्वप्नों को साकार करना है । स्वप्न बहुत लोग देखते हैं। जो कोई भी उसे अमली जामा पहनाता है वही महान होता है।इन सबके बावजूद महान होना औरों को तुच्छ साबित करना भी नहीं है ।महान होना जो भी है हो, विज्ञापन का गुमान नहीं है क्योंकि विज्ञापन क्रय-विक्रय का विषय है, महान होने का न कोई अनुमान है, न विज्ञान ।क्रय-विक्रय सबसे ज़रूरी होते हुए भी एक अति सामान्य दिनचर्या है ।महान् बनना कम से कम मनुष्य की साधारण हरक़तों से बचना तो है ही ।  (केंद्र-निवासी कुछ महान् लेखकों की हरक़तों को निरखने पर एक अनुचिंतन)

 

असलियत

साल में केवल एक दिन 'गुरु-गुरु' चीख़ कर हम भारतीय चाहे जितना ढोंग रचा लें, असलियत यही कि हमारे महान देश में अब गुरु-शिष्य की पावन परंपरा संगीत और अध्यात्म के अलावा लगभग किसी भी अनुशासन में नहीं दिखाई देती ।

 

अपना-अपना हिमालय

हिमालय बेशक़ महान है, परन्तु कुछ वे लोग जो पर्वतराज हिमालय के बारे में कुछ भी नहीं जानते, और हिमालय की जगह किसी छोटे-मोटे पर्वत, डोंगरी की महानता को वे रोज़ परख कर उस पर श्रद्धा करते हों, के बारे यह मान लेना कि वे हिमालय-विद्रोही हैं, किसी मूर्खतापूर्ण अपराध और फ़ासिस्ट-चेष्टा से कतई कम नहीं ।सबका अपना-अपना हिमालय होता है ।सबकी अपनी-अपनी चढ़ाई होती है ।सबके अपने-अपने पैर होते हैं ।सबकी अपनी-अपनी दृष्टि होती है ।सबकी अपनी-अपनी सृष्टि होती है ।

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