महिला दिवस पर डॉ सुलक्षणा अहलावत की कविता

सीता के रूप में मेरी अग्नि परीक्षा लेते हो,
द्रौपदी रूप में जुए के दांव पर लगा देते हो,
फिर भी तुम महिला दिवस मनाते हो।

कभी सती के नाम पर चिता में जला देते हो,
कभी जौहर के नाम पर अग्नि में कूदा देते हो,
फिर भी तुम महिला दिवस मनाते हो।

खरीद लेते हो लगा कर कुछ दाम मजबूरी का,
बना कर रखते दासी, लेते हो काम मजदूरी का,
फिर भी तुम महिला दिवस मनाते हो।

कभी दहेज के लिए सता सता कर मार देते हो,
कभी भ्रूण हत्या करने को कर लाचार देते हो,
फिर भी तुम महिला दिवस मनाते हो।

किताबें छीन कर चूल्हे तक सीमित कर देते हो,
कच्ची उम्र में शादी कर दुखों से जीवन भर देते हो,
फिर भी तुम महिला दिवस मनाते हो।

हर रोज तुम अत्याचार पर अत्याचार करते हो,
राह चलते सरेआम मेरा ही बलात्कार करते हो,
फिर भी तुम महिला दिवस मनाते हो।

मेरी आज़ादी पर  तुम मचाते हो हमेशा बवाल,
मुँह फेर लेते हो सुन “सुलक्षणा” के चंद सवाल,
फिर भी तुम महिला दिवस मनाते हो।

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