माया मृग की पांच कविताएं

मुझे तुम्‍हारे हाथ देखने हैं

तुमने लौ को छुआ
वह माणिक बन गई
बेशुमार मनके 
तुम्‍हारी मुट्ठी में सिमटते चले गए
मुझे बहुत देर बाद पता चला
कि दरअसल
लौ से तुम्‍हारे हाथ जल गए थे
तुमने जले पोर मुझसे छिपाने को
मुट्ठियां बन्‍द कर ली थीं .... !

उस दिन जब तुमने 
जो पत्‍थर उछाला आकाश की तरफ 
तुम्‍हारे स्‍पर्श की नियति थी
या कि उस पत्‍थर की
वह हवा में ही फूल बन गया
बहुत देर बाद
जब वह पत्‍थर नीचे गिरा
उस पर तुम्‍हारे खून के धब्‍बे थे ....!

सिहर गया हूं कि 
आज छू लिया तुमने मुझे 
मुझे तुम्‍हारे हाथ देखने हैं, अभी, इसी वक्‍त ... !

 

मुझमें मीठा तू है
लिख मीठा, पढ़ मीठा
कह मीठा कि सब मीठा है 
कीकर, पीपल, नीम मीठा
छांव मीठी धूप मीठी, 
रात मीठी, बात मीठी
मिठास में घुल गई है दुनिया----।

मीठी राह, मीठी चाह
मीठा है सपना चलते चले जाने का
ठंडी-गरम हवा में घुली मिठास
गंदले-साफ पानी में मिला शरबत, 
धुआएं आसमान तक में पसरती मीठी गंध----।

जहां से चला वह गांव मीठा, 
जहां कभी ना पहुंचा वह शहर मीठा
पगडंडियों में मिठास---सड़कें मिठास भरी
अकेले मेंं भरा मीठा अकेलापन
भीड़ में शामिल रही मीठी आवाजाही-----।

धीमे सफर में बढ़ जाना धीरे धीरे
लौट आना चाशनी भरे कदमों से 
आते-जाते पैरों का हर निशान मीठा
कुछ याद में मीठा
कुछ याद के बाद में मीठा---।

मीठा है बहुत सीखना मीठा होते जाना
भीतर-भीतर भर जाना शहद का तालाब
तुमसे ही जाना---तुमसे ही सीखा 
बूंद भर मिठास से लताड़ देना समन्‍दर भर को
तुझमें है मीठा तेरा होना हर जगह---!

तुझमेंं जो मीठा---तू है---।
मुझमें जो मीठा तू है-----।

 

इस तरह पढ़ना दुख को


दुख को जब भी पढ़ना- उलटा पढ़ना ! 
आखिरी पन्‍ने से शुरु करना 
और शुरुआत का संबंध ढूंढ लेना
पहले पन्‍ने पर लिखे उपसंहार से
ये जानकर पढ़ना कि जो पढ़ा, उसे भूल जाना है----।

उलटे होते हैं दुख के दिन
रात भर खंगाले जाते हैं रोशनी भरे लम्‍हे
आंख बंद रखना अगर देखना है सब----।

दुख को फुनगी से काटना
पहली कोंपल का हरा सुख--पहला दुख है
पहला सुख निकालना होगा मिट्टी खोद खोदकर
जो दबा रह जाए उसे रहने देना
इसलिए कि इस दबे का ताल्‍लुक बढ़ने से नहीं है
जो दब गया उसे दबते जाना है---बस---।

उलटाकर देखना तकिए के नीचे रखी
पोस्‍ट ना की गई चिट्ठी 
चिट्ठी के कागज को उलट कर देखना
कि कहां लिखा था कुछ जो पढ़ना था उसे
कितने शब्‍द उलटे पलटे पर कहां लिखी गई सीधी सी बात----।

दुख में उलटी चलती हैं घड़ियां
वक्‍त लौटता है हर बार पीछे
चादर को कोने से पकड़ना और उलट देना
रात भर जागे दुख को भनक ना लगे
यह उसके सुख के सपनों में सोने का वक्‍त है....!

जो नहीं लिखा खत में...तुम बस वही पढ़ना

कि जिस मिट्टी से बना था
उसका रंग लाल था
गूंथने को लिया पानी ठहरे तालाब का था
अब भी बाकी थे जिसमें काई के रेशे कई
सूरज के डूबने से पहले..भिगो दी मिट्टी सुबह के लिए
कहीं कुछ सांझ घुल गई होगी...पीली होती हुई.....

इस तरह गुस्‍से से बना था मैं
तमतमाते दिनों में ढला भी तो 
पीले में घुला रहा थोड़ा सा लाल
जो था भीतर कुछ हरापन...वह तुमसे था
सुबह होने तक बचाना था मुझे इसे
तुम्‍हें भीगी-गली मिट्टी से घड़ना था घड़ा 
कि जिसमें ठंडा रह सकता पानी
तुम्‍हें पता था... उबलता रहे तो भाप हो जाएगा....।

मेरा गुस्‍सा तुम्‍हें दिया
मेरे विकार तुम्‍हें सौंपे
तुमने हर ली मेरी कामनाएं
तुमने मिटा दी मेरी एषणाएं
तुमसे मिलकर छोटी हो गई वासनाएं....।

मैंने शांत मन से सौंप दी तुम्‍हें 
मेरे भीतर की शांति भी
निर्विकार होते जाने का लोभ भी
तुम्‍हें पा लेने की लालसाएं 
की तुम्‍हें ही समर्पित....।

एक घड़े से पानी बूंद बूंद रिसा
और भीतर पानी में घुल गई शीतलता
जो तुमने गूंथी उस मिट्टी के नाम
एक खत लिखना है मुझे...
हालांकि जानता हूं मैं
नहीं लिख सकूंगा खत में भी
कि तुमसे प्रेम है मुझे.....।

(जो नहीं लिखा खत में....तुम बस वही पढ़ना)

ज़मीन पर पहली बार

गेंदे के पौधे पर पहली बार आया फूल
सुबह उठते ही पहले पहल देखा
खुली हथेली पर गिरी बादलों से पहली बूूंद
उस छोटी सी काली चिडि़या ने
पहली बार गर्दन घ्‍ाुमाकर देखा
इधर मेरी ओर....।

सूरज ने आज दिन भर खेला
लुकाछिपी का खेल
मैंने भी हर बार ढूंढ निकाला उसे
कभी इस सुरमई कभी उस तीतरपांखी बादल के पीछे से
हवा ने आकर कई बार 
यूं ही धौल जमाई पीठ पर
पुराने यार सी....।

आज जाना कि पंजे उचका कर चलने 
और एडि़यां रगड़कर चलने में फर्क क्‍या है
रास्‍ता बिछ-बिछ गया आज तो कदमों में
उसे पता था आज कुछ सोचकर नहीं निकला मैं घर से
कहीं भी जा सकता है 
कहीं नहीं जाने की सोचकर निकला हुआ शख्‍स....।

गली की नुक्‍कड़ पर लगी ठंडी लस्‍सी की छबील से
बिना झिझक उठाकर पी दो गिलास 
गीले हाथों को रगड़ा बालों से
और पौंछ लिए कुर्ते से 
रुमाल निकाला बिछाया और 
बैठ गया गुरुद्वारे के लंगर की पंगत में....।

एक दिन भर में जाना
जरा सा झुकने भर से मिल जाती है ज़मीन
जाने इतनी उम्र किस हवा में जीता रहा....।

 
 

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4 Responses

  1. Prerna Sharma says:

    , भीतर-भीतर भर जाना एक शहद का तालाब ‘…कविताये ऐसी ही है । बधाई !

  2. Pooja singh says:

    हमेशा से बहुत ही बेहतरीन लिखा है माया जी ने… हर एक कविता सूक्ष्म से सूक्ष्मतर एहसास को जीवंत रूप देती है…..l बधाई हो literature point.

  3. राजेश"ललित"शर्मा says:

    माया मृग की शानदार कविताएँ ।मन खिल उठा।ज़मीन पर पहली बार,जो नहीं लिखा ख़त में वही पढना आदि।सभी अच्छी हैं।
    राजेश”ललित”शर्मा।

  4. जगजीत गिल says:

    बहुत बढ़िया लगी कविताएं

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