मीनू परियानी की कविता ‘मां’

    कष्ट हजारों सहकर,अपनी जान ज़ोखिम में डाल कर
    जन्म हमें जो देती है, कोई और होती नहीं
    वो औरत  सिर्फ माँ होती है
    शक्ल सूरत पर जाती नहीं मेरी, कलेज़े से लगा कर रखती है
    अपंग अपाहिज बच्चे को भी, नजर का नूर कहती है
    कोई ओर होती नहीं
    वो औरत सिर्फ माँ होती है
    सिखाती है दुनियाँ का हर दस्तूर हमें ,सच बोलने की सलाह देती है
    मेरी गलती को छूपाने  की खातिर ,झूठ वो खुद बोलती है
    कोई ओर होती नहीं
    वो औरत सिर्फ माँ होती है
    मेरी हर बेज़ा हरकत पहले बरदाश्त करती थी, अब
    जब मुझे समझा नही पाती ,तो रो लेती है सिसकती है
    हरदम मेरी कुशलता की, वो रब से रट लगाती है
    मेरे दो बोल सुनने को जो हमेशा तरसती है
    कोई और होती नही
    वो औरत सिर्फ माँ होती है
    सोचता हूँ कभी फिर वही बच्चा बन जाऊ
    उसके आंचल में छुप कर,ज़ालिम दुनियां को भूल जाऊं
     समझ जाती है जाने कैसे बात मेरे मन की
    सर पर फेर देती है हाथ ममता भरा ,होले  से गले लगा लेती है
    कोई और होती नहीं
    वो औरत सिर्फ माँ होती है

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