मीनू परियानी की लघुकथा ‘कन्यापूजन’

मीनू परियानी

कल ही बड़ी बहू को चेक अप के लिए हॉस्पिटल ले गये थे , डॉक्टर ने बड़ी मुश्किल  से हाँ की थी, लिंग परीक्षण कानूनन अपराध जो था आजकल . एक पोती पहले से ही थी 

इसलिए सेठ जी इस बार पोता ही चाहते थे. रिपोर्ट और डॉक्टर का लटका हुआ चेहरा देख 
कर सब समझ आ गया था. इस बार भी गर्भ में कन्या ही थी. उन्होंने  एक मूक एलान कर
दिया--एक कन्या और नहीं। बहू के लाख विरोध के बावज़ूद गर्भपात करवा दिया गया.
दो दिन बाद ही दुर्गा अष्टमी थी, जिस पर सेठ जी १०१ कन्या का पूजन कर उन्हें भोजन 
करवा कर पुण्य कमाते और समाज में वाह वाही भी. अंदर बिस्तर पर लेटी बहू अपनी 
कन्या को याद कर शोक मना रही थी, वही बाहर लगे पंडाल में कन्या पूजन कर सेठ जी एक कुशल अभिनेता का रोल निभा रहे थे 

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