मीनू परियानी की लघुकथा ‘मज़बूरी’

आज राधा को कुछ ज्यादा ही देर हो गयी थी मै दो बार बाहर जा कर देख आई थी पर उसका दूर दूर तक पता नही था. राधा मेरी कामवाली बाई थी जो कभी कभी अपनी बेटी को भी काम पर ले आती थी। रानी उसकी बेटी जिसकी उसने छोटी उम्र में ही शादी कर दी थी.

तभी दरवाजे की घंटी बजी मेने दरवाजा खोला तो सामने रानी थी मै कुछ कहती उसके पहले ही वो तेज़ी से रसोई में चली गई..

आज तेरी माँ कहा गई रानी , मैंने उससे पूछा,

रानी की आँखे पनीली हो आई ,

वो ..वो..कल आएगी मैडम जी। वो बर्तन साफ करते हुए बोली.

पर तू तो ससुराल जाने वाली थी ना? मैंने फिर पूछा

हां पर अब नहीं जाउंगी> वो बोली।
क्यों,वो मेरा बापू मुझे दूसरी जगह भेजना चाहता है।
क्या मतलब?  मैंने थोडा आश्चर्य से पूछा>
वो हमारी जातf में लड़के वालो से पैसे लेकर शादी करते हे, अब कोई दूसरा ज्यादा पैसे दे रहा हे तो बापू ने मेरी शादी तोड़ दी हे पंचायत बिठा कर,कहता है हमारी लडकी को दुख देते हैं।
तो क्या सच में तुझे दुःख देते हैे?
नहीं मैडम जी। अब ससुराल में तो ये सब चलता है न। बड़ी सहजता से वो बोली, ‘पर मेरा  पति बहुत अच्छा है”, कहते हुए वो थोडा लजा गई। उसकी बड़ी बड़ी आँखें मानो सपनों से भर गई , ‘तब तू मना क्यों नही कर देती”, मैने पूछा।
नही वो बापू कहता हे तू अगर वहा गई तो फिर हम से रिश्ता नही रहेगा . अब मै पीहर वालो से रिश्ता कैसे तोड़ दूँ । मजबूरी है, बापू को तो पैसों का लालच है।
‘पर तेरी माँ? वो क्या कहती है?
वो भी मजबूर है मैडम जी ,मेरा बापू भी तो उसका दूसरा मर्द है ,उसने भी उसके ज्यादा पैसे दिए थे।
बेहद उदास स्वर  में रानी बोली, उनके घरेलू मामले में कुछ न कर पाने को, मै भी मजबूर थी, सबकी अपनी अपनी मजबूरी थी, आँखो के कोरो पर छलक आये आंसुओ को धीरे से अपने हाथों से पोंछ कर रानी चली गई। उसे दूसरे घर जाना था काम करने ….

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