मो. शफ़ीक़ अशरफ की लघुकथा ‘सुबह के पटाखे’

मो0 शफ़ीक़ अशरफ मोहिउद्दीनपुर, समस्तीपुर (बिहार)

टीवी पर संदेश आ रहा था, दिवाली पर पटाखे कम जलाएँ वायु प्रदूषण बढ़ रहा है और साथ ही ध्वनि-प्रदूषण भी, पटाखों की तेज़ आवाज़ से बच्चे-बूढ़े, पशु-पक्षी सब परेशान हो रहे हैं, ऑफिस जाने का समय हो रहा था जल्दी से तैयार हो कर मैं ऑफिस के लिए निकल गया।  

      दिशांत ने कल रात ही मेरे पास चुपके से अपनी मांग रखी थी मिर्ची पटाखा ला देने का पर मेरी पत्नी मनु ने पहले ही मना कर रखा था कि जिसमें खतरा हो वो पटाखे मत लाइएगा। मनु का मना करना गलत नहीं था, एक माँ होने के नाते बिल्कुल सही थी वह। कोई भी माँ-बाप अपने बच्चों को मनमानियां करने से सिर्फ इसलिए रोकता है ताकि वो अंजान मुसीबतों से बचे रहें, परंतु पत्नी के मना करने पर भी मैं आज हर तरह के पटाखे लाने वाला था, पर ज़्यादा खतरों या तेज़ आवाज़ वाला नहीं।

      ऐसा करने के पीछे सिर्फ एक ही कारण था, मेरे बचपन की दिवाली जो मुझे आज भी याद आ जाती है, दिवाली रात की ठीक अगली सुबह हमारे दोस्तों की फौज, जिसमे मैं, मेरे दोनों भाई विजय और नवीन, पीटर, शौकत, लालू ,राजू शामिल थे, इकट्ठा हो कर निकल जाते थे अधजले पटाखों की तलाश में। हर कोई चाहता था के वो सबसे ज़्यादा पटाखे ढूंढ सके, हम पूछते और बताते भी रहते थे के किसके कितने हुए। एक लालच कि मुझसे ज़्यादा किसी का ना हो और फिर उस लालच को पूरा करने का एक जुनून कि सबसे ज़्यादा मैं ही ढूँढूँ और फिर एक डर कि जिसका ज़्यादा होगा उसे तो कम वालों को बांटना होगा और फिर ना बांटने की एक चंचल मौन स्वीकृति बड़ी खामोशी से, कोई विद्रोह नहीं, क्योंकि चुन लेने के बाद कोई साथ रहने वाला नहीं था, सब भाग जाते थे। हम हर गली में घूमते, लाल और सफ़ेद जले हुए पटाखों की कागजों के बीच हमें सिर्फ लाल की तलाश रहती थी, सिर्फ मिर्ची पटाखा, जो दिखने में बिलकुल लाल होती थी। एक पूरी की पूरी लाल मिर्ची पटाखा मिलने से मन के अंदर एक हरियाली सी आ जाती थी और अगर गलती से किसी को अधजला अनार या बम मिल जाए तो उसके लिए तो फिर बड़ी दीवाली। फिर हम एक दूसरे से आग्रह करते कि देख तुझे एक अनार मिला, अगली बार मुझे लेने देना।

      आज जब उन दिनों को याद करता हूँ तो अफसोस होता है और मैं नहीं चाहता कि मेरा दिशांत जब बड़ा हो जाए वो भी अफसोस करे। इसलिए शाम को मैंने ढेर सारे पटाखे खरीदे, रात को हमने सब मिल कर जलाया, बीच-बीच में मेरी नज़रें कुछ तलाशती रहती थी, अपने जैसा उस फौज को जो रात में ही बंट जाया  करते थे अलग-अलग जगहों पर कि किन-किन गलियों में ज्यादा पटाखे जलते-जलते बुझ गये, सुबह उन जगहों पर जल्दी धावा बोलेंगें, पर दिवाली की जगमगाती दियों की रोशनी में भी वो दिखाई नहीं दे रहे थे। हमलोगों ने खाना खाया और सोने चले गए, मुझे नींद नहीं आ रही थी मैं सोच रहा था शायद वक़्त बदल गया है, अब किसी को सुबह के पटाखे का इंतज़ार नहीं रहता है, ये सब सोचते-सोचते नींद आ गई।

सुबह पत्नी की आवाज़ से नींद खुली, उठिये पानी आ रहा है, आज आप भर लीजिये, मुझे बहुत काम है।

मैंने नींद में ही कहा “वैसे भी तो रोज़ मैं ही भरता हूँ” ये कहते हुए मैं पानी भरने बाहर आ गया।

बाहर कुछ दिये अब भी जल रहे थे, भगवान की लीला अद्भुत है जो दिये रात को इतने सुंदर लग रहे थे, सुबह वही फीके लग रहे थे। तभी मैं ठिठका, मैंने देखा बहुत से बच्चे झाड़ू लगा रहे थे, पूछने पर पता चला कि उनलोगों को स्कूल में होमवर्क मिला है, अपने आसपास पटाखों के जलने से जो सारे कचरे हुए होंगे उसको साफ करने का, स्कूल की इस अनोखी पहल और बच्चों के निष्ठा को देख कर अच्छा लगा । तभी कुछ बच्चे और दिखे जो उन कचरों के ढेरों को इकट्ठा कर उसमे से कुछ ढूंढ रहे थे, वो हमारे कॉलोनी के बच्चे नहीं थे, उनके शरीर पर दिवाली के नए कपड़े नहीं थे पर प्रसन्नता बहुत थी, उनकी आँखें बता रही थी के सुबह के इंतज़ार में वो सारी रात सोये नहीं हैं। मैं समझ गया, मेरे चेहरे पे मुस्कान तैर गई निश्चित तौर पर वो बच्चे अपना होमवर्क नहीं कर रहे थे, मेरा बचपन मेरे सामने था, मैं गलत था, वक़्त अब भी नहीं बदला था सुबह के पटाखों की तलाश अब भी जारी थी, पर एक उपदेश के साथ वो ये के जहां हम जैसे लोग जो टीवी के सामने बैठ कर सिर्फ साफ-सफाई की बातें करते हैं वहीं कोई अपनी मासूम ज़रुरतों को पूरा करने के लिए के लिए इसे चरितार्थ कर रहा था ।

मुझसे रहा नहीं गया, दौड़ के गया और रात के बचे हुए सारे पटाखे ले आया और उन बच्चों के बीच बाँट दिया। काफी खुश हुए सब, उनकी खुशियाँ देख के मैं मन ही मन खुद से एक प्रण कर रहा था कि अगली दिवाली से कुछ पटाखे मैं इन जैसे बच्चों के लिए भी खरीदा करूंगा। मैं भी झाड़ू ले कर सारे कूड़ों को इकट्ठा करने लगा और अधजले पटाखे ढूंढ-ढूंढ के बच्चों को देने लगा। मुझे ऐसा एहसास हो रहा था कि जैसे मानों मैंने सुबह-सुबह अधजला सा अनार या कोई बम पा लिया हो। एक अजब संतुष्टि मिल रही थी। मनु मुस्कुराते हुए ये सब देख रही थी, पर मुझे जो आनंद मिल रहा था इसका अंदाज़ा शायद उसे नहीं था, सूरज निकल आया था, उसकी रोशनी दीयों की रोशनी को चुनौती दे रहा था, मैं सारे कूड़ों को एक जगह इकट्ठा कर के जलाने लगा, बच्चे सुबह के पटाखे चुन कर जा चुके थे, दिशांत अब भी सो रहा था।

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