रवि कुमार गुप्ता की कहानी ‘बेपटरी’

रवि कुमार गुप्ता नवभारत (भुवनेश्वर) में संवाददाता सेंट्रल यूनिवर्सिटी से पढ़ाई संपर्क : 9471222508, 9437767065


रात का सन्नाटा. सङकें वीरान. स्टेशन की ओर तेजी से बढ़ रहा था. ट्रेन छूट ना जाए कहीं! इस डर ने मेरी रफ्तार बढ़ा दी थी. थैंक गॉड! सही टाइम पर स्टेशन पहुंच गया. स्टेशन की भीड़ में सन्नाटा पसरा हुआ था. लेकिन 'यात्रीगण कृपया ध्यान दें...' वाला अनाउंसमेंट सन्नाटा दूर करने का प्रयास कर रहा था.

मन सामने वाली सीट पर किसी लड़की के होने की कामना कर रहा था. काश! इस सफ़र में कोई हमसफर मिल जाता! क्योंकि नौकरी से इस्तीफा देने के बाद गांव में ही बस जाने और खेतीबाड़ी करने का मन बना लिया था. शहर में मन बजबजा चुका था. मुझे लग रहा था कि परदेस की यह अंतिम यात्रा होगी!

ट्रेन में बैठने की बेचैनी बढ़ रही थी. आखिरकार सालों बाद नौकरी का पट्टा तो़ड़ कर गांव जा रहा था. मन खूंटा से छूटे किसी पशु की तरह फांद रहा था. तभी आखिरकार तेज आवाज़ देती, पटरी पर दौड़ती लाल रंग वाली पुरुषोत्तम एक्सप्रेस निर्धारित समय पर आ गई. बोगी में घुसते-घुसते, 'आपकी यात्रा मंगलमय हो' वाली लास्ट लाइन भी मैंने सुन ली.

रात के करीब ग्यारह बज चुके थे. सभी लोग सीट पर सोने की तैयारी कर रहे थे. तभी अचानक फोन की घंटी टुनटुनाई. मम्मी (फोन पर) - "बेटा, गाङी मिलल? सीट पर बइठ गए? खाना खाए? ट्रेन में ठीक से बैठना. बाबू टरेन (ट्रेन) पर चढ़ने से पहीले गोड़ (प्रणाम/नमन) लागे थे कि नहीं? आजकल बहुते एक्सीडेंट हो रहा है. बिसकारमा पूजा (विश्वकर्मा) है गो़ड़ लागे हो तो ठीक ठाक पहुंच जाओगे!"

इससे पहले कि मैं मां की बातों का जवाब दे पाता. नेटवर्क और फोन का नाता टूट गया. बीप की आवाज़ के साथ फोन कट गया. माँ की बातों ने गांव पहुंचने की बेकरारी बढ़ा दी. लेकिन ट्रेन को नमन कर चढ़ने वाली बात दिल से निकल नहीं रही थी. हालांकि कुछ बुजुर्गों को देखा था कि ट्रेन को नमन कर चढ़ रहे थे. भगवान के प्रति भरोसा देखकर भारत की आस्थावान झलक देखने को मिली. लेकिन सरकारी सुरक्षाकर्मियों /अधिकारियों के प्रति टूटता भरोसा भी दिख रहा था.

पटरियों की खटर-पटर मेरी तन्हाई तोङ रही थी. सीट पर बदन फेरबदल कर रहा था. अचानक मेरी नज़र सामने लेटी एक लङकी पर पड़ी. जो कि मेरी तरफ़ देख रही थी. अब मैं भी उसकी ओर देखने लगा. हम दोनों एक-दूसरे को यूं ही मिनटों तक देखते रहे. ऐसा लग रहा था कि वह कुछ बोलना चाहती है. शायद वह परिवार के साथ थी! तभी उसने आंखों से नीचे की ओर इशारा कर बताया कि नीचे सोए हुए लोग उसके साथ हैं. मैं समझ गया.

घड़ी की ओर देखा बारह बज चुके थे. तभी अचानक पटरियों की जोरदार आवाज़ हुई. मानों कि बरसाती बिजली धरती पर गुस्सा निकाल रही हो! लेकिन उसके साथ ही सामने लेटी लड़की चिल्लाते हुए नीचे कूद पड़ी. और फफक-फफक कर रोने लगी. पटरियों की आवाज़ ने डरा दिया था उसको. अपने पापा को बोल रही थी "पापा प्लीज़ अगले स्टेशन उतर जाते हैं. मैं बोल रही थी बस में चलते हैं. मुझे डर लग रहा है कि ट्रेन बेपटरी हो जाएगी."

पटरी की आवाज़ और लङकी की शोर से पूरी बोगी जुगनू बन गयी. हलचल मची हुई थी. इसी बीच मुझे बात करने का मौका मिला. मैंने समझाते हुए कहा कि दुर्घटना कहीं भी और कभी भी हो सकती है! बस या ट्रेन से जाने से क्या होगा? आजकल रेल दुर्घटना ज्यादा हो रही है इसलिए डर लग रहा है! दुर्घटना रोज़-रोज़ थोड़ी हीं होती!

लड़की ने गुस्से से मेरी ओर देखा, "बस हो गया तुम्हारा. अब और डराने की जरूरत नहीं है. पटरियों की खटर-पटर ने पहले से ही डर कायम कर रखा है. तुम न्यूज़ देखो पता चल जाएगा कि बस जर्नी अभी कितनी सेफ है."

उसने मोबाइल का स्क्रीन मेरी ओर कर दिया. मुझे लगा कि अपना नंबर दे रही है! लेकिन गौर से देखा तो किसी न्यूज़ का वेबपेज खुला था. जिसमें दिखा रहा था कि अभी-अभी दो जगहों पर ट्रेन बेपटरी हो गई है. सच में न्यूज़ पढ़कर मेरा मन भी हुआ कि अगले स्टेशन पर उतर ही जाते हैं! लेकिन फिर पाॅकेट टटोल कर विचलित मन शांत हो  गया.

अगले स्टेशन पर ट्रेन रूकी. लड़की अपने पिताजी के साथ उतर गई. मैं टकटकी लगाए देखता रहा. कितना देर देखता. मेरे लिए ना तो ट्रेन वहां ठहर सकती थी और ना ही मैं. खैर! लड़ी भी कहाँ रूकने वाली थी. . देखते ही देखते कुछ समय में वह स्टेशन आंखों से ओझल हो गया. ट्रेन पटरी पर सरपट दौड़ने लगी. शहर के उजाले की तरह वह लड़की भी काले करिया रात में बदल गई. खिङकी से दूर-दूर तक कुछ नहीं दिख रहा था.

सुबह का इंतजार था. कब अपना स्टेशन आएगा! सफ़र में पता नहीं क्यों दिल बच्चा बन जाता है. समय-दूरी सबकुछ पता होने के बावजूद भी मन में बेवजह के सवाल उठते हैं. खिड़की से झांकती आंखें पेड़, गांव, शहर, पहाड़, खेतों में काम करते लोग और रेलवे क्रॉसिंग पर खड़े वाहनों, चरते पशुओं को देखते नहीं थकती है. नया तो कुछ भी नहीं है फिर भी नयापन लगता है. तभी अचानक नदी का पुल पार होने लगा. बरबस 'मसान' फिल्म का गाना 'तू किसी रेल सी गुजरती है/मैं किसी पुल सा थरथराता हूं.' याद आ गया. सोचा कि दुष्यंत कुमार ने शायद ट्रेन सफ़र में ही यह ग़ज़ल लिखी होगी! अब आंखों में नींद समा रही थी. पलकें भारीपन महसूस करने लगी. वाकई ज़िन्दगी का यही सफ़र मस्त है जब हम सोकर मंज़िल तक पहुंचते हैं.

नींद खुली. हड़बड़ा कर उठना चाहा. ऐसा लगा कि मैं सोया रह गया और मेरा स्टेशन पीछे छूट गया है! लेकिन उठने की कोशिश को दो हाथों ने कसकर पकड़ लिया. आंखें भी ठीक से खुल नहीं पा रही थी. दर्द अपनी हदों को पार कर रहा था. मानों जैसे उफनती लहरें किनारे को काट रही है और बांध बेबस कट रहा है. खुद को ट्रेन की सीट से हाॅस्पीटल की बेड पर पाकर माजरा समझ गया.

कुछ समय बाद आंखें खुली. थोड़ी करवट ली. सिरहाने मोबाइल गनगना रहा था. स्क्रीन पर मां लिखा देखकर आंखें डबडबा गई. मन बेचैन हो उठा. फोन हाथ में उठा लिया. पर मुहं पूरी तरह से बैंडेज से बंधा होने के कारण चाहकर भी बोल ना सका. माँ उधर से हमेशा की तरह बोले ही जा रही थी. मेरी आवाज़ ना सुनकर, मन में उम्मीद लेकर छोटे भाई को बोली- "बाद में करीह फोन. बाबू अभी ट्रेन में होई! टावर ना होई!" और फोन कट गया. कुछ देर तक आंखें छत निहारती रही. पूंछकटी छिपकली भी मेरी ओर एकटक देखे जा रही थी.

थोड़ी देर बाद नर्स फोन लेकर बोली "फोन अनलाॅक कीजिये. आपके घर सूचना देनी होगी." मैं फोन में पासवर्ड डालकर दे दिया. नर्स घर वालों को बता कर. एड्रेस-पता नोट करवा दिया. फिर फोन सिरहाने लेकर रख दिया. पता नहीं क्यों? जख़्म से ज्यादा फोन देखकर आंखें नम हो जा रही थी.

सोचने लगा कि काश! मैं उस लड़की के चक्कर में बस से आ गया होता! थोड़ी देर सही मगर घर पर सही सलामत पहुंच गया होता! सोचते-सोचते करवट बदला. बगल वाली बेड पर उस लड़की को देखकर आंखें पूरी तरह खुल गई. सच पूछो तो दर्द बेपटरी हो गया. हाथों से इशारा कर पूछा कि यहाँ कैसे? वह इस बार बिना इशारा किए बोल पड़ी "एक्सीडेंट तो कहीं भी हो सकता है!"

उसकी आवाज़ अच्छी लगी. सोचने लगा; अस्पताल, ट्रेन से भी मस्त जगह है. घर वालों से बिना डरे और बगैर इशारा किए बात तो कर सकते हैं. उससे मस्त एक्सिडेंट है, जो कि मिलने का दुबारा मौका दिया. सोचा कि एकाध महीने में तो नंबर ले ही लूंगा! माँ भी तो आ ही रही है, यहीं पर सब फाइनल कर लिया जाएगा. पता नहीं फिर कभी इतना प्यारा एक्सिडेंट हो ना हो!

 

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