राजकिशोर राजन की चार कविताएं

राजकिशोर राजन

हाय रे भदेस

ऊपर देखो …….. ऊपर और ऊपर
यह वक्त ही
ऊपर-झापर देखने का है

सोचो चाहे जो कुछ
उचारो, सन्मार्ग की बात
लिखो, भाषा में अष्टावक्र विचार
भले उसका अर्थ
हमारे समय के पाणिनी भी न समझ पाएं
रंग दो, पूरे का पूरा रंग दो
जितना रंगोगे, उतना ऊँचा चढ़ोगे

विचारो सन्नाटे पर, पत्तों की सरसराहट पर
अमूर्तन को भजो
मूर्त है भदेस
लड़ो भी तो करो धुरखेल
यही तो हो रहा है
तुम भी वही करो
अपनी भव-बाधा हरो

यह दौर ही ऐसा है
कि सच-सच चिल्लाओ
और जब सच प्रत्यक्ष हो
तो बगल से गुजर जाओ
नहीं तो बीच सड़क पर
होगी तुम्हारी अकालमृत्यु

इस देश में संघर्ष, मुख्यधारा में
एक-दूसरे से आगे निकलने की
बस होड़ा-होड़ी है

इसीलिए, दौड़ो, दौड़ो, भागो
अभी भी वक्त है जागो।

बैल और भक्ति

दउनी में गोल-गोल घूमते जब बैल
रहता मुँह में जाब
खेत में जब चलता हल
रहता मुँह में जाब
खींचते जब गाड़ी
रहता मुँह में जाब

एक नाद वह जगह
जहाँ नाक-मुँह डुबा खाते सानी-पानी
रहते बिना जाब
या बथान में बैठ पगुराते
या जब रहते खूँटे पर बँधे
रहते बिना जाब

यह जाब ही है जो बैल को
हाँकता नाक की सीध में
सब कुछ के बाद

चार पैर, मुँह, आँख, नाक
और देह में मालिक से ज्यादा ताकत
पर मालिक के पास जाब
छड़ी, पगहा और नाक में
नथ डालने की शक्ति

बैल क्या करे !
करनी ही पड़ती है भक्ति

जिसके पास जाब,
जिसके पास नथ
वही सब दिन नाथ
इस नास्तिक समय में भी
बैल और भक्ति साथ-साथ
बैल अनाथ।

भरे पेट की आग

सब्जी बाजार के बगल में
कचरे के ढेर में साथ-साथ
लगे हैं कुत्ते, गोमाता
मिटाने पेट की आग

सुबह-सुबह का वक्त है
न कुत्ते भौंक रहे
न गोमाता कुंठित
यही वक्त है, जिसे जो मिले
पेट की आग बुझाई जाए
नहीं तो ये सड़ी-गली सब्जियाँ
बदबूदार चाउमीन, समोसा-चाट
ढो ले जाएगी, नगर निगम की गाड़ी

जो पेट से बेफिक्र हैं
घूम रहे झक्क-सफेद दिल्ली-पटना
लगाने को आग।

एक सेवानिवृत्त अफसर के लिए

उन्होंने नहीं की कभी किसी की सेवा
चूँकि अफसर थे और जब तक नौकरी में रहे
उनकी ही होती रही सेवा

उनके बाल अफसरी
उनकी चाल अफसरी
उनकी त्वचा, उनकी हर बात अफसरी

वे वानरराज बाली को याद करते श्रद्धापूर्वक
नख से शिख तक श्रद्धा में
अपने को समझते बाली
और जो आता उनके सामने
उन्हें मातहत नजर आता

मुहल्ले भर में पीठ पीछे
उड़ती उनकी खिल्ली, लोग करते ठिठोली
अकड़ूँ, चैपट, सिरफिरा जैसे नाम से
बुलाया जाता उनको

वे इतने बड़े अफसर थे कि
ताउम्र नहीं समझ पाए
कि मजबूरी और नहीं हो जरूरत तो
इस देश के लोग कुछ नहीं समझते
प्रधानमंत्री को भी

सदियों से यहाँ मान्यता
अपनी-अपनी किस्मत
अपनी-अपनी राह।

—————————————————-

परिचय
राजकिशोर राजन
देश की तमाम पत्रिकाओं में कविताएं, समीक्षाएं आदि प्रकाशित। अब तक चार काव्य-संग्रह  “बस क्षण भर के लिए“, “नूरानीबाग“ ,“ढील हेरती लड़की“ एवं ”कुशीनारा  से गुजरते” प्रकाशित (स्वर-एकादष के अन्तर्गत 11 कवियों के साथ कविताएँ)-2013। कई नाटकों का लेखन व निर्देशन, कई कविताओं का भारतीय भाषाओं में अनुवाद
पुरस्कार एवं सम्मान: आरसी प्रसाद सिंह राष्ट्रीय सम्मान, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद  द्वारा सम्मान, जनकवि रामदेव भावुक स्मृति सम्मान आदि
राजभाषा विभाग, पूर्व-मध्य रेल, हाजीपुर में नौकरी
संपर्क : 59, एल.आई.सी.कॉलोनी, कंकड़बाग, पत्रकारनगर, पटना-20

You may also like...

1 Response

  1. समय से संवाद करती इन कविताओं के लिए बहुत बहुत बधाई ! महोदय, किसी जातीय जीवन में विपल्वकारी परिवर्तन तथा उत्कर्ष के लिए नये उत्साह, न ई दृष्टि और नये पथ का सृजन भी अपेक्षित है।ऐसे आपकी कविता शब्द शिल्प, कविता की जमीन और जमीन की कविता के लिए जानी और मानी जाती है।पुन: बधाई।

Leave a Reply