राजनीति और सरोकार

संजय स्वतंत्र

द लास्च कोच : किस्त 8

आज दफ्तर जाने के लिए घर से निकला तो देखा कि चुनाव जीत चुके नेताजी होर्डिंग पर टंग गए हैं। अब वे तस्वीरों में ही नजर आाएंगे, उन सरमाएदारों के साथ जो चुनाव के दौरान उनके साथ लगे रहे। जमीन-जायदाद का कारोबार करने वालों और व्यापारी बंधुओं के बीच करबद्ध नेताजी अब होर्डिंग से उतर कर कभी सड़कों पर नहीं आएंगे और न हमारे साथ मेट्रो-बसों में सफर करेंगे। वे लोकतंत्र की बात करेंगे, पर ‘लोक’ से दूर रहेंगे। 
राजनीति से आप कितना भी परहेज कर लें। यह आपका पीछा नहीं छोड़ती। आप कहीं भी हों- दफ्तर में या पास-पड़ोस में, यहां तक कि सड़क पर भी क्यों न हों, आप बच नहीं सकते। राजनीति तो आपको घर में भी घेर लेती है। मैंने राजनीति पढ़ी है। स्कूल में नंबर भी खूब मिले, मगर राजनीति करनी कभी नहीं आई। यों भी यह अनाड़ी आदमी के बूते की बात नहीं। इसके लिए आपको चिकना घड़ा बनना पड़ता है। 
दरअसल, राजनीति मेें एक चेहरा आगे होता है, तो दूसरा पीछे। अब तक जिन नेताओं से मिला, सबके दो चेहरे दिखे। हाथी के दांत वाला मुहावरा इन पर खूब चरितार्थ होता है। तो कुल जमा नतीजा यह रहा कि राजनीति से मुझे सदैव अरुचि रही। 
पच्चीस साल से सक्रिय पत्रकारिता करते हुए मैंने देखा है कि दिल्ली में जब भी चुनाव का मौसम आता है, पूरा मीडिया इसकी लहर में डूब जाता है। हालांकि राजनीति और मीडिया की गलबहियां पहले जैसे नहीं रहीं। एक समय था कि असहमति जता देने पर भी मिठास रहती थी। अब आलम यह है कि जरा सा तीखा सवाल पूछा नहीं कि सामने वाले की नजरें टेढ़ी हो जाती हैं। सुर में सुर मिलाने वाले पत्रकार सफल और नेताजी भी खुश। यह एक नई युगलबंदी है। देश में अब नया लोकतंत्र बन रहा है। 
चुनाव कोई भी हो, उम्मीदवारों से ज्यादा उत्साह कार्यकर्ताओं में दिखता है। ऐसा क्यों होता है? यह आप-हम अच्छी तरह जानते हैं। दिल्ली नगर निकायों के चुनाव के दिनों की बात है। उस दिन मैं दफ्तर के लिए घर से निकला, तो न जाने कहां से पता लगाते हुए एक उम्मीदवार के कार्यकर्ता लोग प्रेस विज्ञप्ति लेकर मेट्रो स्टेशन पर पहुंच गए। मैंने उनसे पूछा- यह भी कोई जगह है मिलने की? दफ्तर चले आते। कार्यकर्ता बोले- सर क्या करते। नेताजी ने आपके पीछे दौड़ा दिया। कहा है कि चार लाइन छप जाए तो बड़ी कृपा होगी। 
......... हैरत की बात है कि सोशल मीडिया और खबरिया चैनलों के दौर में भी लोग अखबार में छपना चाहते हैं। सच में प्रिंट का अपना सुख-संतोष है। प्रचार का दौर जैसे-जैसे बढ़ता जाता है, नेताओं में जनता के करीब जाने के साथ मीडिया में दिखने की लालसा भी बढ़ती जाती है। इस फेर में आरोप-प्रत्यारोप और दावे-प्रतिदावे का जो दौर चलता है, उससे समझ में नहीं आता कि कौन सच्चा है और कौन झूठा।
तो उस दिन नेताजी के चंपुओं से पिंड छुड़ा कर प्लेटफार्म पर पहुंचा। गनीमत है कि मेट्रो में राजनीतिक दलों को प्रचार करने की इजाजत नहीं। नहीं तो परचे-पोस्टर चिपका कर इसकी सूरत भी बिगाड़ देते। चुनावी सीजन में कोई इलाका नहीं बचता, जहां प्रचार के दौरान शोरगुल न होता हो। सड़कें-गलियां वहीं रह जाती हैं और नेता आगे बढ़ जाते हैं। वे पीछे मुड़ कर नहीं देखते। ऊबड़-खाबड़ गलियों और सड़कों की किस्मत नहीं बदलती और न ही इन पर चलने वाले लोगों का भाग्य। 
मेट्रो के आखिरी डिब्बे में बैठने के बाद सोचने लगा कि राजनीति कितनी बदल गई है। मिशन के नाम पर यहां आने वाले लोगों ने तो इसे प्रोफेशन ही बना डाला। एक समय था जब दिल्ली के पूर्व मुख्य कार्यकारी पार्षद जगप्रवेश जी विज्ञप्ति लेकर खुद ही अखबार के दफ्तरों में पहुंच जाते। यही नहीं कई दिग्गज नेता भी ऐसा ही करते। लगातार विज्ञप्ति लेकर अखबार के दफ्तर के चक्कर काटने वाले दो युवा नेता तो बाद में मंत्री भी बने। और एक यह नेता है जो चंपुओं के सहारे प्रचार में जुटा है। 
चुनावी शोर में मुद्दे तो बहुत उठते हैं। मगर वक्त के साथ वे बिला जाते हैं। जीते हुए उम्मीदवार की राजनीति वातानुकूलित कमरों में बैठ कर और महंगी गाड़ियों में घूमते हुए बीतती है। इसके बाद गरमी-सर्दी और बारिश से बेहाल जनता की कोई खैर-खबर लेने नहीं आता। भीषण गरमी में यह देखने कोई नहीं आता कि स्टाप पर खड़ी जनता बसों का किस तरह इंतजार करती हैं। बारिश के दिनों में सड़कों पर यातायात जाम होने की खबरें आती हैं, तब भी ये नेता लोगों की सुध लेने अपनी कोठियों से नहीं निकलते। अलबत्ता बयानबाजी खूब होती है। वहीं सर्दियों में मजदूरों-रिक्शेवालों और फुटपाथ पर सोने वाले बेघर लोगों की भी कौन चिंता करता है। जिंदगी तो सब की कट जाती है। कई लोग कष्ट में काटते हैं, तो कुछ लोग मजे में। राजनीति का समाज से सरोकार होता तो आज सभी खुशनसीब होते, मगर दुख ये कि हम अपनी बदनसीबी पर रोते हैं। 
तो उस दिन भी मेट्रो अपनी रफ्तार से चल रही थी। इसी के साथ चिंतन यात्रा भी। जैसा कि मैंने कहा कि राजनीति मेरा विषय नहीं है क्योंकि मैं दिल से सोचता हूं। इसलिए मैं यहां दांवपेच देख कर उस वक्त हैरान हो जाता हूं जब पत्नी ही पति के खिलाफ चुनाव मैदान में उतर जाती है। या फिर चाचा और भतीजा आमने-सामने आ जाता है। पता नहीं यह कौन सा तिकड़म है कि आपके इलाके का या बाहर कोई भी गुमनाम शख्स आपका नुमाइंदा बन कर ताल ठोकने लगता है। और आप बस मुंह देखते रह जाते हैं, यह सोचते हुए कि इससे काबिल तो हम खुद थे। 
राजीव चौक उतरा तो मेरा मोबाइल फोन घनघना उठा। भीड़ से बचते-बचाते जेब से फोन निकाल कर कॉल सुनता हूं। उधर से नेताजी का स्वर था- ‘नमस्कार श्रीमन। एक विज्ञप्ति भिजवाई है। खबर लग जाए तो बड़ी मेहरबानी।’ इस पर मेरा जवाब था- ‘खबर छोड़िए। आपने कोई काम किया हो तो बताइए?’ इस सवाल से मेरा नुमांइदा बनने को बेताब नेताजी अकबका गए। मैंने दूसरा सवाल दागा - ‘आप कभी मिले नहीं। मुझे कैसे ढूंढ़ लिया?’ नेताजी का जवाब था- ‘जीत कर एक साल में आपके इलाके को चमका दूंगा। आप से नहीं मिले तो क्या हुआ साहेब। हमारे लोग तो आपको जानते हैं। मैं तो आपके घर आ रहा था, मगर आप मिले ही नहीं।’ 
नेताजी के इस झूठ से मुझे गुस्सा आ गया। मैंने तल्खी से जवाब दिया-अच्छा हुआ जो हम नहीं मिले क्योंकि आप चुनाव जीतने के बाद भी मेरे लिए अजनबी ही रहेंगे। उस जनता लिए भी जो आपको वोट देगी। वे गलियां और सड़कें भी अजनबी हो जाएंगी, जहां से प्रचार करते हुए आप गुजरे। उन लोगों के चेहरे भी भूल जाएंगे जो आपके स्वागत में अपनी चौखट पर खड़े थे। वे चौराहे भी भूल जाएंगे जहां से आपका काफिला गुजरा और जहां सालों तक गुहार करने के बाद भी ट्रैफिक सिग्नल न लगने से हर साल कई नौजवान सड़क हादसे में मर गए।
....... नेता जी दलील दे रहे थे, मगर मैंने मोबाइल को स्विच आॅफ कर दिया। स्टेशन की सीढ़ियां चढ़ता रहा इस तसल्ली के साथ कि आज मैंने कम से कम एक नेता को तो खरी-खरी सुना दी है। ऐसे नेताओं से क्या बात करना? जो चुनाव जीतने के बाद सिर्फ होर्डिंग पर नजर आए या फिर महंगी कारों में बैठ कर जनता के सामने से गुजर जाए। 
काश कि होर्डिंग पर टंगे ये नेता बरसों से फुटपाथ पर सो रहे बेघर लोगों के लिए एक बार सोचते। या फिर उन नौनिहालों के लिए कुछ करते जो स्कूल जाने के बजाय गलियों में कचरा बीनते अक्सर नजर आते हैं। और कुछ नहीं तो चौराहों पर भीख मांगते लोगों को स्वरोजगार के लिए मदद कर देते। क्या आप ऐसे नेताओं से नया हिंदुस्तान बनने की उम्मीद करेंगे जो पांच साल आरोप-प्रत्यारोप में काट देते हैं? या फिर किसी न किसी बहाने खुद भी होर्डिंग पर टंगे रहते हैं।

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