राजेश”ललित”शर्मा की कविता ‘दम लगा के हई शा’

दम लगा के हईशा
हिम्मत न हार
थक मत
अब चल उठ जा

चल उठ
मत घुट
घुट घुट कर
मर जाएगा
हाथ कुछ नहीं आएगा
दो नहीं कई पाटों में पिस जायेगा

घुड़सवार ही गिरते हैं
गिर गिर कर फिर उठते हैं
फिर जा घोड़े पर चढ़ते हैं
छूट गया सफ़र बाकी
चल उसको पूरा करते हैं
मंज़िल को बढ़ चलते हैं

हैं अवरोध कई
नवबोध कई
राह कहाँ आसान नई
काँटे कहीं ,शिला कहीं
पर्वत खड़ा है सीना ताने
कही तपती रेत का सागर है
चल बैठने से कुछ न होगा
सफ़र तो चलने से ही तय होगा

दम लगा के हई शा
थक मत
अब उठ जा
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2 Responses

  1. DeepeshSharma says:

    दम लगा के हई शा” प्रेरणादायक कविता है।आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।

  2. राजेश"ललित"शर्मा says:

    मोना को मेरी कवितायें पढ़ने और उस पर प्रतिक्रिया देने के लिये धन्यवाद।

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