राजेश”ललित”शर्मा की दो कविताएं

समय

समय ज़रा सरक
बैठने दे मुझे
अपने साथ
गुज़ारने दे चंद पल
कुछ करें बात
चलें कुछ क़दम
समझें हम तुम्हें
तुम हमें समझो
सच में बहुत
तेज़ चलते हो
रुको तो
सुनो तो
फिर निकल गये आगे
चलो मैं ही दम भरता हूँ
ज़िंदगी ही से सवाल करता हूँ
जवाब जब मिलेगा
सो मिलेगा।

उलझे धागे

कभी खोले हैं
उलझे धागे
उनको लपेटा हो
खोल कर फिर से
ढूँढा हो एक सिरा
और पहुँचे
सुलझाते सुलझाते
दूसरे सिरे तक
कहीं बीच में गाँठ
पड़ जाये तो
खोल देते हो
उसी वक़्त
तरकीब लड़ाते हो
या फिर उलझा देते
सुलझा सिरा भी

बड़ा साधना पड़ता है
खोलने को गाँठें
अपने आप को
सिरे से सिरा मिलाने को
एक दूसरे को अपनाने को
आख़िर सिलना होता है
फटे को,किसी उधड़े को
ताकि नंगापन नज़र न आये
लगे ऐसे कि ठीक ठाक है
सब कुछ
हालाँकि सिलने को
लगाना होती है गाँठ
दो सिरों को जोड़ने के लिये
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3 Responses

  1. Deepesh Shsrma says:

    समय और उलझे धागे दोनों ही अलग तरह की कविताएँ हैं।

  2. Deepesh Sharma says:

    राजेश”ललित”शर्मा की दोनों कवितायें,(समय) और (उलझे धागे)अलग क़िस्म की कवितायें हैं।बहुत अच्छे ।आगे भी पढ़ने को मिलेंगी कवितायें।

  3. Mona says:

    A beautiful poem “Uljhe Dhage”

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