राजेश ‘ललित’ शर्मा की चार कविताएं

एक
किसने कहा
वक़्त कम है,
वह दिग्-दिगन्त है,
अनंत है;
बस मेरे पास,
ही शेष कम है।
मैं ज़रा खर्चीला हूँ।

दो

हिसाब—-?

क्या——-?

मुझे सब है पता,
हाशिये पर ,
होगा सिर्फ़ /मेरा नाम।
देनदारियाँ होंगी
सारी की सारी,
सिर्फ़ मेरे /नाम ;
भरे होंगे हाशिये ।
चुकाऊँगा सब;
रहूँगा सिर्फ़
हाशिये पर।
हिसाब नहीं ,
करुंगा कभी।
कभी भी नहीं ।
तीन

मुझे बता ,
कहाँ तक,
है मेरी हद।
तुम्हें भी,
मालूम होनी चाहिये;
तुम्हारी हद।
तो तय है!
बँटवारा ?
हां—-!
देखना,
लकीर में,
वो जो,
खींची गई,
हद की,
कहीं छूटी होगी
कोई जगह——?

चार

मैं ही निकला,
कुछ कमअक्ल;
वो आया,
और समझा गया,
मुझे! मेरी ही,
बात का मतलब?
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