रिजवान अली की कहानी ‘वो ठंडी रात’

अली रिज़वान 
शिक्षा- जामिया मिलिया इस्लामिया नई दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता। 
लेखन- तहलका हिंदी में आपबीती कलम के लिए लिख चुके हैं। इंडिया न्यूज़ में काम कर चुके हैं। आजकल यूट्यूब चैनल कहानी डिपो में कार्य कर रहे हैं। 
मोबाइल- 9717583570

केशव को दिल्ली आये अभी 6 महीने ही हुए थे और इसी बीच अर्जुन की शादी आ गई। पहले तो जाने का मन ही नहीं था। लेकिन दोस्त की शादी थी इसलिए आना पड़ा,,,,दरअसल शादी से दिक्कत नहीं थी लेकिन यह भीड़-भाड़  उसे पसंद नहीं है। ऊपर से 3 दिन और वो भी एक छोटे से गांव में--ये सोच कर मन ऊब गया। जैसा कि पहले ही बता दिया दोस्त की शादी है तो जाना ही पड़ेगा ख़ुशी ख़ुशी जाओ या दुःखी इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प ही नहीं है। क्योंकि अर्जुन का परिवार और कुछ रिश्तेदार शहर में ही थे तो सबने मिलकर योजना बनाई कि एक बस किराये पर ले लेते हैं जिससे सभी लोग एक साथ चल सकें।

7 अप्रैल 2012. हाँ यही तारीख थी। अच्छे से याद है। सभी को 4 बजे निकलना था,,,,,,,,साढ़े तीन बज गए थे और केशव अभी ट्रैफिक में ही फसा था।,,,,वो ऑटो वाले पर एक दो बार झुंझलाया भी पर वो भी क्या करता? यह दिल्ली का ट्रैफिक कभी ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेता है।,,,,,,,पिछले 30 मिनट में अर्जुन केशव को 4 बार कॉल कर चुका था। और उसका वही जवाब बस 10 मिनट में पहुँच रहा हूँ। आखिर पहुँचते-पहुँचते 4.15 हो गए।,,,अर्जुन तो कुछ नहीं बोला लेकिन विनय और तरुण उस पर टूट पड़े। मामा जी ने बस घूरती हुई नज़रों से देखा,,,,और वो मन ही मन सोच रहा था जब इतनी ही जल्दी मची थी तो चले क्यों नहीं गए,,,मेरी जान छूट जाती। विनय ने केशव का बैग उठाया और सब बस में घुस गए. आगे की सारी सीटें भर चुकी थी। पीछे जाकर देखा तो कुछ खाली थी,,,चिड़चिड़े मन से वो सीट पर पसर गया।

विनय ने पूछा अपना माल ( बियर) लाया है क्या. केशव ने गुस्से भरी नज़रों से देखा और बोला क्यों यहीं नागिन डान्स करना है क्या?,,,,विनय दांत निपोरने लगा,,, बस अब चलने लगी थी केशव खिड़की की और देखने लगा। बस में सभी के लगभग अपने-अपने ग्रुप बंट चुके थे। सास-बहू, छोटा भीम, निन्जा हथौड़ी से लेकर देश की राजनीति हर विषय पर गर्मा-गर्मी थी।,,,,,,,आगे कुछ लड़कियाँ भी थी शायद वो आलिया भट की नई ड्रेस की चर्चा कर रही थी।,,,,केशव सभी को देख रहा था और साथ ही बगल में बैठे अपने दोस्तों की पक-पक भी जो अर्जुन को सुहागरात के लिए नए नए नुस्ख़े दे रहे थे।,,,,,उसने अपना हैडफोन निकाला और कानों में लगा कर खिड़की की तरफ नज़रें टिका दी।,,,,,,,बस अगले एक घंटे के बाद रात का खाने खाने के लिए एक ढाबे पर रुकी। उतर कर हाथ मुँह धोया सब लोग खाने के लिए अंदर चले गए। अब तक केशव का मूड भी ठीक हो गया था,,,,,,अब आ ही गया हूँ तो क्यों न शादी का मज़ा ही लिया जाये। वैसे भी जनवरी की रात थी मौसम ठण्ड ज़रूर था लेकिन एक अलग रुमानियत थी।,,,,,खाना खा कर सब लोग बस के अंदर आ गए। केशव एक तरफ खड़ा छुप कर सिगरेट पी रहा था।,,,तभी उसकी नज़र बस के अंदर जाती हुई उस लड़की पर पड़ी,,,,हलके नीले रंग की जींस पर काले रंग का लैदर जैकेट पहन रखा था बालों को घुमा कर उसने पीछे बांध रखा था।,,,,,,उसने जल्दी से अपनी सिगरेट फेंकी और बस में घुस गया। अंदर घुसते हुए उसने इतना देख लिया था कि वो आगे वाली सीट पर बैठी थी।,,,,,,बस अभी थोड़ी ही दूर चली थी की अर्जुन के मामा जी ने ड्राइवर को आदेश दे दिया कि लाइट बंद कर दी जाएँ।,,,इस बार तो मुझे सच में मामा जी पर बहुत गुस्सा आया लेकिन करता भी क्या। बस गुस्से का  घूंट पीकर रह गया।,,,,,,तरुण और विनय अभी भी अर्जुन को अपना ज्ञान बाँट रहे थे जबकि शादी दोनों में से एक की भी नहीं हुई थी। केशव भी थोड़ी देर विनय और तरुण के साथ अर्जुन की टाँग खीचने लगा।,,,,,,अभी मुश्किल से 2 ही बजे थे और सब सो चुके थे। केशव अकेला बोर हो रहा था सोचा कुछ देर ड्राइवर के पास जाकर बैठ जाऊँ अपनी सीट से उठा और उसके पास जाकर बैठ गया।,,,,,,ड्राइवर से बात करते करते उसकी नज़र एक बार उस लड़की पर चली गई। उसकी नज़रें अपने मोबाइल की डिस्प्ले पर गड़ी हुई थी और कानों में हेडफोन ठूंस रखा था।,,,,,केशव ने  मन ही मन सोचा महादेव इतनी कृपा भी अच्छी नहीं। वो पहले आया तो ड्राइवर से बातें करने के लिए था लेकिन अब उसकी बातों का जवाब हूँ, हाँ, जी से ही दे रहा था और उसका सारा ध्यान उस लड़की की तरफ ही था।,,,,,,नहीं यह प्यार का मसला नहीं था यह तो खूबसूरत मौसम का ख़ुमार था जो इस वक़्त उस पर चढ़ा हुआ था।,,,वैसे भी सफ़र में यदि इतना खुशनुमा हमसफ़र मिल जाये तो यह पिछले जन्म के पुण्य ही है। फिर भी आप इसे प्यार तो नहीं कह सकते वो खुद से ही बात कर रहा था । उसकी आँखों में अब नींद भरी थी लेकिन उठने का मन नहीं था। यहाँ बैठ कर इंजन की गर्माहट भी महसूस हो रही थी।,,,,,और चाँद से सुन्दर चेहरे का दीदार भी। वैसे भी इस घने कोहरे में चाँद तो दिखना असंभव ही था। अंततः उसने नींद के सामने हथियार डाल ही दिए। वैसे भी किसी ने कहा है दुनिया में नींद से ज्यादा प्यारा कुछ भी नहीं है।,,,,,और इस वक़्त ऐसा ही कुछ उसे महसूस हो रहा था। जब वो उसके पास से गुज़रा तो एक नज़र उसने केशव की  तरफ़ देखा मोबाइल की रौशनी में उसका चेहरा साफ़ दिखाई दे रहा था।,,,,,,,वो अब अपनी सीट पर आकर बैठ गया या यूँ कहें लेटने जैसी स्तिथि में ही था। तरुण और विनय भी सो रहे थे। अर्जुन सोते सोते मुस्कुरा रहा था शायद वो सपने में अपनी होने वाली पत्नी के हाथों में हाथ डाल का किसी नदी के किनारे पर बैठा हुआ हरी हरी घास से खेल रहा है। और उसकी पत्नी उसके सर में अपनी नर्म-नर्म उँगलियाँ फेर रही है।

मामा की तेज़ आवाज़ पर आँख खुली। अब सुबह हो चुकी थी। लेकिन बाहर देखने पर अभी भी रात ही लग रही थी क्योंकि सूरज कोहरे की ओट में छिपा था।,,,,,,सब अपना-अपना सामान लेकर नीचे उतरने लगे। परिवार के दूसरे लोग सभी के  स्वागत के लिए खड़े थे। क्योंकि लड़की वाले और लड़के वाले दोनों ही एक ही गांव के थे तो स्वागत के लिए सब एक साथ ही इकठ्ठा हो गए थे।,,,,,,,,नींद पूरी न होने की वज़ह से केशव का  दिमाग भारी-भारी हो रहा था। किसी को प्रणाम तो किसी के चरण स्पर्श करते हुए सब अंदर आ गए।,,,,अर्जुन के चाचा का लड़का केशव और उसके दोस्तों को कमरे तक ले आया। केशव ने  विनय और तरुण से कहा तुम नहा लो मैं अभी थोड़ी देर और लेट जाता हूँ।,,,,,,,लेटे हुए कुछ ही देर हुई होगी की फिर से आँख लग गई। लेकिन विनय ने फिर से उठा दिया।,,,,वो भी नहाने के लिए अंदर चला गया। नहा कर तैयार हुए तब तक चाचा का बेटा फिर बुलाने के लिए आ गया कि नाश्ता तैयार है। सब नाश्ते के लिए बाहर आ गए।,,,,,,चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लिए सब एक दूसरे को देख रहे थे। सभी मेहमान नाश्ते के लिए बैठ गए। इस बार जब केशव की नज़र उठी तो सामने वो लड़की दिखाई दी पीले सूट में बाल खुले हुए माथे पर चंदन का छोटा सा टीका सुराही जैसी पतली और लंबी गर्दन किसी देवी की मूरत लग रही थी।,,,,,उसके होठ ऐसे हिल रहे थे  जैसे गुलाब के फूल से तितली उड़ कर जाये और उस फूल की पंखुड़ियां एक दूसरे से टकरा रही हों।,,,,,,,उसके बालों से टपकती पानी की बूंदें जैसे सीप में गिर कर मोती बन जाएँगी।,,,,,,,,झटके से जब उसने गर्दन को घुमाया तो एक साथ पानी की इतनी बूंदे गिरी जैसे किसी मोतियों से भरी हुई थाल को हवा में उछाल दिया हो।,,,,,एक पानी की बूंद उसके गालों से होते हुए होठों पर आ रुकी। वो इक बूंद इस वक़्त ऐसी लग रहा थी  जैसे कमल के फूल पर शबनम की पहली बूंद गिरी हो। विनय ने जैसे ही केशव हाथ में चाय पकड़ाई वो उसकी गर्माहट के साथ वापस नाश्ते की टेबल पर आ गया।,,,,,,,,विनय शायद उसके हावभाव पहचान गया था लेकिन उसने अभी कुछ कहा नहीं था। नाश्ते के बाद अर्जुन, विनय, तरुण और केशव सब अर्जुन के चाचा के घर चले गए वहां सभी से मिलने के बाद अर्जुन के ससुराल से बुलावा आ गया वहां से जब लौटे तो दोपहर हो गया था।

दोपहर का खाना खा कर केशव कमरे में आराम करने चला गया विनय और तरुण अर्जुन के साथ बाहर ही बैठे रहे।,,,केशव ने  जाते -जाते चारों ओर नज़रें घुमा कर देखा लेकिन वो कहीं नहीं दिखी। वो अंदर जाकर लेट गया थोड़ी देर लेटा रहा तो आँख लग गई।,,,,,,बच्चों के शोर से जल्दी ही उठ गया लगा जैसे सोया ही नहीं था। टाइम देखा तो शाम के 4 बज रहे थे। शादी के घर में चहल-पहल कितनी होती है वो हम सभी ने देख ही रखा होगा।,,,,केशव ने  अर्जुन को देखा पर वो कहीं दिखाई नहीं दिया विनय और तरुण का भी पता नहीं था फिर अर्जुन को फ़ोन किया तो उसने बताया कि वो पास वाले गांव में एक दोस्त के घर पर आये हैं। वो सो रहा था इसलिए उसे उठाया नहीं।,,,,,,,,केशव ने  फोन काट कर इधर उधर देखा सिगरेट की भी तलब लगी थी। छत पर जाने का रास्ता देखने लगा पास में खेल रहे बच्चों से पूछा उन्होंने बताया कि अंदर लॉबी में किचन के बराबर से रास्ता है।,,,,,,,वो जैसे ही उधर बढ़ रहा था वो लड़की किचन के गेट में घुस रही थी।,,,,केशव ने  इस बार मौका नहीं गंवाया। एक दम से पूछ लिया कि छत का रास्ता किधर से है। उसने कहा सामने से लेफ्ट।,,,,,,,,मन तो हो रहा था कि यहीं रुक जाएँ लेकिन ऐसा संभव नहीं था। वो ऊपर चला गया। जाकर जल्दी से सिगरेट सुलगा दी। खेतों से आती हुई ठण्डी हवा उसके चेहरे को छु रही थी। एक पल में ही पूरा शरीर ठंडा हो गया था।,,,,,,सिगरेट से कुछ गर्माहट लेने की कोशिश कर रहा था लेकिन यह काफी नहीं था। आज पूरा दिन धूप नहीं निकली थी।,,,,,पीछे से क़दमों की आवाज़ आई। उसने सिगरेट एक तरफ फेंक दी। वो चाय लेकर आई थी। उसने चाय की प्याली केशव की  ओर बढ़ा दी। इस वक़्त चाय किसी सपने के सच हो जाने जैसा था और वो भी उस इंसान के हाथ से जो खुद आजकल सपनों में आता हो।,,,,,,,वो चाय देकर जाने लगी केशव ने  थैंक यू बोला। वो पीछे मुड़ी और बोली,,, यह गंदी आदत है, उसने  सवालिया नज़रों से उसे देखा उसने सिगरेट की तरफ इशारा करते हुए कहा।,,,,,आप अर्जुन भईया के दोस्त हैं इसलिए कह रहे हैं। यह गन्दी आदत है सिगरेट छोड़ दीजिये। शायद उसने केशव के  पैर के नीचे दबा हुआ सिगरेट देख लिया था।,,,,,,,वो चली गई लेकिन उसके आखरी शब्द केशव के  कानों में गूंजते रहे।,,,,,अर्जुन भईया।

शाम हो गई थी और अर्जुन भी आ गया था। केशव के  मन में बहुत सवाल थे लेकिन इनका जवाब कौन दे सकता था? अर्जुन से पूछना अच्छा नहीं समझा।,,,,एक बार मन में आया विनय से पुछू लेकिन उसे भी कहाँ पता होगा। रात के खाने के बाद सब लोगों ने अर्जुन को घेर लिया।,,,,,,,सभी लोगों का मन था कि नाच गाना किया जाए। केशव की तो साँसें ही रुक गई। डांस के नाम पर वो तो ज़ीरो था। लेकिन मामा ने सभी के अरमान ठण्डे कर दिए। साफ़ शब्दों में इंकार कर दिया जो करना है दिन में करना रात में शोर करने की ज़रुरत नहीं है।,,,,,आज पहली बार केशव को  मामा की बात पसंद आई थी। लेकिन फिर विचार बना कि सभी लोग अपनी पसंद का एक-एक गाना सुनाएंगे।,,,,,,लेकिन यहाँ भी केशव का हाथ कमज़ोर था फिर भी मैदान छोड़ कर नहीं भाग सकते थे। सोचा देखते हैं क्या होता है। शुरुआत लड़कों को करनी पड़ी पहला नंबर विनय से शुरू हुआ।,,,,,, विनय ने अपना वही गाना गाया, जो हजारों बार गा चुका है। "यह शाम मस्तानी मदहोश किये जाये" अब लड़कियों की बारी आई। सभी ने कहा शालिनी तुम गाओ शालिनी तुम गाओ। उसने गाना शुरू किया "साजन मेरा उस पार है मिलने को दिल बेक़रार है"।,,,,इस तरह केशव  को  उसका नाम पता लगा। अब लग रहा था मानों वो उसके लिए ही गा रही है।,,,,गाते-गाते एक दो बार उसकी नज़रें केशव की  नज़रों से टकराईं थी। वो पीछे बैठा बस एक टक उसे देख रहा था। अब अगले गाने की बारी लड़कों की थी। अर्जुन ने केशव को  तलाश करते हुए पीछे देखा और कहा चलो केशव तुम गाओ। वो इंकार करता रहा उसने बहुत समझाया कि तुम सब जानते हो कि मुझे गाना नहीं आता है। लेकिन आज जैसे कि वो सुनने को तैयार ही नहीं हैं। लड़कियों की तरफ से भी शोर होने लगा तरुण ने ज़ोर देकर कहा कि गाओ न यार हम हार जायेंगे।,,,,,,,,गाना तो मुझे नहीं आता है मैं कविता सुना सकता हूँ। प्रस्ताव लड़कियों के सामने रखा गया सभी ने इंकार कर दिया,,,,,गाना ही गाना पड़ेगा यह कोई कवि सम्मलेन नहीं है पीछे से एक लड़की ने कहा।,,,,लेकिन इसी बीच शालिनी ने हामी भर दी। अब केशव की  बारी थी कविता सुनाने की,,,,,,

 

क्षोभ मुझको क्यों रहे?**

----------------------------

मैं चली थी राह में

कोई बाँह न थी बाँह में

राह का कोई पता नहीं

साथ की भी थाह नहीं

क्षोभ मुझको क्यों रहे?

 

न उसको मेरा बोध था

अस्तित्व मेरा शोध था

मैं चुनती उसको फूल सम

वो चुभता मुझको शूल बन

क्षोभ मुझको क्यों रहे?

 

मैं मार्ग उसका बुहारती

हृदय में आरती उतारती

उसकी स्मित पर निहाल थी

किन्तु हँसी मेरी मुहाल थी

क्षोभ मुझको क्यों रहे?

 

रंग मैं उसके मल चुकी

उसके ढंग में भी ढल चुकी

वो किन्तु मुझको खींचता

शब्दों से अपने बेधता

क्षोभ मुझको क्यों रहे?

 

मैं बढ़ चुकी हूँ भाग्य से

मेरे प्रिय के सौभाग्य से

सब बन्धनों को तोड़ती

मन के बन्धनों को जोड़ती

क्षोभ मुझको क्यों रहे?

 

सभी ने ज़ोरदार तालियां बजाई शालिनी के चेहरे पर मुस्कान थी। वो भी ताली बजा रही थी। अर्जुन ने केशव की  पीठ थपथपाई।,,,,,एक के  बाद दूसरा-तीसरा यूँ ही प्रोग्राम चलता रहा। रात के 12 बजे गए थे। मामा ने इस बार आकर सबको उठा दिया। जाते वक़्त केशव शालिनी को देख रहा था और वो भी समझ गई थी कि वो उसे ही देख रहा है। समझ तो पहले दिन से ही गई थी लेकिन अभी तक दोनों की कोई बात नहीं हुई थी। बस उस दिन सिगरेट वाली बात के अलावा।,,,,,,वो तीनों लेटते ही सो गए थे। लेकिन केशव को  नींद नहीं आ रही थी। सोचा छत पर जाकर एक सिगरेट पी लेता हूँ। उसने एक मोटी सी चादर लपेटी और उठ कर छत पर चला गया।,,,,,,छत पर एक ओर बैठने का स्थान बना हुआ था बांस के डंडों से बनाया हुआ एक छोटा सा कमरा सा जिसकी सिर्फ छत थी बाकि चारों ओर से खुला हुआ। वहां एक पुराना सोफ़ा और एक कुर्सी पड़ी थी। वो सोफे पर बैठ कर सिगरेट जलाने लगा।,,,,,,,अभी आधी सिगरेट ही पी थी किसी के आने की आहट हुई उसने  सिगरेट फेंक दी।

वो इस ओर ही आ रही थी लेकिन उसके कदम रुक गए शायद उसने अभी तक केशव को देखा नहीं था। वो वापस जाने लगी। केशव ने  हिम्मत जुटा कर उसे आवाज़ दी।,,,,,,आप बैठ जाइये मैं नीचे चला जाता हूँ।,,,,,नहीं नहीं आप बैठिए मुझे पता नहीं था आप यहाँ बैठे हैं। नींद नहीं आ रही थी इसलिए ऊपर चली आई। सर्दी की रातें मुझे अच्छी लगती हैं। खुले आसमान के नीचे देर रात तक बैठना।,,,,,,तभी उसे एक छींक आ गई। केशव ने कहा शायद आपकी सेहत अभी आपको खुले आसमान के नीचे बैठने की इज़ाजत नहीं दे रही है। आप इधर  आ जाइये। वो थोड़ी असहज होती हुई अंदर आ गई।,,,,,उसने केशव की ओर देखते हुए कहा शायद आपको अपनी जान की परवाह नहीं है तभी आप सिगरेट नहीं छोड़ रहे हैं।,,,,,आखिर ऐसे क्या होता है इसमें जो छोड़ा नहीं जाता,,,, केशव के पास अभी शालिनी के सवाल का जवाब नहीं था या वो इस सवाल के लिए तैयार नहीं था।,,,,,उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या कहे।,,,,,सिगरेट की वज़ह से नहीं बल्कि उसने कल्पना भी नहीं की थी कि इस वक़्त शालिनी भी यहाँ आ सकती है। एक पल को उसे लग रहा था कि वो कोई सपना देख रहा है,,,,,,लेकिन फिर भी उसने पूछ लिया अर्जुन आपका कैसा भाई है।,,,,

मैं उसके मामा की बेटी हूँ।

तुम यहाँ पहली बार आये हो। शालिनी ने पूछा।,, हाँ,,इस बार भी शादी की वज़ह से आना हुआ है वरना मेरा तो मन ही नहीं था।,,,,,शालिनी कुछ नहीं बोली।

फिर केशव ने पूछा तुम दिल्ली में रहती हो।

नहीं मैं बंगलोर में रहती हूँ मेरा MBA का आखिरी सेमेस्टर ।,,,शायद उसके बाद दिल्ली ही आ जाऊं।,,,,,, वेल आप क्या करते हैं दिल्ली में,,शालिनी ने पूछा।

मैं सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूँ। दिल्ली में अभी एक प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है।

ओह वैरी नाईस,,शालिनी मुसकुरते हुए बोली।

अच्छा गुड नाईट मिस्टर केशव। शालिनी ने उठते हुए कहा।,,,,,,, केशव का मन तो था कि वो उसे रोक ले लेकिन चाह कर भी बोल न पाया। शालिनी नीचे आ गई और केशव अभी भी वहीं बैठा रहा। कुछ देर बार केशव भी नीचे आ गया।,,,,,,,आज रात की शादी थी इसलिए सभी जल्दी उठ गए थे और अपनी-अपनी तैयारी में लगे थे। इस बीच एक दो बार केशव का शालिनी से आमना-सामना हुआ था। लेकिन बात करने की मोहलत नहीं मिली थी।,,,,,,,बहुत कोशिश के बाद अखिर केशव को एक मौका मिल ही गया। केशव ने शालिनी से कहा कि वो शाम को 7 बजे छत पर वेट करेगा।

शालिनी ने पूछा व्हाई?,,,,केशव ने कोई जवाब नहीं दिया और वहां से चला गया।

शाम को सभी लोग शादी की रस्में पूरी करने में लगे थे।,,,,,केशव तय समय पर छत पर शालिनी का  इंतज़ार कर रहा था। पता नहीं क्यों लेकिन उसे यकीन था कि शालिनी आयेगी ज़रूर।,,,,,,आखिर 20 मिनट के बाद उसके क़दमों की आहट सुनाई दी। आज केशव सिगरेट पीने नहीं शालिनी से मिलने के लिए छत पर आया था। और वो उसके आने का इंतज़ार बेसब्री से कर रहा था।

आज उसने आसमानी कलर का लहंगा पहन रखा था। बाल खुले हुए थे, माथे पर छोटी सी बिंदी लगी थी। होंठ सुर्ख़ गुलाब की पंखुड़ियों के जैसे चेहरा ऐसे चमक रहा था मनो वर्षों बाद आज काली रात में चाँद  ने चारों और अपनी रोशनी फैला दी हो। सारा संसार दुधिया हो गया हो। हिंदी कहानियों की सारी परियां आज शालिनी के अंदर समा गई हों। केशव बस एकटक उसे देख रहा था। जैसे वर्षों के प्यासे के हाथों अमृत आ गया हो।  या रेगिस्तान में अचानक प्यासे के सामने पानी का फव्वारा फूट पड़े।,,,,,,,,शालिनी केशव के सामने आकर खड़ी हो गई।

उसने केशव से कहा कैसी लग रही हूँ मैं। केशव निःशब्द था। उसे शब्द नहीं मिल रहे थे कि वो क्या कहे।

इतने में शालिनी ने बात आगे बढ़ा दी, ''हाँ, बताओ क्या बात थी? क्यों बुलाया था मुझे?

केशव ने एक लंबी साँस ली, ''शालिनी मैं कहाँ से और कैसे शुरू करूँ मुझे नहीं पता. यह वक़्त सही है या गलत यह भी  नहीं पता,,,, लेकिन मैं इतना जनता हूँ कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ. इतना प्यार कि मैं आज ही इसी मंडप में तुमसे शादी करने को तैयार हूँ।

शालिनी यह सुन कर हैरान नहीं हुई शायद उसे इस बात का पहले से ही अंदाज़ा था। उसने सिर्फ इतना ही कहा यह नहीं हो सकता। और न ही मैं तुमसे प्यार करती हूँ।,,,,,यह कहते हुए शालिनी नीची जाने लगी।,केशव ने पूछना चाहा लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया और वहां से चली गई।

अगले दिन मेहमान ज़्यादा थे। सब भागदौड़ में लगे रहे लेकिन केशव कहीं गुमसुम था। विनय तरुण या अर्जुन के सामने वो खुश होने का नाटक ज़रूर कर रहा था।,,,,,,देर रात तक सभी लोग शदी के जश्न में डूबे रहे।

सुबह केशव बहुत देर से सोकर उठा था। आज सभी लोगों की दावत चाचा जी के घर पर थी।,,,,,जब केशव सोकर उठा तरुण, विनय और अर्जुन चाचा के घर जाने की तैयारी कर रहे थे।

अर्जुन ने कहा, ''तू नहा कर तैयार रहना विनय तुझे लेने के लिए आ जायेगा। अभी शालिनी भी तैयार नहीं है। हम लोग निकल रहे हैं। तू फ़ोन कर देना।" शालिनी का नाम सुनकर केशव थोड़ा चौक गया। आखिर उस रात के सवाल का उसे अभी तक सही जवाब नहीं मिला था। और कल से उसे शालिनी मिली भी नहीं थी जो वो उससे बात कर पाता।,,,,,केशव नहाने के लिए बाथरूम में चला गया। तैयार होकर वो शालिनी को ढूढ़ने दूसरे कमरे में चला गया।

शालिनी पहनने के लिए कपडे सलेक्ट कर रही थी। उसने केशव से पूछा, ''चलो, तुम बताओ आज मैं कौन सी ड्रेस पहनूं लेकिन केशव ने सवाल को अनसुना कर दिया।,,,,,और अपना सवाल दाग दिया। आखिर तुम प्यार क्यों नहीं कर सकती? हर चीज़ की कोई न कोई वज़ह होती है। तुम्हारे प्यार न करने की क्या वज़ह है।,,,,,,,शालिनी ने फिर उसे टालना चाहा और कहा मुझे चेंज करना है देर हो रही है। लेकिन इस बार केशव ने उसका हाथ पकड़ लिया। आज तुम्हें बताना ही पड़ेगा। मैं सच सुनकर ही जाऊँगा। केशव ने भी जैसे आज ज़िद पकड़ ली थी।

तो सुनो,,,,,,,क्योंकि मैं किसी और से प्यार करती हूँ। मेरी इंगेजमेंट हो चुकी है और अगले साल हमारी शादी होने वाली है।

केशव ने अभी तक शालिनी का हाथ पकड़ रखा था लेकिन अचानक उसकी पकड़ ढीली पड़ गई और शालिनी का हाथ छूट गया। वो लगभग गिरने वाली हालत में था शालिनी ने उसका कंधा पकड़ा और बेड पर बैठा दिया,,,,,,वो जल्दी से पानी लेने के लिए दौड़ी। केशव पूरी तरह से अवसाद की स्थिति में था। शालिनी ने उसे पानी पिलाया लेकिन उसका दिमाग सुन्न हो चुका था। शालिनी ने उसे दोनों हाथों से ज़ोर से हिलाया अचानक जैसे वो गहरी नींद से जाग गया हो।,,,,शालिनी ने पानी का गिलास बढाया एक घूँट पानी पी कर वो वहां से उठ कर चला गया।,,,,,,,,,कुछ देर बात विनय आ गया लेकिन केशव अभी भी अपने कमरे में लेटा हुआ था। उसने विनय से जाने के लिए इंकार कर दिया तबियत ख़राब होने का बहाना बना कर।,,,,,,,,शालिनी सब जानती थी लेकिन वो ख़मोश रही। विनय को संदेह तो था अब पूरा यक़ीन हो गया था लेकिन उसने भी कुछ नहीं कहा शायद इस समय शब्दों से ज़्यादा केशव के हालात उसकी दास्ताँ बया कर रहे थे।

रात के 10 बज रहे थे घर में ख़ूब चहल-पहल थी। यह शोर अब केशव को परेशान कर रहा था। वो इससे बचने के लिए छत पर चला गया। आज हवा तेज़ थी उसकी उँगलियाँ ठण्डी हो रही थी।,,,,,,,उसने अपनी दाहिनी जेब से सिगरेट की डब्बी निकाली और सुलगा दी। वो लगतार सिगरेट पी रहा था। उसने यह पाँचवी सिगरेट सुलगाई थी।,,,,यकायक उसे किसी के क़दमों को आहट महसूस हुई। आज उसने सिगरेट फेंकी नहीं। उसके होंठो में सिगरेट दबी थी।  यूँ ही पीछे मुड़ा और एक गहरी साँस ली।,,,,,,,,,शायद हवा के तेज़ झोखे ने उसके दिल में शालिनी के होने का वहम जगा दिया था।,,,,,,,,छत पर उसके सिवा कोई न था। एक और हवा के झोके के साथ कोहरे की एक परत केशव को गीला करके चली गई।

**कहानी में जिस कविता को शामिल किया गया है, उसे अनिता सिंह ने लिखा है।

You may also like...

Leave a Reply