रौंदी गई घास प्रगतिशील या उस पर चलने वाले?

जयप्रकाश मानस

हर शुक्रवार, किस्त 14

1 अक्टूबर, 2015

ऊँचे-नीचे

पेड़ कितने भी उँचे क्यों न हों, उसके फल नीचे ही गिरते हैं ।

चाहूँगा मैं तुझे साँझ-सवेरे

 50 से ज़्यादा सालों तक हिंदी फ़िल्मों के लिए गीत लिखने और प्रगतिशील आंदोलन के उर्दू के सबसे बड़े शायरों में से एक थे महरुह सुल्तानपुरी ।उन्होंने अपनी रचनाओं के ज़रिए देश, समाज और साहित्य को नयी दिशा देने का काम किया। पंडित नेहरू की नीतियों के खिलाफ़ एक जोशीली कविता लिखने के कारण मजरूह सुल्तानपुरी को सवा साल जेल में रहना पड़ा।उनकी जयंती (1अक्टूबर) पर यह गीत भी -मालूम ना था इतनी, मुश्किल हैं मेरी राहें, अरमां के बहे आँसू, हसरत ने भरीं आहें, हर साथी छूट गया, हर साथी छूट गया, हम जी के क्या करेंगे, हम जी के क्या करेंगे,जब दिल ही टूट गया….

50 साल की रूपाम्बरा

‘अरास्नंसुश्रीरा’ यानी चौंथे सप्तक के कवि अवधेश कुमार, राजकुमार कुंभज, स्वदेश भारती, नंद किशोर आचार्य, सुमन राजे, श्रीराम वर्मा, राजेन्द्र किशोर। उनमें से एक और आज भी सतत् सक्रिय स्वदेश भारती जी से कल डॉ. सुधीर शर्मा के संग मिलना हुआ ।

वे ‘रूपाम्बरा’ (राष्ट्रीय हिंदी अकादमी) की स्वर्णजयंती समारोह के सिलसिले में रायपुर आये हुए हैं ।स्वेदश भारती जी अपनी रचनात्मक यात्रा को याद करते हुए बताते हैं – ‘युयुत्सावादी नव लेखन के लिए आज से 50 साल पहले 1965 में ‘रूपाम्बरा’ का गठन हुआ था जिसमें जगदीश चतुर्वेदी, गंगाप्रसाद विमल, नारायण लाल परमार आदि कवि थे।

इस बीच नया प्रतीक, शताब्दी, लहर, कल्पना, समीक्षा जैसी पत्रिकाएं बंद हो गईं, परन्तु साहित्य और भाषा की मशाल लिए रूपाम्बरा साहित्य के कंटकाकीर्ण पथ पर डगमग पग चल रही है।” मैं उन्हें बधाई देता हूँ और घर लौटते वक्त सोचता हूँ – ”इसे ही कहते हैं सच्ची साधना ! आज हम लोग तो एक दो साल में अपनी साहित्यिक संस्थाओं में ज़हर बो देते हैं।

 कैसे थे मुक्तिबोध ?

“हाँ, वे ईश्वर पर भी विश्वास करते थे । सुबह के समय लघु रुद्र की पोथी पढ़ते थे ।शिवरात्रि के दिन उपवास रखते थे । एक बार शमशेर जी शिवरात्रि के दिन आ गये । यह जानकर कि मुक्तिबोध जी का उपवास है, वे भी उपासे रहे ।जब कभी उज्जैन जाते महाकाल के दर्शन के लिए ज़रूर जाते थे ।”

डॉ. राजेन्द्र मिश्र जी आज हमें मुक्तिबोध के व्यक्तित्व के बारे में बारीक़ बातें बता रहे थे । उन्हें शांता मुक्तिबोध जी भी ऐसा ही बताती थीं ।

2 अक्टूबर, 2015

 एक गाँधी और

मैंने गाँधी जी को देखा नहीं, केवल पढ़ा है ।लेकिन ख्यात मूर्तिकार पद्मश्री जे. एम. नेलसन मुझे गाँधी जी की तरह ही दिखते हैं । उनके हाथों से बनी गाँधी जी की छोटी-बड़ी हज़ारों मूर्तियाँ देश के गाँव-गाँव में पूजा पाती हैं । सिर्फ़ इतना ही नहीं समय निकालकर वे गरीबों के गाँव-बस्ती की ओर दौड़ जाते हैं । जगह-जगह कुष्ठ रोगियों के लिए शिविर लगाते हैं । पति-पत्नी दोनों उनकी सेवा करते हैं । इसके अलावा महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कुछ न कुछ करते रहते हैं ।हर साल भिलाई में विद्यार्थियों की रचनात्मकता के लिए विविध आयोजन करते हैं। रचनाकारों के सम्मान के लिए सपरिवार जुटे रहते हैं ।गाँव-गली, खेत-खलिहान के अनुयायी श्री नेलसन कहते हैं – “तन, मन और धन का उपयोग तो सभी अपने लिए करते हैं इंसान वही जो ज़रूरतमंद के लिए कुछ सोचे !”

मुझे उनका घर (कार्यशाला) वर्धा आश्रम जैसा ही प्रतीत होता है ।

 यही लिखते वे

कहते हैं गाँधी जी 2-3 बार छत्तीसगढ़ आये थे ।आज के दिन यदि वे हिन्दी के किसी भी समारोह में ग़लती से रायपुर में बुला लिये जाते तो वहाँ से लौटकर अपनी डायरी में शायद यही लिखते :अब आयोजन साध्य है, प्रयोजन तो केवल साधन ! मैं नहीं रोक सकता किसी को हिन्दी के नाम पर !!

सच यही

घास पैरों के नीचे भले रौंदी जाती है, एक जगह पड़ी-पड़ी उदास गीत रुँधे कंठ से गाती है, सच यही; उसके बल पर ही बैल, ऊँट, घोड़े, खच्चर, गदहे ज़माने को गतिशील बनाते हैं ।

क्या इसका आशय यह है कि प्रगतिशील रौंदने वाले पैर नहीं होते, प्रगतिशील रौंदी हुई घास होती है !

या रौंदी गयी घास के सहारे जीकर दिखाने वाले जानवर भी प्रगतिशील होते हैं ! !

शायद ज्ञानीजन ही असली मर्म जानते होंगे !!!

शुभारंभ आज

डॉ. हरप्रसाद दास भारतीय कविता के मर्मज्ञ, साहित्य अकादमी सम्मान मूर्तिदेवी पुरस्कार से विभूषित आधुनिक ओड़िया भाषा के मूर्धन्य कवि, लेखक हैं ।उनकी 60 श्रेष्ठ कविताओं का अनुवाद कार्य आज से प्रारंभ किया है । पहलीकविता –

‘मंत्र’

चंद्रमा को चाबी के गुच्छे-सा घुमाते-घुमाते

भार्गवी नदी में

फेंकने वाली इस्पाती उँगली को देख

आकाश को फोड़कर आर-पार

काफ़ी है चले जाना

फल काटने की छूरी में

लगे भयानक दु:स्वप्न के खून को देख

वर्ना

मिट्टी के नीचे संचित

पूर्वजों का शाप

तूझे छू लेगा

कल सुबह सुबह कल ।

दूर है किनारा

अपने हिस्से के 18,250 वें दिन की शुरुआत करने से पहले गाँव-गली, धूप-छाँव, नदी-नाले, पर्वत-घाटी, संगी-साथी सभी का धन्यवाद !सबसे पहले पूर्वज़ो के लिए प्रार्थना करते हुए – अयोध्या मथुरा माया, काशी कांची अवंतिका । पूरी द्वारावती चैव, सप्तैता मोक्ष दायिकाः।। आज मेरे जन्म दिन पर श्रीमती जी ने रात ढलने से पहले हारमोनियम पर यह गीत सुनाकर पहला रसीला उपहार दिया :

दूर है किनारा…

गहरी नदी की धारा

टूटी तेरी नैय्या, माँझी खेते जाओ रे

हे नैय्या खेते जाओ रे….

मैने उसे अपनी नहीं,सुभाष काक जी ( भारतीय-अमेरिकी कवि, दार्शनिक और वैज्ञानिक हैं। वे अमेरिका के ओक्लाहोमा प्रान्त में संगणक विज्ञान के प्रोफेसर हैं। उनके कई ग्रन्थ वेद, कला और इतिहास पर भी प्रकाशित हुए हैं।) की कविता ‘चंद्रमा’ (जिसे ‘पांडुलिपि’, अंक 2, जनवरी-मार्च, 2011 में मैंने प्रकाशित की थी) सुनाई :

चंद्रमा को केवल देखिए नहीं

नीचे ले आइए

इसकी आकृति

अपने साथ रखिए

थैली में, गोल पैसे की तरह

इसे काटिए

बाँटिए।

इसे दो बनाकर

आँखों पे रखिए

सुख चैन के लिए।

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