लोकप्रिय साहित्य एक आवश्यक सीढ़ी

वीणा भाटिया

एक समय हिंदी में लघु पत्रिका आंदोलन ने काफी जोर पकड़ा था। अमूमन हर बड़े शहर ही नहीं, छोटे कस्बों से भी लघु पत्रिकाएं निकलती थीं। भले ही इनका प्रसार कम होता था, पर स्थानीय स्तर पर ही सही, साहित्य के प्रचार-प्रसार में इनकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इन पत्रिकाओं में राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित लेखकों और कवियों की रचनाएं तो प्रकाशित होती ही थीं, साथ ही युवा लेखकों को भी स्थान मिलता था। कुछ पत्रिकाएं बड़े पैमाने पर निकलती थीं, जैसे ज्ञानरंजन के संपादन में ‘पहल’, पर इन्हें भी लघु पत्रिका ही माना जाता था। ऐसा इसलिए कि ये अव्यासायिक थीं। हिंदी में लेखकों-कवियों की एक नई पीढ़ी पैदा करने में इन पत्रिकाओं की उल्लेखनीय भूमिका रही है। पर बाद में लघु पत्रिका आंदोलन में एक ठहराव-सा आ गया। कहा गया कि इन पत्रिकाओं का आर्थिक आधार बहुत कमजोर होता था, इस वजह से काफी पत्रिकाएं साल-दो साल प्रकाशित होने के बाद दम तोड़ देती थीं। कुछ पत्रिकाएं तो दो-तीन अंकों के प्रकाशन के बाद ही बंद हो जाती थीं। लेकिन जहां एक पत्रिका बंद होती थी, दो नई पत्रिकाएं सामने आ जाती थीं। बावजूद ये पत्रिकाएं साहित्य को जन-जन तक ले जाने का माध्यम नहीं बन सकीं। वित्तीय संकट के कारण इन पत्रिकाओं का लंबे समय तक निकल पाना कठिन हो जाता था।

आज भी साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है, यद्यपि 80 के दशक में जितना हो रहा था, उससे बहुत ही कम। वजह ये है कि अब प्रकाशन का खर्च बढ़ गया है और इंटरनेट के सर्वसुलभ हो जाने से ज्यादातर लेखक ब्लॉग आदि माध्यमों पर सक्रिय हो गए हैं। कुछ साहित्यिक वेबसाइटें भी आ गई हैं, जिनके माध्यम से नये लेखकों-कवियों की रचनाएं सामने आ रही हैं। बावजूद बड़े मीडिया घरानों से जो साहित्यिक पत्रिकाएं निकलती थीं, उनका मुकाबला न तो लघु पत्रिकाएं कर सकीं, न ये ब्लॉग और साहित्यिक बेवसाइटें कर सकती हैं। सारिका जैसी विशुद्ध साहित्यिक पत्रिका की लोकप्रियता का आलम ये था कि उसके विशेषांकों की घोषणा होते ही पहले से ही प्रतियां बुक होने लगती थीं। सारिका, कादम्बिनी, धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी पत्रिकाओं में हर तरह के लेखक छपते थे। इनमें लोकप्रिय रचनाएं तो छपती ही थीं, साथ ही गंभीर साहित्यिक विमर्श भी। उल्लेखनीय है जब ‘सारिका’ में यह घोषणा की जाती थी कि हरिशंकर परसाई का व्यंग्य धारावाहिक रूप से प्रकाशित होगा तो उसकी बिक्री बढ़ जाती थी और लोग पहले से ही अपनी प्रति बुक करा लेते थे। इससे जाहिर होता है कि जनसामान्य में साहित्य के प्रति रुचि थी। बहुत से लोगों ने हिंदी और दूसरी भाषाओं के लेखकों का परिचय इन्ही पत्रिकाओं से जाना। कन्हैयालाल नंदन जब सारिका के संपादक बने तो उन्होंने उसका हर अंक एक विशेषांक के रूप में निकाला। कई प्रमुख विदेशी साहित्यकारों पर विशेषांक निकाले। उन्होंने लू शुन पर जो विशेषांक निकाला, उससे नई पीढ़ी के कई पाठक पहली बार इस महान लेखक से परिचित हुए। कहने का मतलब यह है कि बड़े मीडिया घरानों से निकलने वाली पत्रिकाओं ने बाजार में प्रसार बनाने की अपनी ताकत के बल पर साहित्य को जन-जन तक पहुंचाने में विशेष भूमिका निभाई है। लेकिन आज ऐसी पत्रिकाएं नहीं निकल पा रही हैं। लघु पत्रिकाएं अपनी लघुता के कारण ही यह गुरुत्तर दायित्व नहीं निभा सकतीं।

बड़े मीडिया घरानों द्वारा लोकप्रिय साहित्य की पत्रिकाएं बंद किए जाने के पीछे अक्सर यह कहा जाता है कि इनसे मुनाफा नहीं मिला पा रहा था। लेकिन क्या यह सच है? धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान तो विशुद्ध साहित्य की पत्रिका नहीं थी। इनमें हर तरह की सामग्री होती थी, पर साहित्य भी प्रमुखता से प्रकाशित होता था। इनकी प्रसार संख्या लाखों में थी। आज भी लोग इन पत्रिकाओं को बड़ी हसरत के साथ याद करते हैं। कोई शक नहीं, यदि इन पत्रिकाओं का पुनर्प्रकाशन हो तो ये नहीं बिकें। ये पत्रिकाएं साहित्य का पाठक निर्मित करती थीं, जो बहुत ही जरूरी कार्य था।

विख्यात लेखक और नाटककार असग़र वजाहत कहते हैं कि हिंदी में बहुत अच्छी साहित्यिक पत्रिकाओं की कमी नहीं हैं। लेकिन उनका प्रसार बहुत सीमित होता है। दो-चार को छोड़ कर प्रायः सभी साहित्यिक पत्रिकाएं लेखकों और चुनिंदा पाठकों के सीमित दायरे में रहती हैं। बड़ी साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रसार भी 8-10 हज़ार से अधिक नहीं है। एक समय था जब ‘धर्मयुग’ जैसी लोकप्रिय साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिका एक लाख के आसपास छपती और बिकती थी। ‘धर्मयुग’ और ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ जैसी लोकप्रिय पत्रिकाओं के माध्यम से साहित्य के अच्छे पाठक तैयार होते थे। अब चूँकि वे पत्रिकाएं नहीं, इसलिए साहित्य के पाठक बनने की प्रक्रिया मंद पड़ गयी है। लोकप्रिय साहित्य एक आवश्यक सीढ़ी है जो पाठक को साहित्य तक ले जाती है। उसके न रहने से साहित्य का दायरा बहुत छोटा हो जाता है।

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