लौट आओ गौरैया

संजय स्वतंत्र

द लास्ट कोच : किस्त 5

दिल्ली में बरसों से नन्हीं सुकोमल गौरैया नहीं दिख रही। किसी को मालूम भी नहीं कि वह कहां गुम हो गई। एक दिन दफ्तर के सबसे युवा साथी धीरेंद्र ने बताया कि उसके करावल नगर इलाके में गौरैया दिखने लगी है। यह जान कर मुझे बहुत खुशी हुई। मैं दिल्ली के जिस पॉश इलाके में रहता हूं, वह मुगल काल में औरंगजेब का कभी ‘फार्महाउस’ हुआ करता था। ठीक उसी तरह जैसे आजकल के रईसों के फार्महाउस आप महरौली या मांडी गांव में देखते हैं।
……… तो मेरे इलाके में बादशाह का बनवाया शीशमहल भी है जो आज जर्जर हालत में हैं। शालीमार बाग को देख कर कोई नहीं कह सकता कि यहां कभी घना जंगल रहा होगा। पांच दशक पहले इस इलाके में आने से भी लोग कतराते थे। यहां पक्षियों का बसेरा जिस बेदर्दी से उजाड़ा गया, इसे देख कर हैरानी होती है कि विकास के पैमाने पर मनुष्यों को तो रखा गया, लेकिन पक्षियों और वन्य जीवों को मरने पर मजबूर कर दिया गया। 
उस दिन आजादपुर मेट्रो स्टेशन पर सहसा ही मुझे फुदकती गौरैया दिख गई। तभी कबूतरों की फड़फड़ाहट की आवाज से डर कर वह न जाने कहां छिप गई। नन्हीं सी यह जान जरा भी आवाज बर्दाश्त नहीं कर पाती। खैर जब मैं मेट्रो में सवार हुआ तो लगा कि हमने आधुनिकता, विकास और रफ्तार की होड़ में क्या कुछ खो दिया है। इंसानियत के साथ प्रकृति के दोस्त भी जो हमारे जीवन का हिस्सा थे। 
मुझे याद है जब दिल्ली में मेट्रो का निर्माण शुरू नहीं हुआ था, तब दिल्ली की सड़कों पर पेड़ डिवाइडर का काम करते थे। अस्सी के दशक तक वाहनों की संख्या इतनी भर थी कि राजधानी में ट्रैफिक जाम की खबर अखबारों में नहीं छपती थी। सड़क के बीचों-बीच हजारों पेड़ पक्षियों का बसेरा थे। मगर मेट्रो के निर्माण के क्रम में इन पेड़ों को हटाना जरूरी था। हालांकि इसकी भरपाई भी की गई। मगर कहते हैं न कि एक बार घर उजड़ जाए, तो दोबारा बसना मुश्किल होता है। दिल्ली में गौरैयों का भी यही हाल हुआ। 
आजादपुर से किंग्जवे कैम्प तक पिलर से मेट्रो गुजर रही है, लेकिन हरे-भरे पेड़ कहां है? और जो किनारे लगे हैं, वे भारी यातायात और वाहनों के शोर से गुमसुम खड़े हैं। दिल्ली का ट्रैफिक रात 12 बजे तक भी थमता नहीं। धूल-धुआं और ध्वनि प्रदूषण ने जब नागरिकों का जीना दुश्वार कर दिया है तो इन पक्षियों की क्या बिसात? कभी कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलिए। ठंडी छांव के लिए आप तरस जाएंगे। 
जगह-जगह उग आए सीमेंट के जंगल में गौरैया अपना बसेरा बनाए भी तो कहां? एक समय था जब घर-आंंगन में फुदकती गौरैया एकदम पास आ जाती थी। सुबह सूरज दादा खिड़की पर आकर झांकें, इससे पहले ही वह अपनी चहचहाहट से सभी को जगा देती थी। अब पहले जैसा कलरव कहां सुनाई देता है? 
मेट्रो के आज के इस सफर में सोच रहा हूं कि तुम्हारा रूठना जायज है गौरैया। दीवार घड़ियों में चिड़ियों की कृत्रिम चहचहाहट तो हमें भली लगती है, लेकिन तुम्हारी याद किसी को नहीं आती। अपने लिए दाना- पानी की जुगाड़ में लगे लोगों को तुम्हारी क्या चिंता? हमने अपना घरौंदा बनाने का तो जतन किया, मगर तुम्हारा छीन लिया। 
मेरी प्यारी गौरैया…….तुम्हें याद होगा कि जब हमारे पुराने घरों में छज्जे होते थे और हर कमरे में रोशनदान भी। जहां तुम तिनका-तिनका जोड़ कर अपना घर बना लेती थी। फिर अपने बच्चों के लिए दाना लाने फुर्र से उड़ जाती थी। अब सीमेंट और शीशे-स्टील वाले फ्लैटों में एक छोटी सी बालकनी ही तो बची है। तुम घर बनाओगी भी तो कहां?
बचे-खुचे पेड़ों पर अपना घर बसा भी लो तो दिल्ली की सड़कों पर रेंग रहे लाखों वाहनों के शोर और जहरीले धुएं से तुम्हारा जी घबराता होगा। पंडारा रोड स्थित सरकारी आवास में छत पर कभी तुम्हें देखा करता था। यहां तक कि इंडिया गेट परिसर में शाम ढलने पर तुम अक्सर दिख जाती थी। आज तो तुम वहां भी नजर नहीं आती। 
मेरी भोली गौरैया। तुम्हारे संगी-साथी भी कहां दिखते हैं अब। मैना जो तुम्हारे संग डोला करती थी, वह भूले-भटके नजर तो आती है, मगर कोई गीत नहीं सुनाती। वन्य प्रेमियों ने बताया है कि तुम कीटनाशकों के बढ़ते इस्तेमाल से डर गई हो। फ्लैटों और उसके आसपास कीड़े-मकोड़े मर जाएगे तो जाएंगे, पर भला तुम खाओगी क्या? दो जून की रोटी तो सभी को चाहिए, लेकिन हम शहरियों ने वह भी छीन लिया है तुमसे।
मगर इसका मतलब यह कतई नहीं कि तुम्हारी चिंता कोई नहीं कर रहा। ऐसे कई भलेमानस हैं जो तुम्हारे लिए दाना-पानी से लेकर घरौंदे तक की चिंता करते हैं। मगर तुम हो कि आती ही नहीं। तुम्हारी तरह और भी कई चिड़िया हैं, जिनकी संख्या घटने की बात सामने आई है। यूरोपीय देशों में आम पाए जाने वाले स्काईलार्क और डव की हालत भी तुम्हारी तरह ही है। उनका भी बसेरा उजड़ गया है। अब किस-किस का नाम लूं। ब्राजील की स्पिक्स, मकाव और हवाई द्वीप का पू उली, कोई तो नहीं बचा।
देखो न गौरैया, मैं इस समय मेट्रो में सफर कर रहा हूं, मगर सीमेंट के जंगलों से ऊपर मुझे एक भी चिड़िया उड़ती नहीं दिख रही। तुम्हारे भाई तोते महाराज भी नहीं दिखते कभी। उनकी मीठी बोली सुनने के लिए कान तरस गए हैं। मुश्किल हजार सही, लेकिन तुम जानती हो कि मनुष्यों से तुम्हारा सदियों पुराना नाता है। हमसे यों दूर न जाओ। फिर से चली आओ। हर बार की तरह इस बार भी मिट्टी के बर्तन में तुम्हारे लिए पानी रखूंगा। और अलग से दाना भी। तुम आओगी ना….? मेरे घर में कहीं भी जगह मिल जाए, तुम अपना घरौंदा बना लेना। …………..अच्छा हम चलते हैं। मेरा आफिस आ गया है। मगर तुम आना जरूर। मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा गौरैया।

 

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