वर्जनाओं को तोड़ती कहानियों का संग्रह ‘इश्क़ की दुकान बंद है’

पुस्तक समीक्षा

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव


जिस्म मुहब्बत की प्रेरक तत्व है। जब किसी को देखकर दिल धड़क उठता है, उसकी मुहब्बत में पागल हो जाता है तो इसका मतलब है कि आंखों ने जिस खूबसूरती को देखा, दिल उसका दीवाना हो गया। इस बात से इनकार करना सच्चाई को नकारना है लेकिन यह भी सच है कि हर मुहब्बत में देह ही प्रेरक तत्व नहीं होती। एक दूसरे को जानना-समझना और फिर प्यार में डूब जाना –ऐसी मुहब्बत में दिल ज्यादा हावी होता, जिस्म कम।
युवा कथाकार नरेंद्र सैनी इस बात को भली-भांति समझते हैं कि प्यार का रास्ता देह से होकर ही गुजरता है। मुहब्बत के आग़ाज़ की प्रेरणा चाहें देह हो या मन—देर-सबेर पहुंचना देह तक ही। सोशल मीडिया के आज के अत्याधुनिक दौर में प्लेटोनिक लव की कल्पना सूरज की रोशनी में जुगनू तलाशने जैसा ही है। वाणी प्रकाशन से सद्य:प्रकाशित अपने कहानी संग्रह ‘इश्क़ की दुकान बंद है’ की किसी भी कहानी में नरेंद्र सूरज की रोशनी में जुगून तलाशने का काम नहीं करते। इन कहानियों में वो जिस शिद्दत के साथ इश्क की बात करते हैं, उसी शिद्दत के साथ शरीर की। अगर वो गहराई के साथ दिल से दिल के रिश्ते की बात करते हैं तो सेक्स के जरिए इसी रिश्ते के इज़हार को भी विस्तार देने से झिझकते नहीं है।
ऐसा कर नरेंद्र ना केवल कई वर्जनाओं को तोड़ते हैं बल्कि एक बड़ा खतरा भी उठाते हैं। खतरा इसलिए क्योंकि हिन्दी साहित्य में सेक्स आज भी वर्ज्य है। हिन्दी कहानियों-उपन्यासों में प्रेम बिखरा पड़ा है लेकिन प्रेमी-प्रेमिका के मिलन पर एकदम खामोशी। इस प्रवृत्ति को ऑस्कर वाइल्ड के शब्दों में ऐसे कह सकते हैं कि, ‘Everything in the world is about sex except sex.’ कुछेक लेखकों को छोड़ दें तो वर्जना की इस दीवार को तोड़ने की हिम्मत कोई नहीं जुटा सका।जिन्होंने हिम्मत जुटाई, वो आलोचकों के हमले के शिकार हुए लेकिन नरेंद्र सैनी ने बड़े ही प्रभावी ढंग से वर्जना की इस दीवार को तोड़ा है।
‘इश्क़ की दुकान बंद है’ में कुल आठ कहानियां हैं। ‘इक लड़की अनजानी सी’, ‘डेडलाइन’, ‘बास्टर्ड’, ‘आयशा’, ‘एक अधूरी डायरी की चंद सतरें’, ‘मेट्रो वाली लड़की’, ‘मासूम माशूक’ और ‘कसक-ए-इश्क़’।
इन सारी कहानियों की सबसे बड़ी ख़ासियत इनकी नायिकाएं हैं। नरेंद्र की नायिकाएं बहुत ही बहादुर, मैच्योर और बोल्ड हैं। बिल्कुल शरतचंद्र की नायिकाओं की तरह लेकिन चूंकि शरतचंद्र का ज़माना बीत चुका है और अब नरेंद्र सैनी का ज़माना है तो इसी हिसाब से बहादुरी, मैच्योरिटी और बोल्डनेस का संदर्भ भी बदला है। जिस शरीर की वजह से पुरुष समाज उन्हें ‘चीज़’ समझता है, उसी शरीर को हथियार बनाकर वह बदला लेना भी जानती है (कहानी ‘बास्टर्ड’), जिस प्रेमी को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए वह अपना तन-मन-धन सबकुछ न्यौछावर करती है, वही प्रेमी जब दगा देता है तो उसे छोड़ने में भी उसे एक पल नहीं लगता (कहानी ‘कसक-ए-इश्क़’), जब उसे एहसास होता है कि सच की बुनियाद पर रिश्ते नहीं टिकते तो झूठ की बुनियाद खड़ी करने में भी वो खौफ़ नहीं खाती (कहानी ‘डेडलाइन’), जिस लड़के पर वह जान छिड़कती थी, वह जब मज़हब की तराजू पर रिश्तों को तौलता है तो उसे लतियाते भी उसे देर नहीं लगती (कहानी ‘आयशा’), उसे अपने पुरुष मित्रों को यह बताने में कोई झिझक नहीं होती कि वह लेस्बियन है और किसी लड़की से प्यार करती है (कहानी ‘इक लड़की अनजानी सी’)।
नरेंद्र सैनी की नायिकाएं इस बात को साबित करती हैं कि ‘लड़कियां कंडोम की तरह नहीं होती हैं’ (‘एक अधूरी डायरी की चंद सतरें’ कहानी का नायक लड़कियों को कंडोम की तरह ही समझता है। इस्तेमाल किया और फेंक दिया।) वो प्यार करती हैं तो सचमुच दिल से करती हैं। उनका समर्पण प्रेरित करने वाला है लेकिन जब वह सबक सिखाने पर आती हैं तो उनसे ज्यादा खतरनाक और क्रूर शायद ही कोई हो। वो अपने प्रेमी को घर से नंगा भी भगा सकती हैं। (कहानी ‘बास्टर्ड’)
नरेंद्र की कहानियों के नायक आम पुरुष हैं। उनके लिए लड़की बस जिस्म है और कुछ नहीं। (केवल एक कहानी ‘मासूम माशूक़’ को छोड़कर)। इसलिए जब किसी खूबसूरत लड़की को देखता है तो उसके नायक के मन में बस यही ख्याल आता है ‘एक महकता और दमकता जिस्म सामने खड़ा था’ (कहानी ‘मेट्रो वाली लड़की’)। वो जिस्म से आगे सोच ही नहीं पाता। इन कहानियों में समाज के मौजूदा वक्त के पुरुष ही हैं—जिन्हें चाहें आप नायक कह लीजिए या खलनायक—जो लड़की को जिस्म से ज्यादा कुछ नहीं समझते, जो उनके बारे में गंदे-गंदे बयान देते हैं, जो ना केवल उन्हें घर की चहारदीवारी में क़ैद रखना चाहते हैं बल्कि सिर से पांव तक कपड़ों से भी ढांप देना चाहते हैं, जो हर वक्त उन पर शक करते हैं, जो हर वक्त उन्हें अपनी मिल्कियत और गुलाम समझते हैं। अपने चारों ओर ऐसे ही क़िरदार तो भरे पड़े हैं। नरेंद्र की कहानियों में भी यही क़िरदार हैं। हर पुरुष के अंदर एक सफेदीवाला छिपा हुआ है—अपने आदिम और क्रूर रूप में। सफेदीवाला वो खलनायक है, जिसने 12 साल की लड़की के साथ बलात्कार किया था। (कहानी ‘एक अधूरी डायरी की चंद सतरें’)
‘आयशा’ इस संग्रह की एक ऐसी कहानी है, जो इश्क़ के बहाने समाज की सबसे क्रूर सच्चाई को उद्घाटित करती है। किसी लड़की का देह भोगते वक्त उसका धर्म आड़े नहीं आता लेकिन जब उसके घर का पानी पीना होता है तो मज़हब दीवार बनकर खड़ा हो जाता है। इस सच्चाई का सामना हम हर रोज़ करते हैं। हमारे लिए यह आम बात हो गई है क्योंकि यह बीमारी हमारी आदत बन गई है लेकिन नरेंद्र ने इसे अपनी आदत नहीं बनने दी। उन्होंने पुरजोर तरीके से इस मानसिकता पर हमला किया है
‘मेट्रो वाली लड़की’ कहानी कंटेंट और कल्पना –दोनों लिहाज से उत्कृष्ट है। पुरुष की कामना का बेजोड़ चित्रण इस कहानी में है। यह कहानी यह भी संदेश देता है कि जब मुहब्बत जिस्म से होती है तो ज्यादा दिन नहीं टिकती। जिस्म कुछ ही दिन में उपेक्षा का शिकार हो जाता है। इस कहानी की नायिका उर्वशी कहती है, ‘अब तुम्हें मेरी नहीं, एक जिस्म की जरूरत है। जिसकी तुम उपेक्षा कर सको और अपने ढंग से हांक सको।‘
संग्रह की सारी कहानियों की एक और ख़ासियत है। हर कहानी का क्लाइमेक्स चौंकाता है। पाठक को अंदर तक हिला देता है। इस कहानी संग्रह के लिए नरेंद्र सैनी बधाई के पात्र हैं। पठनीय संग्रह है।
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कहानी संग्रह : इश्क़ की दुकान बंद है

कथाकार : नरेंद्र सैनी

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन

मूल्य : 225 रुपए

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