विद्वानों की परिभाषा

जयप्रकाश मानस

एक कवि की डायरी :  किस्त 9

30 अगस्त, 2015

विद्वता : कुछ उत्तर आधुनिक परिभाषाएँ

  1. महान और तुच्छ में जो कोई फ़र्क न बता सके, उसे ज्ञानपीठी विद्वान कहा जाये ।
  2. जो राग-द्वेष के आधार पर निर्णय लिखे, उसे पहले-पहल विद्वान समझा जाये ।
  3. जो इतिहास को जाने बग़ैर उदंड इतिहास लिख मारे, उसे वागर्थी विद्वान समझा जाये ।
  4. जो देश को जाने बग़ैर कथा और देश की बात कर आतंक मचाये, उसे विद्वान (विदुषी भी क्यों नहीं) समझा जाये ।
  5. जो परी से मिले बिना, उनकी कथा को जाने बिना, परियों की उजली कहानी सुनाये, उसे ही अपराजेय विद्वान समझा जाये ।
  6. ऐसे सारे सच को जानने के बाद भी जो ऐसे अलोगों/अलोगियों के साथ तस्वीर दिखाये, उसे विश्व का सर्वश्रेष्ठ विद्वान/विदुषी मानकर उसे उनके बर्तन माँजने की छूट दे दी जाये ।
  7. जो 'वर्तमान' को जाने बिना भविष्य के नाम पर पुलिसिया तरीके से 'साहित्य' का संपादन करे, उसे सबसे महान पेयी साहित्यकार की पदवी दे दिया जाये ।
  8. जो कुनबे को पृथ्वी कहके किसी तलैया में अचिर उतर आये, उसे वसुधा का विद्वान के अतिरिक्त कुछ भी न कहा जाये ।
  9. जहाँ साहित्यिक व्यापार का अहित न हो, जहाँ स्वार्थ का विष भंडार हो, वहाँ विष बाँटने वाले विद्वान को ही साहित्यामृताश्रयी विद्वान का परम धाम मान लिया जाये ।
  10. जहाँ साक्षात्कार न हो, केवल कपोल-कल्पना हो, वहाँ आत्म-परमात्म का निनाद हो, उसे आज की विवशता मानकर कर चुपचाप सर्वश्रेष्ठ विद्वान कह ही दें ( मुक्ति यहीं तो है - ताल किनारे)
  11. वे सभी विद्वान ही हैं जिनकी मूर्खता रसोई में एक छौंक के साथ कुछ ही क्षण में विलीन हो जाती है -भले ही ये किसी पुल के पास के पास राम श्लाका जपते रहते रहें ।

 

तब और अब

प्रेम के छंद में तब 'समाजशास्त्र' का मैना चहकता था, अब केवल 'अर्थशास्त्र' का कौआ !

 

डर

बड़े-बड़ों से डर नहीं लगता । छोटे बेचारे डराये क्यों किसी को । बच जाते हैं वे, जो न बड़े होते हैं न छोटे, इनसे बहुत डर लगता है । डर इसलिए कि ये यही नहीं समझ पाते कि डर होता क्या है या दरअसल डरता कौन है !

 

जाने कितने रंग

लाल, पीला, बैंगनी, गुलाबी जाने कितने रंगों के फूल गुडहल... जाने कितने तरह के वृक्ष : आम, अमरूद, नारियल, केला, कदम्ब, डालिम्ब, नींबू, बेल, नीम, आँवला, पीपल, मुनगा...मुझे पता नहीं फ़िराक़ गोरखपुरी साहब को बागवानी और पेड़-पौधों से कितना नेह था पर उनके नाती और वरिष्ठ कवि विश्वरंजन को खूब लगाव है इनसे ।आज उनकी बगिया देखकर मन भी बाग़-बाग़ हो उठा । प्रवीण भाई का कैमरा तो हर वक़्त तैयार रहता ही है ।

 

करेलायानी दिन में नींद

आज माननीया गृहमंत्राणी जी घर पर नहीं हैं, सो सुनहरा मौक़ा हाथ लगा या बिल्ली के भाग से सींका टूटा- बहुत दिनों के बाद किचन में हाथ साफ़ करने का। दाल तड़का बनाया और हरे-भरे करेलों का फ्राई । ऐसी नींद पड़ी खाकर कि अभी-अभी खुली है । करेला भले ही दुनिया के लिए प्रसिद्ध न हो, कड़वी हो । मेरे लिए तो वह सुखदायी नींददाता भी है ।

 

ये जीवन है......इस जीवन का....

नींद की ओर लगाव है तन-मन का फिर भी इस समय एक गीत है जो मन से उठ रहा है, एक ज़रूरी गीत की तरह । कम गीत ऐसे होते हैं जो फ़िल्मी होकर भी जीवन के यथार्थ से परिचित कराते हैं और निरंतर हम सबको समर्थ बनाते रहते हैं ।किशोर दा, आप भीतर से ताक़त देते हैं हमें ।

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