विभा परमार की दो कविताएं

सवाल आने बंद हो जाएं…

मेरे भीतर
चलती रहती है
सवालों की सीरीज
अनवरत गति से
जैसे हवा चलती है,
पानी बहता है
और साँसें चलती हैं

सोचती हूँ अक्सर
हवा गर रुक जाये
तो दम घुटता है
पानी रुक जाये तो
सड़ने लगता है
सवाल आने बंद हो जाएं
तो क्या होगा?

जीने की एक वजह काफी हैतलाशने की
कोशिश करती हूँ
जीवन से बढ़ती

उदासीनता की वजहें
रोकना चाहती हूं
अपने भीतर पनप रही
आत्मघाती प्रवृत्ति को
पर नजर आते हैं
धूप-छांव से इतने रंज औ गम
रेत की आंधियों सी मिली चोटें
और सूख चुकी पत्तियों सी उम्मीदें
कि न जीने के कारण तलाशना छोड़,
एक बार फिर से बारिश में
बाहें फैलाए जी भर के भीगूं

You may also like...

1 Response

  1. Pooja Singh says:

    nice….

Leave a Reply