विशाल मिश्रा की कविता ‘आज भी’

गुलाबी सूती कपड़े पर
हरे धागे से
कढ़े फूल
आज भी ख़ुशबू देते हैं।

बेतरतीब बालों को
सलीका सिखाने की ख़ातिर
वो चार चिमटियां
आज भी उनको दाबे हैं।

चमकता नग
नाक पर
उस चेहरे की
नूर बढ़ाने में सबसे आगे है।

गोरी पतली
दूसरी वाली उंगली में
सोने का छल्ला
रंग बदलकर उंगली से होने को भागे है।

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