विशाल मिश्र का एक गीत

जब कोई हक़ीक़त चंद पलों में अफ़साना बन जाए
भरने वाले ज़ख्म कोई जब फिर ताज़ा कर जाए
मैं क्यूँ न रो दूं।
मुद्दत से थी राह तकी के बादल एक दिन बरसेंगे
धूल उड़ रही, न मालूम था के ऐसे तरसेंगे
मैं क्यों न रो दूं।
हम कितना चाहें लाख करें पर वो वक़्त कहाँ से लाएंगे
यादों की बस डोर बची है पतंग कहाँ से लाएंगे
मैं क्यूँ न रो दूं।
न ग़म है न अब खुशियां हैं न अब आंखों में आँसू हैं
पर न जाने कब तू आए मेरी आँखें भर आयी हैं
मैं क्यूं न रो दूं।

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1 Response

  1. Kavita Rawat says:

    विशाल मिश्र जी की सुन्दर गीत पढ़वाने के लिए धन्यवाद!

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