विष्णु कुमार की कहानी ‘भैंस चोर’

रात का अंधेरा चारों तरफ, फैल चुका था, गांव के सभी लोग सो चुके थे।…चारों तरफ झींगुरों और मेंढकों की आवांजें गूंज रही थीं। मैं भी अपनी चारपाई पर गहरी नींद में सो रहा था, लेकिन मेरी आदत है कि सोने से पहले पानी न पी लूं तो रात को प्यास की वजह से आंख खुल ही जाती है। मैं कभी कभी अपनी चारपाई के पास किसी न किसी बर्तन में पानी भरकर रखता था ताकि रात को अंधेरे में होने वाली परेशानी से बच सकूं।
अभी गांव में ज्यादातर घर कच्चे हैं। सांप, और दूसरे कीड़े इधर उधर घूमते दिखाई दे जाते हैं और मुझे इनसे सबसे ज्यादा डर लगता है। हुआ वही जिसका डर था। प्यास लगी और नींद से मैं जाग गया। इधर उधर देखा तो दादी मां और दादा जी खर्राटे मारकर गहरी नींद में सो रहे हैं, लेकिन मुझे तो प्यास लग रही थी और उठकर खुद लाने की हिम्मत नहीं थी। मैं चादर में मुंह डालकर लेट गया, सोचने लगा कि अब क्या करुं, पानी तो पीना ही है। तभी सामने मंदिर के पीछे से किसी के फुसफुसाने की आवाज आई। मैं डर गया था, सुना है गांव में रात को 12 बजे भूत प्रेत घूमते हैं, पर वो तो घूमते हैं, बात थोड़े ही न करते हैं।
मुझे गड़बड़ लगी, लेकिन मैं तो डर के मारे चादर में छुपा था, करता भी क्या, एक नंबर का डरपोक जो ठहरा। थोड़ी देर बाद फिर कुछ आवाजें आने लगीं…बहुत धीरे धीरे कुछ बातें हो रही थीं, पर इनती रात को बातें करने का समय किसके पास है, मैंने मन ही मन सोचा। कुछ देर तक ऐसे ही लेटा रहा, फिर हिम्मत करके चादर से आंखें बाहर निकालीं, और जरा सा सर उठाकर देखा। जहां भैंसों को बांधा जाता है, वहां कुछ हरकत सी दिखाई दी, लेकिन ज्यादा अंधेरा होने की वजह से कुछ साफ साफ दिखाई नहीं दे रहा था। इतने में एक आवाज फिर आई, लेकिन ये आवाज किसी व्यक्ति की नहीं बल्कि भैंस के गले में बांधी जाने वाली सांकर की थी। जी हां, सांकर जो लोहे की होती है, इतने में भैंस और उसका एक साल का बच्चा आवाज करने लगा। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था।
अचानक से भैंसों ने रेंकना बंद कर दिया और सांकर की आवाज फिर से आने लगी। मुझे कुछ गड़बड़ समझ में आने लगी थी, पर कुछ समझ नहीं आया। डर के मारे आवाज भी न निकली जो दादी या दादा को आवाज मारकर जगा दूं। फिर मैने करवट बदली, और तकिये को थोड़ा ऊंचा करके रखा, ताकि सामने जो हो रहा है वो ठीक से दिखाई दे। अब कुछ कुछ दिखाई दे रहा था। दो लोग भैंस के पास खड़े थे। एक के हाथ में सांकर थी और दूसरा भैंस और उसके बच्चे को कुछ खिला रहा था, शायद तभी भैंस आवांज नहीं कर पा रही थी। इतने में वो दोनों भैंस को धीरे धीरे ले जाने लगे। मुझे लगा कि गई भैंस पानी में, ये लोग तो हमारी ही भैंस लेकर जा रहे हैं। जब मैं स्कूल की छुट्टियों में गांव आया था तो गांव में इन्हीं भैंस चोरों के बारे में गांव भर में बातें चल रही थी। ये लोग रातों रात भैंस खूंटे से छुड़ाकर दूर ले जाते थे, और सुबह होते ही या तो भैंस को अच्छे दामों पर बेच देते थे या फिर उन्हें किसी बूचड़खाने के हवाले कर देते थे।
ये वही भैंस चोर गैंग था, आज इनका निशाना हमारा ही गांव था, इससे पहले कई गांव में भैंस चुराने में सफल हो चुके हैं, ये भैंस चोर। मुझे डर लग रहा था, सोच रहा था कि अगर चिल्लाया तो ये लोग कहीं मुझे मार न दें, फिर सोचा अगर ये मुझे मारेंगे तो सब लोग जाग जाएंगे, और ये पकड़े जाएंगे, बहादुरी का कीड़ा अब मेरे भीतर उमड़ने लगा…स्कूल में सिखायी गई बातें याद आने लगी, फिर मैने कुछ सोचा, इतने में वो लोग खूंटे से कुछ दूर तक भैंस को ले जा चुके थे, कुछ देर और हुई तो ज्यादा देर नहीं लगेंगी इन्हें यहां से गायब होने में। मुझे एक तरकीब सूझी.. मैने देखा दादा जी की लाठी उनकी चारपाई के पास ही पड़ी है, मैने धीरे से उसे अपनी तरफ कर लिया, और अब चादर को धीरे धीर हटा दिया, सामने रखी नांद के पास गया और छुप गया। वो लोग चारों तरफ देखे जा रहे थे…अब तक नीम के पेड़ से आगे ही पहुंच सके थे, मैने भी नांद की आंड से हटकर नीम के पीछे बने कच्चे मकान की आंड ली और उनका पीछा करने लगा, अब डर ये था कि अगर इन लोगों ने मुझे पकड़ लिया तो मुझे बचाने यहां कौन आयेगा, और इससे आगे गया तो बचना मुश्किल है। तभी मैने देखा कि उन्होंने अपनी रफ्तार बढ़ा दी है, मैने तेजी के साथ लाठी अपने दोनों हाथों में टाइट करके पकड़ी…और झूकते हुए. ..उनके ठीक पीछे पहुंचा, और जाकर एक चोर के सर पर पूरी ताकत से हमला कर दिया। एक के सर पर जैसे ही लाठी लगी वो जोर से चिल्लाया…आवाज तेज थी। गांव के कई लोग शायद इस आवांज को सून चुके थे, इतने में दूसरे चोर ने भैंस छोड़ दी और मेरे ऊपर हमला करने लगा, शायद उसके हाथ में चाकू था…वो मेरी तरफ बढ़ने लगा. दूसरा चोर वहीं पास में पड़ा था. अपने सर को पकड़ कर, अब वो चिल्ला नहीं रहा था, इतने में पहले चोर ने मुझे पकड़ने की कोशिश की, लेकिन मेरे हाथ में लाठी थी, मैंने उसके ऊपर भी एक वार किया, लेकिन वो हट गया। अब मुझे कुछ समझ नहीं आया और मैं जोर से चिल्ला पड़ा, ‘अरे चोर चोर ….चोर ….बचाओ, इस तरह से मैने दो तीन आवाजें लगाई।
फिर क्या था दादा, दादी, चाचा, और गावं के कई लोग अपने अपने घरों से निकलकर मेरी तरफ आने लगे, चोरों ने देखा कि अब पकड़े जाने वाले हैं तो नीचे पड़ा चोर उठा और दोनों एक साथ भागने लगे, एक के सर में चोट लगी थी,वो भाग नहीं पा रहा था। दूसरा उसका हाथ पकड़ कर उसे ले जा रहा था, दादा दादी मेरे पास आकर रुक गए, और चोरों को देख दादा जी गांव की देहाती भाषा में गालियां देने लगे उन दोनों चोरों को जो भैंस को सड़क के पास तक ले आए थे। गांव वालों ने इतनी देर में अनपा काम कर दिया था, दोनों चोरों को अब तक उन्होंने पकड़ कर इतना तो पीट दिया था कि अब वो चल नहीं सकते। फिर कई लोग मेरे पास आएं, और मेरा हालचाल पूछने लगे, मैने कहा मैं ठीक हूं, पुलिस को बुला लो, इन्हें यहां रखना ठीक नहीं है, इनके पास चाकू है।
भल्लू चाचा ने पुलिस को तुरंत फोन कर दिया, जिसके लगभग 2 घंटों के बाद दो पुलिस वाले मोटरसाइकिल पर गांव में दाखिल हुए, थोड़ी ही देर में पुलिस की जीप आई, गांव के लोगों ने पुलिस को पूरी कहानी बताई, दरोगा साहब ने सारा मामला जानने के बाद मेरी जमकर तारीफ की, और फिर पुलिस दोनों आरोपियों को लेकर थाने चली गई। अब इस रात के बाद गांव में अगले दिन हर तरफ मेरे ही चर्चे हैं, और हो भी क्यों न, मैने भैंस चोरों को जो पकड़वा दिया था, जिन्होंने हमारे गांव और आसपास के सभी गांव के लोगों की नाक में दम कर रखा था, सुना है कई साल बाद आज भी इस तरह की चोरियां काफी हो रही हैं।

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