शहादत ख़ान की कहानी वेलेंटाइन डे

शहादत

शिक्षा-           दिल्ली विश्वविद्यालय के भीमराव अंबेडर कॉलेज से बी.ए. (विशेष) हिंदी पत्रकारिता।

संप्रीति-         रेख़्ता (ए उर्दू पोएट्री साइट) में कार्यरत।

मोबाईल-        7065710789

दिल्ली में निवास।

कथादेश, नया ज्ञानोदय, समालोचना, कथाक्रम, स्वर्ग विभा, परिवर्तन, ई-माटी और जनकृति सहित आदि पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित।

वेलेंटाइन-डे को लेकर प्रेमियों में गज़ब का उत्साह होता है। और फिर कॉलेजों में पढ़ने वालों की तो बात ही मत पूछो। वह तो महीने भर पहले से ही इस दिन के लिए योजनाएं बनाने लग जाते हैं। तोहफे में क्या देना है? गर्लफ्रेन्ड को कहां घूमाना है? पार्टी कहां करनी है और किस रेस्टोरेन्ट में डिनर करना है?

इस सबके बावजूद वह अपने प्यार का इजहार छुपकर करते है? लोगों से छुपकर मिलते हैं। अपनी दिल की बात कहने के लिए कहीं दूर अकेले में जाने की सोचते हैं, जहां उन्हें कोई न देख सके। खासतौर से उनके जानने वाले। इस लिहाज़ से जिस जगह, जिस शहर में वह पैदा होते हैं, पढ़ते और खेलते हैं, वही जगह, वही शहर उनके किसी से प्यार करते ही कैदखानों में बदल जाते हैं।

अब शहर में ऐसी कोई जगह नहीं है जहां दो प्रेमी सुकून से दो पल साथ बीता सके। जगह-जगह धार्मिक संगठनों के कार्यकर्ता सामाजिक पुलिस की हैसियत से तैनात रहते हैं। जहां कहीं भी किसी प्रेमी युगल को देखा कि बस कर दी उनकी पिटाई शुरु। ऐसा करने पर पुलिस भी उन्हें नहीं रोकती। उल्टे उन्हीं का साथ देती है। जैसे उनके लिए कानून नाम की कोई चीज ही न हो। वह किसी के प्रति जवाबदेह न हो। जैसे वह शहर में शांति व्यवस्था बनाएं रखने के लिए नहीं बल्कि गुंड़ों मवालियों को मनमर्ज़ी करने में उनका सहयोग के लिए तैनात हो। वह ऐसे मूकदर्शक बनी रहती जैसे शहर में क्या सही हो रहा और क्या गलत उन सबको जांचने-परखने का जिम्मा उनका नहीं बल्कि धर्म के सड़क छाप छद्म ठेकेदारों के हाथ में हो। जिन्हें खुद तो कोई काम नहीं है, हाँ दूसरे का काम जरुर खराब कर देते हैं।

अभी पिछले साल की ही तो बात है। एक प्रेमी जोड़ा नया-नया शहर में आया था। उसे यहां के हालात के बारे में ज़रा भी जानकारी नही थी। वह 14 फरवरी का दिन था। दोनों प्रेमी हाथों में हाथ थामे अपनी मस्ती में झूमते हुए जा रहे थे। लड़के ने एक हाथ में एक गिफ्ट का बॉक्स पकड़ रखा और दूसरा हाथ में लड़की का हाथ थमा रखा था। लड़की जिस कंधे पर बैग टांगे हुए थी उसी हाथ में गुलाब का फूल पकड़े हुए थी और दूसरा हाथ से लड़के का हाथ पकड़े थी। दोनों प्यार में गुम अपने आसपास से अनजान चले जा रहे थे।

अचानक न जाने कहां से पन्द्रह-बीस उन्मादी लड़कों का एक समूह आ धमका और आव देखा न ताव दोनों की पिटाई शुरु कर दी। इस दौरान पुलिस भी वहीं खड़ी थी लेकिन उसने उन लड़कों को रोका नहीं। बल्कि पिटाई खत्म होने के बाद वह उसी जोड़े को पकड़कर अपने साथ थाने ले गई।

आज शनिवार है और बारह फरवरी भी। राहुल अनमना-सा और कुछ परेशान-सा कॉलेज के पार्क में बैठा है। उसकी समझ नहीं आ रहा है कि वह तान्या को कहां घुमाने ले जाए? तान्या अभी नई-नई उसकी गर्लफ्रेंड बनी है और यह उनका पहला वेेलेंटाइन-डे है।

अभी कितने दिन हुए होंगे उन्हें मिले हुए, मुश्किल से तीन महीने। जब कैन्टीन में उनकी पहली मुलाकात हुई थी। राहुल की क्लास में पढ़ने वाली त्रिया ने ही तो कैन्टीन में उसे देखकर कहा था, “हैलो राहुल, कैसे हो?” और उसका जवाब सुने बिना ही उसने आगे कहा, “इससे मिलो, यह है तान्या। मेरी नई दोस्त।”

राहुल ने भी झट से बिना एक पल गवाये मिलाने के लिए अपना हाथ उसकी ओर बढ़ा दिया था। तान्या ने भी मुस्कुराते हुए उससे हाथ मिलाया। अभिवादन और थोड़ी-बहुत बातचीत के बाद राहुल ने उन दोनों को चाय की पेशकश की तो वह दोनों बैठ गई थी। फिर उन तीनों से साथ मिलकर चाय पी और समोसे खाए थे।

यह छोटी भेंट तो जैसे उनके मिलन का एक बहाना बन गई थी। इसके बाद तो वह ऐसे मिलने और बातें करने लगे कि जैसे वह एक दूसरे को सालों से जानते हो। अब वह लाइब्रेरी, कैंटीन, पार्क और कॉलेज के बाहर चाय वाली अांटी के यहां साथ बैठे-बैठे घंटों गुजार देते। पता नहीं क्या बातें करते? लेकिन हर वक्त कुछ न कुछ बोलते और हँसते रहते।

अक्सर जैसा कि प्रेमियों के बीच होता है राहुल ने अब तक न तो तान्या को कोई तोहफा ही दिया था और न ही कहीं घुमाने ले गया था। अभी तक की उनकी सभी मुलाकातें कॉलेज तक ही सीमित थी।

राहुल ने सोचा था कि वह वेलेंटाइन-डे को न केवल तान्या को बढ़िया सा तोहफा देगा,  साथ ही उसे किसी अच्छे से मॉल में फिल्म दिखाने भी ले जाएगा।

पर जब से कुछ संगठनों ने वेलेंटाइन डे के विरोध का ऐलान किया है तभी से उसकी बैचेनी बढ़ी हुई है। वह सोच-सोच कर परेशान हो रहा है कि अब वह क्या करे?

राहुल पीछे की ओर हाथ रखे, उन पर पूरे शरीर का बोझ डाले, आंखे बंद किए कॉलेज पार्क में ध्यान की मुद्रा में था। तभी उसके क्लास-मेट विकास ने आकर कहा, “और भई राहुल क्या हाल हैं?”

“ठीक हूं। तुम सुनाओ?”

“बस, सब बढिया। क्या बात है? इस तरह तन्हा-तन्हा। लड़ाई हो गई क्या?”

“अरे नहीं यार, बस ऐसे ही बैठा था।”

और… तान्या को परसो कहां घुमाने ले जा रहे हो?”

“वही सोच रहा हूं। लेकिन कुछ समझ नहीं आ रहा है। कुछ संगठनों ने ये विरोध का कार्यक्रम चला कर हमारी तो वाट लगा दी। पता नहीं कुछ काम-वाम नही है क्या इन लोगों को, जो दूसरे के बीच में टांग अड़ाने चले आते हैं? जैसे देश की सारी संस्कृति सुधारने का ठेका इन्होंने ही ले रखा है। ” ठीक से पालथी मारकर बैठते हुए उसने कहा, “ख़ैर मेरा छोड़ो, तुम बताओ, तुम कहां जा रहे हो?”

“हम, हम तो भाई शहर से बाहर जाएंगे। तुम्हें शहर के हालात तो पता ही है। यहां मिलना, अपनी बेइज़्जती कराना हैं। इज्ज़त बचानी है तो शहर से बाहर...।”

विकास की बात राहुल को जंच गई। उसने सोचा क्यों न वह भी तान्या को लेकर कहीं बाहर चले। फिल्म तो वे लोग फिर भी देख लेंगे।

कॉलेज से आने के बाद उसने शहर के आस-पास स्थित ऐसे पार्कों के बारे में पता किया जहां कम लोग आते-जाते हो। कई दोस्तों से पूछने के बाद उसे पता चला की शहर के पश्चिम में एक पार्क है जो अभी नया-नया बना है। ज्यादा लोगों को उसके बारें नहीं पता है। इसलिए वहां कम लोग ही जाते है। इस पर उसने सोचा कि क्यों न पहले अकेले ही वहां का एक राऊंड लगा लिया जाए।

अगले दिन वह उस पार्क का एक राउंड लगा आया। पार्क देखने में उसे अच्छा लगा। साफ-सुथरा और हरा-भरा। घने पेड़ पौधे और यहां आने वाला भी कोई नहीं। पार्क देखते ही उसने फैसला कर लिया कि वह अपना पहला वेलेंटाइन-डे इसी पार्क में मनाएगा। घर आने के बाद शाम को उसने तान्या को फोन किया, “हैलो, कैसी हो?”

“ठीक..., तुम बताओ?”

“मैं भी ठीक। अच्छा कल कहीं चलने का इरादा है क्या?”

“कहां?”

“कहीं भी।”

“अरे बताओ तो सही कहां?”

“कहीं तो चलेंगे। जहां बस मैं हूं, तुम हो और कोई न हो।”

 राहुल की बात सुनकर तान्या हँस दी। हँसते हुए ही उसने कहा, “ऐसी कोई जगह नहीं है। तुम्हें शहर के माहौल के बारे में पता तो है... फिर?”

“मुझे पता है। बस तुम ये बताओ कि कल मिलना है या नहीं?”

“हाँ, मिलना है। लेकिन मिलेंगे कहां?”

“वो सब तुम मुझ पर छोड़ दो। बस, तुम मुझे कल दस बजे शिव चौक, बस अड्डे पर मिलना, मैं तुम्हे वही से ले लूंगा। ठीक है।”

“ठीक है।”

“अच्छा अब रखता हूं। कल मिलते है। ओ.के।”

“बाय।“

 

अभी 14 चौदह फरवरी के बीच पूरी एक रात बाकी थी। लेकिन ये एक रात राहुल के लिए किसी स्वप्न लोक से कम नहीं गुजरी थी। वह रात भर तान्या के सपनों में खोया रहा। वह सोचता रहा कि वह क्या पहनकर जाएंगा? उसे गुलाब कहां से खरीदना है? उसे तान्या को किस अंदाज़ में देगा? शाम को वापसी में वे लोग डिनर कहां करेंगे?

अपने नाम के अनुसार उस दिन की शुरुआत भी बहुत खुशगवार और मीठे एहसासों के साथ हुई थी। आसमान पर नीला सूरज चमक रहा था और ठंडी-ठंडी हवाएं बह रही थी। राहुल की जब आंख खुली तो घड़ी में सात बज रहे थे। सुबह सोकर उठते ही उसने सबसे पहले घड़ी को देखा था। ‘ओह, सात बज गये’, कहते हुए वह जल्दी से बाथरूम में घुस गया।

दाँत साफ करने, सेव बनाने और नहाने में ही उसे साढे आठ बज गये। वह जल्दी से तैयार हुआ और नाश्ते की टेबल पर जा बैठा।

उसने जींस और उस पर नीली टी-शर्ट पहनी थी जो उसने खासतौर से आज के लिए ही खरीदी थी। इन कपड़ों में वह ओर दिन से कहीं ज्यादा हैंडसम लग रहा था। उसने एक बार खुद को शीशे में देखा और मस्ताते हुए सिटी बजाई।

नाश्ता करने के बाद उसने अपने कॉलेज के बैग में कुछ किताबें और तान्या को देने वाला तोहफा रखा। बैग उठाया और घर से चल दिया। जब वह घर से निकला तो सवा-नौ बज रहे थे। उसने सोचा पन्द्रह मिनट गुलाब वाले के यहां जाने में लग जाएंगे, और आधे घंटे में वह शिव चौक पहुंचा जाएगा।

हुआ भी ऐसा ही। कुल मिलाकर उसे बारह मिनट फूलों वाले की दुकान पर लगे होंगे। जहां से उसने तान्या के लिए एक खूबसूरत और बड़ा गुलाब का फूल खरीदा था। अखबार के टुकड़े में फूल को छुपाए, जब वह शिव चौक पहुंचा तो पूरे ठीक दस बज चुके थे। वहां पहुंच कर उसने इधर-उधर देखा तो सामने से तान्या चली आ रही थी। उसने नीला सूट और उसके नीचे सफेद पायजामी पहनी हुई थी। और गले में एक सफेद चुन्नी। उसके ऊपर ये कपड़े बहुत खिल रहे थे।

राहुल उसे देखकर मुस्कुराया। लेकिन तान्या ने कोई जवाब नही दिया। वह तेजी से आई और बाईक पर बैठ गई। उसके बैठते ही राहुल ने बाईक स्टार्ट की और पार्क की ओर चल दिया।

पार्क पहुंचकर राहुल ने बाईक को पार्क के मैन गेट से न ले जाकर उसके पीछे वाले गेट के सामने ले गया। बाईक खड़ी कर वह दोनों पार्क के अंदर चले गये। पार्क में उन्हीं की तरह ओर भी कई जोड़े आएं हुए थे। सब एक-दूसरे से दूर दूर बैठे थे। वह दोनों भी उन लोगों से थोड़ी देर एक छोटे पेड़ के नीचे बैठ गए। वहां पहुंच राहुल ने पहले तो तान्या को गले लगाया, फिर घुटने के बल बैठकर उसे सच्चे आशिक की तरह गुलाब का फूल देते हुए अपने प्रेम का फिर से इजहार किया। इस पर तान्या मुस्कुराई और “नॉटी” कहते हुए उसने उसकी हल्के से नाक पकड़कर हिला दी।

फिर वह दोनों बैठ गए और एक दूसरे की आँखों में खो गए। उन्होंने ढेर सारी बातें की। बात करते-करते राहुल पेड़ की छांव में तान्या की गोद में सिर रखकर लेट गया। उसने आँखे बंद कर ली। तान्या ने अपने लंबे काले बाल उसके चेहरे गिरा दिए। 

वे दोनों एक-दूसरे के कंधों पर सिर रखे, हाथों में हाथ थामे, पूर्व की ओर पीठ किए, ढलते सूरज को देख रहे थे। वे एक दूसरे में इस कदर खो हुए थे कि उन्हें यह भी पता नही चला कि उनके आस-पास क्या हो रहा।

पार्क के दोनों गेट बंद कर दिए गए। सभी जोड़ों को पकड़ लिया गया। दर्जन भर भारतीय संस्कृति के रक्षकों के साथ चार-पाँच पुलिस वाले खड़े थे। इंस्पेक्टर ने गरजते हुए कहा,“क्यों बे, क्या कर रहा है यहां? कौन लगती है ये तेरी?”

एकाएक इतनी कनफोडू और भयानक आवाज़ सुनकर वे दोनों चौंककर उठ खड़े हुए। वह सहम गए। उनकी हालात ऐसे हो गई जैसे गहरी नींद में सोते इंसान की लात मारकर जगा देने पर होती है। राहुल सकपकया सा पलक झपकते ही तान्या से अलग हटकर खड़ा हो गया। पहले तो उसे समझ ही नहीं आया कि ये सब क्या हो रहा है? फिर अपने सामने पुलिस वालों को खड़ा देखकर उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। इंस्पेक्टर ने उन दोनों की ओर घूरते हुए पुलिसिया रौब में फिर फिर पूछा, “क्या हो रहा है यहां? कहां से आए हो तुम लोग? कौन लगती है ये तेरी? अबे साले, बता जल्दी।”

पुलिस वाले के धमकी भरे सवाल से राहुल डर गया। घबराहट में उसके मुँह से आवाज ही नहीं निकली। और जब निकली तो उसने हड़बड़ी में जल्दी से कह दिया, “जी, जी ये मेरी बहन है।” 

 

 

 

 

 

 

 

 

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