संगीता गांधी की कविता ‘शाब्दिक जुलाब’

संगीता गांधी

वो लिखते हैं 
बहुत लिखते हैं 
लेखन से क्रान्ति उद्घोष करते हैं 
कल स्वयं क्रांति ने पूछा 
हे लेखक शिरोमणि 
चलो जो लिखते हो 
सार्थक करो 
आओ दो धक्का 
सत्ता के मकबरों को 
एक बार ज़ोर से चिल्लाओ 
प्रतिष्ठानों की सुरंगों में 
ऐसे कि सब विसंगतियां 
हों जाएं कम्पित 
वो बोले --
अभी अस्वस्थ हूँ 
साथ तुम्हारे न चल सकूँगा 
लगे हैं " जुलाब "
क्रांति बोली 
वाह जनाब !
लिखते हो क्रांति हो
पर चाहते हो --
गर्दन कोई और कटाये 
तुम अपने नाखून भी बचा लो 
वाक़ई तुम्हें ही नहीं 
बल्कि तुम्हारे शब्दों को भी
जुलाब लगे हैं !

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