संजीव ठाकुर की कविता ‘वे भूल गए’

वे भूल गए वे दिन

जब बाढ़ में डूबे गाँव से

निकलते थे सतुआ खाकर

चिलचिलाती धूप में

जाते थे शहर के कॉलेज

नंगे पाँव !

अब वे महानगर में

माल रोड पर रहते हैं

चार कमरों के मकान में

ए॰सी॰ में सोए बगैर

नहीं निकलता पेट का पाखाना

कमोड पर बैठकर

वे बिल्कुल याद नहीं करते –

जाया करते थे किस तरह

लोटा लेकर निबटने ,

किस तरह छिल जाया करता था

उनका पृष्ठ भाग

गेहूँ के ठूंठ से

मल खाने के लालच में

किस तरह काट खाया करता था

गुदा- भाग

कोई सूअर !

 

सरकारी खर्चे पर

टैक्सी से देहरादून जाते ,

विमान से बंगलौर जाते

वे बिल्कुल नहीं सोचते

किस तरह जाया करते थे

बस की छत पर बैठकर ,

अपने साथियों के साथ घुसकर

कब्जियाया करते थे

रिजर्वेशेन बौगी में कोई जगह !

कब्जियाने की आदत

वैसे गई नहीं उनकी

दूसरों की जगहों पर काबिज हो जाना

और अपने भतीजों को काबिज करवाने की कला

याद है उन्हें अच्छी तरह !

वातानुकूलित सभा कक्षों में

माइक्रोफोन  के सहारे

अलां वाद और फलां वाद पर

भाषनियाते हुए

उन्हें कभी भी याद नहीं आता

चौक –चौराहों –गलियों –मुहल्लों में

गला फाड़कर नारा लगाना

आम आदमी की आम समस्याओं के प्रति

संघर्ष का संकल्प

भूल आए हैं वे

गाँव की बंस-बिट्टी में,

पटना के गाँधी-मैदान में ।

जंतर –मंतर में

धरने पर बैठे लोग

अब उन्हें चिरकुट नजर आने लगे हैं ।

उनके संघर्ष के दिनों के साथी

जो छूट गए छूट गए छोटे शहरों में ,

बिला गए व्यवस्था की बिलों में

मज़ाक से कम नहीं रह गए हैं ।

तन ढँकने को दे दिया करते थे जो

अपना कुर्ता ,

इंटरव्यू में जाते वक्त

पहना देते थे अपने मोजे ,

सहला दिया करते थे पैरों के जख्म

हारी –बीमारी में रतजगा किया करते थे

खड़े हो जाया करते थे नीम बनकर

उनके मधुमेह के आगे

वे सभी शामिल हो गए हैं

चूतिये की परिभाषा में !

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