सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की कहानी ‘अपना कन्धा, अपनी लाश’

सत्येंद्र प्रसाद  श्रीवास्तव

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां-कविताएं प्रकाशित। एक कविता संग्रह ‘रोटियों के हादसे’ प्रकाशित

पेशे से पत्रकार। फिलहाल टीवी न्यूज़ चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत

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बाइक सवार औंधे मुंह सड़क पर पड़ा था। उसके सिर के चारों ओर खून की एक गाढ़ी काली परत जम गई थी। उसके दोनों हाथों की कुहनियां भी बुरी तरह छिल गई थीं और उनसे भी खून रिस कर सूख गया  था। बुरी तरह चिपके धूल और फटी  पैंट बता रही थी कि गिरने के बाद वो कुछ दूर तक सड़क पर फिसलता चला गया था।

बाइक छिटक कर उससे करीब 50 मीटर दूर गिरी हुई थी। हेलमेट भी थोड़ी दूरी पर पड़ी हुई थी।  उसके आसपास लोगों की भीड़ थी लेकिन ये भीड़ तमाशाई थी। रूकती, झांक कर देखती और  फिर आगे बढ़ जाती।

सड़क पर पड़े बाइक सवार के शरीर में कोई हलचल नहीं थी लेकिन वो जिंदा था। उसकी सांसें धीरे-धीरे चल रही थी। जैसे-जैसे मदद की उम्मीद कम होती जा रही थी, ठीक वैसे-वैसे ही उसकी सांसें मंद पड़ती जा रही थीं।

तभी ऐसा कुछ हुआ, जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। बाइक सवार अचानक लड़खड़ाते हुए उठा। देख कर ही लग रहा था कि उठने में उसे काफी तकलीफ हो रही थी। दर्द से कराह रहा था वह लेकिन फिर भी वह उठा। उसके सिर से खून की धारा एक  बार फिर बह निकली। उसका  पूरा चेहरा खून से सना हुआ था। गुस्से से उसकी आंखें भी खून की तरह लाल थीं। वो लड़खड़ा रहा था। उसके उठते ही भीड़ भी मानो जिंदा हो गई। भीड़ में खुसुरफुसुर बढ़ गई।

वो लड़खड़ाते कदमों से हेलमेट की ओर बढ़ा। किसी तरह झुक कर हेलमेट उठाया। फिर भीड़ की ओर घूमा। उसकी आंखों से गुस्सा खून बन कर टपक रहा था। वो भीड़ में किसी को ढूंढने लगा। ऐसा लगा मानो उसका गुनहगार भीड़ में ही कहीं छिपा हुआ है। अचानक उसकी नज़र मनीष पर पड़ी। भीड़ को चीरते हुए वो आगे बढ़ा बेतहाशा चीखते हुए। उसने हेलमेट से कसकर उसके सिर पर प्रहार किया। मनीष के सिर से खून का फव्वारा फूट पड़ा। वह जोर से चीखते हुए गिर पड़ा।

'क्या हुआ ?  अरे क्या हुआ?' पत्नी मनीष को झिंझोड़ रही थी।

मनीष पसीने से पूरी तरह लथपथ था। सांसें तेज़-तेज़ चल रही थी। गला सूख रहा था, लग रहा था अभी जान निकल जाएगी।

'कोई बुरा सपना देखा क्या?'  पत्नी ने पूछा।

उसके कंठ से बोल नहीं फूटे। उसका हाथ सिर पर चला गया। खून नहीं था। सपना ही देख रहा था वह। एक बुरा सपना लेकिन क्या ये सपना उसकी हरकत से भी बुरी थी। उसने जो किया था, वो ज्यादा बुरा था या ये सपना? बाइक सवार के अचानक उठ खड़े होने से पहले तक का वो सपना पूरी तरह सच था। उस तमाशाई भीड़ में वह भी शामिल था।

उसने पानी पीया। गटागट दो गिलास। उठकर वॉशरूम गया लेकिन पता नहीं क्यों उसे ऐसा लग रहा था कि वो बाइक सवार उसका पीछा कर रहा है। उसकी लाल-लाल आंखें उस पर लगातार गड़ी हुई हैं। उसकी लाल आंखों से खुद को बचाने के लिए वो खुद को खुद से ही छिपाने लगा लेकिन उन लाल आंखों से बचना मुश्किल था।

मनीष ने अपने चेहरे को अच्छी तरह से धोया। उसे ऐसा लग रहा था मानो उसका चेहरा खून से सना हुआ है। वो सपने से बाहर निकल ही नहीं पा रहा था। उसने वॉश बेसिन के ऊपर लगे आईने में अपना चेहरा देखा। उसने अपनी आंखों में बाइक सवार की लाल जलती आंखें देखी। लगा किसी ने उसकी आंखें निकाल उसकी जगह बाइक सवार की आंखें लगा दी हो। गुस्से से उसे घूरती हुई, जलती हुई आंखें। उसने अपनी आंखें जोर से बंद कर ली।

उसने सोने की कोशिश की लेकिन आंखें बंद करते ही बाइक सवार की अंगारों जैसी दहकती आंखें उसे जलाने लगी। उसने आंखें खोल दी। उसकी आंखों और नींद के बीच दो दहकते अंगारे थे। वो परेशान हो गया। उसका शरीर बिस्तर पर था लेकिन मन उसी चौराहे पर पहुंच चुका था, जहां बाइक सवार औंधे मुंह गिरा पड़ा था।

रात के करीब साढ़े बारह बज रहे थे। मनीष अपनी कार से दफ्तर से लौट रहा था। साथ में सतीश भी था। सड़क बिल्कुल खाली थी दफ्तर से लौटने में उसे हर रोज इतनी देर हो ही जाती थी। आम तौर पर सतीश भी साथ लौटता था। दोनों आसपास ही रहते थे।

ये पहला मौका था, जब उसने सड़क पर एक बाइक सवार को इस तरह औंधे मुंह खून से लथपथ पड़े देखा था। उसने गाड़ी रोक दी। पहले से भी कई लोग बाइक-कार रोक कर उसे देख रहे थे।

‘कोई कार वाला ठोंक कर भाग गया होगा’

‘लगता है काफी देर हो गई, खून जम कर काला पड़ने लगा है’

‘लग रहा है अभी भी जिंदा है’

‘अगर अभी भी अस्पताल पहुंच जाय तो शायद जान बच जाय’

‘लेकिन पुलिस समय से पहुंचे तब ना?’

‘पता नहीं पीसीआर वैन को खबर है भी या नहीं?’

‘अरे, उन्हें क्या पड़ी है। आराम से आएंगे’

हमदर्दों की इस भीड़ में मददगार कोई नहीं था।

‘सतीश अस्पताल ले चलें इसे। अस्पताल तो बिल्कुल पास में ही है?’ उसने पूछा

‘सर, क्यों लफड़े में फंसना चाहते हैं? पुलिस वाले अलग तंग करेंगे और कोर्ट कचहरी का चक्कर अलग लगेगा।‘

‘अरे, अब कहां? सुप्रीम कोर्ट ने नियम बड़े आसान कर दिए हैं।‘ मनीष ने कहा।

‘सब कहने को हैं सर। ये अस्पताल वाले ही आपको इतना तंग कर देंगे कि आपके होश ठिकाने आ जाएंगे।‘सतीश ने ऐसे कहा मानो इन सब चीजों का उसे अच्छा खासा अनुभव हो।

‘लेकिन अगर इसे यहां इसी तरह छोड़ दिया गया तो मर जाएगा ये’

‘क्या कर सकते हैं अपना सिस्टम ही ऐसा है। अगर सिस्टम सही होता तो कोई ना कोई इसे अब तक अस्पताल पहुंचा चुका होता। इतनी तो भीड़ है।‘सतीश की आवाज़ में घृणा थी।

लेकिन उसका मन नहीं मान रहा था। उसे लग रहा था कि वो बाइक सवार को लेकर अस्पताल की ओर दौड़ पड़े। उसके पास तो कार भी है। कोई दिक्कत ही नहीं होगी।

तभी उसके मोबाइल की घंटी घनघना उठी। पत्नी का फोन था। वो अपने तय समय से करीब 15 मिनट लेट हो चुका था। पत्नी परेशान होने लगी थी।

‘हां, बस दस मिनट में पहुंच रहा हूं। रास्ते में हूं।‘फोन पर उसने पत्नी से कहा।

इसके घर के लोग भी तो इंतज़ार कर रहे होंगे। यह भी तो किसी के घर का चिराग होगा। बीवी होगी, बच्चे होंगे। कोई ना कोई इसके इंतज़ार में अभी जग रहा होगा।

‘सतीश, यार मन नहीं मान रहा है। कुछ करते हैं।‘

‘सर, दिल से नहीं दिमाग से काम लीजिए। हो सकता है पुलिस आपको ही फंसा दे। कह दे कि आपकी कार से ही एक्सीडेंट हुआ है। ऐसे कई केस पहले हो चुके हैं। फिर खून से लथपथ है, कार पर कहां बिठाएंगे, पूरा सीट खून से सन जाएगा। सर आप मेरी बात मानिए।‘

चुप रह गया वो। गहरी सोच में पड़ गया। इधर लोगों का आना, गाड़ी रोकना, टिप्पणी करना और आगे बढ़ जाने का सिलसिला जारी था।

‘सर, ऐसा करते हैं पुलिस को फोन कर देते हैं।‘ सतीश ने सलाह दी।

उसे ये आइडिया अच्छा लगा। चलो कम से कम मदद तो मिल जाएगी।

तत्काल उसने अपने मोबाइल से 100 नंबर को डायल कर दिया।

‘कहां से बोल रहे हैं?’

‘आप कौन बोल रहे हैं?’

‘अपना पूरा नाम बताइए?’

‘आप भी वहीं हैं?’

‘आप वहां क्या कर रहे हैं?’

ऐसे तमाम फालतू सवालों के पास आखिरकार वो 100 नंबर को ये बताने में कामयाब रहा कि एक्सीडेंट हुआ है और एक बाइक सवार बुरी तरह जख्मी पड़ा हुआ है।

उसे तसल्ली हुई। बाइक सवार को वहीं औंधे मुंह छोड़ वह सतीश के साथ घर की ओर बढ़ चला। एक जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य निभाने के गर्वबोध से लबालब भरा हुआ। गर्वबोध छलक कर बाहर भी आ गया, ‘सतीश, ये अच्छा हुआ। आखिर इतना भी कौन करता है? पता नहीं  कब से पड़ा है लेकिन अभी तक किसी ने 100 नंबर पर फोन  भी नहीं किया था।‘

‘बिल्कुल सर। हमने जो किया वही उचित था। अब देखिएगा थोड़ी देर में ही उसे मदद मिल जाएगी और पुलिस उसे अस्पताल पहुंचा देगी।‘सतीश ने उसके गर्वबोध को सहलाया।

इसी बीच उसके मोबाइल की घंटी फिर बज उठी। अन्नोन नंबर था। वो कार ड्राइव कर रहा था, इसलिए सतीश ने ही उठाया।

उधर से पुलिस वालों का फोन था। पीसीआर वैन पर तैनात पुलिस अधिकारी पता समझने के लिए फोन किया था। सतीश बड़ी मुश्किल से उसे पता समझा पाया था.

‘पता नहीं, कैसे पुलिस वाले हैं? प्रमुख चौराहा है, फिर भी पता समझने में उन्हें इतनी देर लगी। पीसीआर वैन पास में ही फ्लाइओवर के पास है। अभी दो मिनट में ही पहुंच जाएगी।‘ फोन रखते ही सतीश ने कहा।

मनीष को और तसल्ली हुई। बाइक सवार को अस्पताल नहीं ले जाने के अपराध बोध को जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य निभाने वाला गर्व बोध दबाने की पूरी कोशिश कर रहा था। सतीश को उसके घर के पास उतार वो भी घर पहुंच  गया। करीब 20 मिनट बाद पीसीआर वैन से फिर फोन आया। अभी भी वो पते पर नहीं पहुंच पाये थे। उसने फिर से पता समझाया लेकिन वो शॉक्ड था। अभी तक बाइक सवार को मदद नहीं मिली थी. अभी तक वो वहीं सड़क पर पड़ा जिंदगी की जंग हार रहा होगा। खुद पर झुंझला उठा वो। उसने अपने अंदर के जिम्मेदार नागरिक को एक भद्दी सी  गाली दी। अपराध बोध फिर हावी होने लगा था।

    

दूसरी बार आए पीसीआर वैन के फोन ने उसे परेशान कर दिया था। 100 नंबर पर फोन लगाने के बाद जिस सुकून का एहसास उसे हुआ था, अब वो गायब हो चुका था। पता नहीं पुलिस वाले समय से पहुंचे या नहीं। बाइक सवार को मेडिकल सहायता मिली या नहीं? तमाम सवाल उसे परेशान कर रहे थे।

सपने के बाद तो नींद बिल्कुल गायब हो चुकी थी । आंखें बंद करते ही बाइक सवार अपनी लाल-लाल आंखें लेकर डराने चला आता। वो बिस्तर पर करवटें बदलता रहा। पत्नी बेसुध सो रही थी।  आठ साल की बिटिया भी निश्चिंत सो रही थी। उसके चेहरे पर एक ऐसा सुकून था, जिसे देख मन को शांति मिलती  थी। वह बेटी को चेहरे को अपलक  निहारता रहा तभी उसके मोबाइल की घंटी फिर बज उठी। उसने घड़ी की ओर देखा। रात के ढाई बज रहे थे। पत्नी भी घबरा  कर उठ गई।

‘इतनी रात को किसका फोन है’ पत्नी की आवाज़ में घबराहट थी।

‘देख रहा हूं’ मनीष ने कहा।

उसने तेजी से मोबाइल उठाया। अन्नोन नंबर था। उसका दिल धकधक करने लगा। उसने फोन उठाया। उधर से किसी पुलिस वाले का फोन था। पीसीआर वैन से। फिर से पता पूछ रहे थे। 100 नंबर पर कॉल किये दो घंटे बीत चुके थे। पीसीआर वैन दस मिनट का रास्ता  दो घंटे में भी तय नहीं कर पाई थी।

वह एक बार फिर पता समझा तो रहा था लेकिन उसे खुद भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर ये हो क्या रहा है। उसका दिमाग सुन्न हुआ जा रहा था। पुलिस वालों पर उसे गुस्सा आ रहा था। खुद पर गुस्सा आ रहा था। सतीश पर गुस्सा रहा था। वह अभी खुद को वैसा ही लाचार पा रहा था, जैसा सड़क पर औंधे मुंह पड़ा वो बाइक सवार था।

‘क्या कर सकते हैं अपना सिस्टम ही ऐसा है। अगर सिस्टम सही होता तो कोई ना कोई इसे अब तक अस्पताल पहुंचा चुका होता।‘सतीश की बातें उसकी कानों में गूंजने लगी।

सिस्टम! सिस्टम!! सिस्टम!!!

सिस्टम की ऐसी की तैसी। उसे किस सिस्टम ने रोका था बाइक सवार को अस्पताल पहुंचाने से? उसने तो खुद ही खुद को रोक दिया था। पुलिस, कोर्ट-कचहरी के डर से। क्या इस डर से एक आदमी को ऐसे ही सड़क पर मरने दिया जा सकता है। अगर वो अड़ जाता है कि उसे बाइक सवार को अस्पताल लेकर जाना ही है तो क्या सतीश उसे रोक पाता? सतीश को मजबूरी में उसके साथ जाना पड़ता। सतीश का मना करना सिस्टम है। सतीश के मना करने पर उसका मान जान एक सिस्टम है। सिस्टम और कुछ नहीं, बस एक खोल है, जिसमें छिपकर हम निश्चिंत हो जाना चाहते है। जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेना चाहते हैं। जो करना है दूसरा कोई करे। हमें कुछ नहीं करना क्योंकि सिस्टम खराब है। सिस्टम बाधा नहीं, बल्कि समाज के प्रति अपने दायित्वों से बचाने का एक बहाना है। मनीष झुंझला उठा।

अगर उस बाइक सवार की जान चली गई होगी तो इसके लिए वो जिम्मेदार है। उसे टक्कर मार कर भाग जाने वाले से भी बड़ा दोषी वो है क्योंकि मारने वाला तो भाग गया लेकिन वो बचा सकता था, वो भी भाग आया।

मनीष फफक फफक कर रो पड़ा।

              ***       ***        ***       ***

मनीष की गाड़ी तेज़ी से चौराहे की ओर बढी  जा रही थी। बगल की सीट पर पत्नी बैठी हुई थी। वो जल्द से जल्द उस चौराहे पर पहुंच जाना चाहता था ताकि अगर बाइक सवार को जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचा सके। उसके चेहरे पर उद्विग्नता थी। पत्नी का चेहरा सपाट-उदास था। 

सारी बातें सुनने के बाद पत्नी ने उससे पूछा था, ‘अगर वो बाइक सवार तुम्हारा कोई अपना होता तब भी क्या तुम उसे पुलिस-कोर्ट-कचहरी के डर से छोड़ कर भाग आते?’ 

पत्नी के इस एक सवाल ने उसके दिमाग में पड़े सिस्टम के जाले को पूरी तरह साफ कर दिया। वो तेज़ी से बढ़ा जा रहा था। ज्यादा वक्त नहीं लगा। सड़क खाली थी। स्ट्रीट लैंप जल रहे थे, लेकिन सड़कें उदास थीं।

ज्यादा वक्त नहीं लगा। वो मौके पर पहुंच गया लेकिन अब वह जगह सूनसान थी। जिस जगह बाइक सवार औंधे मुंह गिरा हुआ था, वहां खून के धब्बे अब भी थे लेकिन बाइक सवार अब वहां नहीं था। न ही उसकी बाइक वहां थी, ना ही हेलमेट। कांच के टुकड़े जरूर बिखरे हुए थे, जिससे यह प्रतीत हो रहा था कि यहां कोई हादसा हुआ था लेकिन इस बात का कोई आभास नहीं मिल रहा था कि यहां कितना बड़ा हादसा हुआ था। किस तरह यहां एक बाइक सवार मदद के लिए तड़पता रहा और किस तरह यहां मानवता ने दम तोड़ा था.

मनीष का दिल बैठ गया। पता नहीं क्या हुआ होगा? क्या जब उसे अस्पताल ले जाया गया होगा तब वो जिंदा होगा? क्या वो बच गया होगा? या मदद नहीं मिलने की वजह से उसने वहीं सड़क पर दम तोड़ दिया होगा? उसके पास किसी सवाल का जवाब नहीं था।

उसने कातर निगाहों से पत्नी की ओर देखा।

अस्पताल चल कर देखें—पत्नी ने पूछा। वह उसके दिल पर पड़े अपराध बोध के बोझ को हल्का  करना चाहती थी।

थोड़ी ही देर में वो पास के बड़े निजी अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में थे लेकिन पिछले दो घंटे में किसी भी घायल बाइक सवार को यहां नहीं लाया गया था। एक स्टाफ ने बताया कि पुलिस आम तौर पर सरकारी अस्पताल ही लेकर जाती है और अगर मौत हो जाय तो फिर तो निजी अस्पताल की ओर रुख करने का कोई मतलब ही नहीं।

उसके कदम लड़खड़ा गए। हदस कर वह वहीं चेयर पर बैठ गया। पत्नी ने अगर तत्काल सहारा नहीं दिया होता तो शायद वह गिर ही जाता। लग रहा था जैसे उसके किसी अजीज की मौत हो गई हो।

जब वो इमरजेंसी वार्ड से निकला तो उसके कदम नहीं उठ रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो किसी ने उसके दोनों पैरों में सौ-सौ किलो के पत्थर बांध दिये हो।

आज जो कुछ भी हुआ, उसके लिए वह भी जिम्मेदार है। उसे पता  नहीं कि बाइक सवार जिंदा है या मर गया लेकिन उसे यह जरूर पता है कि वह मर चुका है। मदद करने की बजाय जिस वक्त वो 100 नंबर पर कॉल कर भागा था, तभी उसकी आत्मा ने दम तोड़ा होगा। कोई जिंदा आदमी भला ऐसा कैसे कर सकता है? सड़क पर तड़पते किसी इंसान को छोड़ कर कोई जीवित आदमी कैसे भाग सकता है?

अपनी लाश को अपने कंधे पर टांगे किसी तरह कदम घसीटते हुए वो अपनी कार की ओर बढ़ चला।

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2 Responses

  1. राजेश"ललित"शर्मा says:

    “अपना कंधा,अपनी लाश” कहानी नहीं यथार्थ है।व्यवस्था की नाकामी और समाज की संवेदनहीनता का परिणाम है इस तरह की घटनायें। शानदार कहानी के लिये सत्येंद्र श्रीवास्तव जी को साधु।

  2. AK Bhatia Akubha says:

    करीब बीस साल पहले मेरी एक कहानी भी इसी तर्ज़ पर थी. फर्क इतना है कि मेरी कहानी का नायक सही निर्णय लेता है और सड़क पर पड़े व्यक्ति को अपनी गाड़ी में डाल कर अस्पताल ले जाता है. मेरी कहानी उस आदर्श को दर्शाती है जो हम सब में है लेकिन सिस्टम की वजह से सामने नहीं आ पाता. आपकी कहानी भूमि पर यथार्थ की कहानी है.

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