सलामत रहे दोस्ताना हमारा

  संजय स्वतंत्र

हर शनिवार, किस्त 14

मेट्रो में यात्रा करते समय फेसबुक मेसेंजर पर आए मित्रों के संदेश प्राय: मेरा ध्यान खींच लेते हैं। आज दफ्तर जाते समय बीप की ध्वनियों को मैंने नजरअंदाज कर दिया। ऐसा अक्सर होता है, जब मैं तमाम संदेश फुर्सत में या फिर सफर के दौरान पढ़ता हूं। मेरी यह आदत कई बार महंगी पड़ जाती है, जब मालूम होता है कि वह घर या दफ्तर से आया कोई जरूरी संदेश था, जिसे मैंने समय पर देखा ही नहीं। ऐसा हम में से कई लोग करते होंगे।

........ तो मेट्रो में सीट पर बैठते ही मैंने फेसबुक ऑन कर लिया है। आज आखिरी कोच में ज्यादातर सीटें खाली हैं। गिनती के यात्री। हम अपने आसपास या संबंधों में बेशक एक दूरियां महसूस करते हों, मगर सोशल साइटों ने लोगों की दूरियां मिटाई हैं। सुदूर बैठा मित्र भी अब लगातार आपके संपर्क में हैं। वहीं एक दूसरे से अनजान लोग भी अच्छे मित्र बन रहे हैं। यह उस खुली खिड़की की तरह है, जहां से आप जब चाहे अपने पड़ोसी से बतिया लेते हैं। फेसबुक पर अब जीवन की हर गतिविधि दोस्तों के बीच साझा की जा रही है। ........ देख रहा हूं कि अभी हमारी एक मित्र ने प्रसव के कुछ घंटे बाद ही अपने नवजात शिशु की तस्वीर साझा कर मां बनने की सूचना दी है। सैकड़ों मित्र बलैया ले रहे हैं। मैं भी अपनी शुभकामनाएं व्यक्त कर रहा हूं- मां बनने पर आपको बधाई। शिशु के उज्ज्वल भविष्य की कामना।

फेसबुक नोटिफिकेशन चेक करते हुए आप जान जाते हैं कि किस मित्र ने क्या लिखा है और आपके लिखे पर किसने टिप्पणी की है। सच कहूं तो यहां हरदम दोस्तों की महफिल सजी रहती है। कोई गीत सुना रहा हैं तो कोई सीधे लाइव होकर रू-ब-रू है। इन सब के बीच साहित्य से लेकर राजनीति और किस्सागोई से लेकर मेरी तरह बतकही चल रही है। नवोदित कवियों और कवयित्रियों को तो जैसे एक बड़ा मंच मिल गया है, जहां से उनका निरंतर पाठ होता रहता है। अब ऐसे में आलोचकों का कोना न हो, यह मुमकिन है क्या। वे भी अपने नश्तर तेज करते रहते हैं। लिहाजा उनसे अपनी गर्दन बची रहे, यही बेहतर। अलबत्ता, वे भी आपके मित्र ही हैं।

फेसबुक पर नजर दौड़ाते हुए मुझे अपनी रेडियो जॉकी मित्र देविका का संदेश दिखा है- आपको फेसबुक मैसेज किया, आपने पढ़ा नहीं.......फिर दूसरा सवाल- मेसेज आ नहीं रहे आपके पास?? मेरा जवाब है- नहीं पहुंचे। ....... फिर तीसरा सवाल- ये कैसे हुआ.......आया ही नहीं अपके पास??? एक लंबे अंतराल के बाद मित्रों के संदेश आते हैं, तो सुखद लगता है। इनसानों के बीच बढ़ रही दूरियों और सामाजिक संबंधों में बढ़ रहे सन्नाटे के बीच इस संदेश की चर्चा इसलिए कि आप कहीं भी हों आपके मित्र तकनीक के नए माध्यमों से आपको ढूंढ ही लेते हैं। आप उनसे कभी दूर नहीं होते। अब उनके बिना रह भी नहीं सकते। आप उनसे विचारों से लेकर सुख-दुख तक जुड़े रहते हैं।

सच कहूं तो मेरे लिए मित्रता कृष्ण जैसा सखा भाव है। न जाने किस मित्र के मन में कान्हा मिल जाएं। यह सखा भाव कृष्ण-सुदामा मैत्री की तरह है। सच्चा मित्र जानता है कि आप क्या हैं? आपकी कमजोरियां क्या हैं। या आप किस मुश्किल में हैं। याद कीजिए सुदामा को, जब वह अपने परमप्रिय मित्र से मिलने राजमहल पहुंचे थे। उन्हें भेंट में देने के लिए इस गरीब मित्र के पास चना-चबेना के सिवाय और था ही क्या। बेहद संकोच के साथ कृष्ण को यह सब दिया। मगर सोने-चांदी के बर्तनों में छप्पन भोग लगाने वाले मित्र ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।

मित्र से गले मिलते हुए कृष्ण ने जान लिया कि सुदामा किस मुश्किल में है और वह क्यों आया है। एक समर्थ मित्र के होते हुए अनन्य मित्र कैसे असमर्थ हो सकता है? रुकमिणी ने शायद यही पूछा होगा कृष्ण से। और कान्हा ने जवाब दिया होगा- मेरा मित्र असमर्थ नहीं। वह यहां से घर लौटेगा तो समर्थ होगा। यही हुआ। सुदामा लौटे तो आपनी झोपड़ी को महल में बदला पाया। फटेहाल परिवार खुशहाल हो चुका था। सच्चे मित्र ऐसे ही होते हैं जो आपके उजड़े हुए दिल के दयार को भी आशा के दीप से जगमग कर देते हैं। मन की गुरबत दूर कर देते हैं।

.........मेट्रो अपनी रफ्तार में है। राजीव चौक आने में अभी समय है, तो अभी फेसबुक पर मित्रों के उद्गारों को पढ़ता जा रहा हूं। सुदूर कहीं बैठा मित्र जब अपने अनुभवों को बांटता है तो लगता है कि वह अपनी परंपरा, अपनी संस्कृति और अपनी भावनाओं को भी साझा कर रहा है। हम उनके विचारों से महसूस कर सकते हैं कि वह एक सच्चा इनसान ही होगा। इन्हीं में से कोई आपका अच्छा मित्र बन जाता है। जानते हैं क्यों। क्योंकि दिल यह कहता है कि किसी जन्म का बिछड़ा हुआ यह कोई पुराना मित्र है। हालांकि उन्हें समझने-बूझने में समय लग सकता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि फेसबुक यूजर्स में से कोई नौ फीसद से ज्यादा लोगों की पहचान फर्जी है। जिनका ठिकाना नकली है। जिनके चेहरे नकली हैं। आप यह भी पहचान नहीं पाते कि मित्रता के लिए हाथ बढ़ा रहा शख्स स्त्री है या परुष!

मेरी मेट्रो कश्मीरी गेट स्टेशन पहुंच गई है। गेट खुलते ही मेरा ध्यान भंग हुआ युवा लड़के-लड़कियों की चुहलबाजियों से। इनकी बातों से ही पता चला कि आज फ्रेंडशिप डे यानी मैत्री दिवस है। बाजार की नजर अब हमारी दोस्ती पर भी है। वह फ्रेंडशिप बैंड बेच कर दोस्ती की गांठें मजबूत करता हो या नहीं, पर अपनी जेब जरूर भारी कर रहा है।

इन युवाओं के हाथों में रंग-बिरंगे बैंड बंधे हैं। मन की खुशी कलाइयों पर झिलमिला रही है। सभी खुश हैं। दोस्ती का यह नया रक्षा सूत्र है। यह मैत्री कितने बरसों तक निभेगी, यह तो भविष्य ही बताएगा। बहरहाल, दोस्ती के इस उमंग भरे दौर को ये सभी जी तो रहे हैं। यह क्या कम बड़ी बात है। हालांकि मित्र वही जो मुश्किलों में साथ निभाए। जो आपके दुख-सुख को दम साध कर सुने। अपने सुझावों से भटकने न दे। ठीक उसी तरह जैसे अंधकार के समय बीच समंदर में जहाज को एक लैम्पपोस्ट सही राह दिखा देता है।

इन युवा लड़के-लड़कियों को देख कर कहना मुश्किल है कि ये कितने कदम साथ चलेंगे। क्योंकि सबकी मंजिल दूर और अलग-अलग है। अगर इनमें कुछ की मैत्री सच्ची होगी तो निश्चित रूप से जीवन के आखिरी छोर तक जाएंगे। प्रेम करते हुए आप गिर सकते हैं, लेकिन ये दोस्त ही होते हैं जो आप को कई बार संभाल लेते हैं। आप ऐसे दोस्तों को कभी भूल नहीं पाते। इसलिए सच्चे मित्र को खो देना बहुत दुखदायी होता है।

यों स्कूल कालेज की दोस्ती दूर तक नहीं जाती। याद कीजिए अपने पुराने दिनों को। स्कूल के कितने सहपाठी आज भी आपके दोस्त हैं? जो आपके घर अब भी आते हों या उनसे फोन पर उनसे बात होती हो? शायद एक भी मित्र ऐसा न हो जो बरसों बाद अचानक फोन कर के कहे- अबे, उल्लू के पट्ठे, मैं संजीव बोल रहा हूं जयपुर से। फोन नही कर सकता था मुझे........?

आज फ्रेंडशिप डे पर सिविल लाइंस वाले स्कूल के दिनों के प्रिय मित्र संजीव की बहुत याद आ रही है। पीठ पर जोर से धौल जमाने वाला और घर ले जाकर नाश्ता कराने वाला। अभी वह सरहद पर हम सब की सुरक्षा में तैनात है।...... कम ही दोस्त हैं मेरे, मगर जितने भी हैं, बहुत प्यारे हैं। जो जीवन के आखिरी कदम तक साथ चलने को तैयार हैं। वे आज भी बुलाते हैं घर पर। इनके घर गाजियाबाद से लेकर गुड़गांव तक, पटना से लेकर कोलकाता और अंडमान निकोबार तक व वाराणसी से लेकर देहरादून तक, कहां नहीं हैं अपने मित्र। नहीं जा पाता, तो यह दोष मेरा है। उनका नहीं। बनारस में बैठी मित्र कई बार बोल चुकी- आइए न कभी। अस्सी घाट के किनारे गरमा-गरम जलेबी और समोसे खाएंगे। कुल्हड़ वाली चाय पर बैठकी होगी।

कोई मित्र घर पर चाय या भोजन पर बुलाए तो यह साफ है कि वह आपका बहुत सम्मान करता है। आप पर भरोसा करता है। जाहिर है कि आपका उत्तरदायित्व बढ़ जाता है। ऐसे मित्र प्रतिद्वंद्वी नहीं हो सकते। क्योंकि वे आपके साथ बहुत दूर तक जाना चाहते हैं। आपके सुख-दुख को जीना चाहते हैं। जीवन के कुछ हिस्से को बांटना चाहते हैं।

मेरे सोचने के इस क्रम में राजीव चौक स्टेशन आने की उद्घोषणा हो रही है। मित्रता की कड़ी में बंधे युवा सह-यात्रियों की खुशियों में से कुछ हिस्सा बटोर कर मैं उतर रहा हूं। इस खुशी को मैं आप सभी मित्रों के बीच बांट देना चाहता हूं। आज मित्र दिवस पर तमाम दोस्तों से गुजारिश है कि आप किसी के सच्चे मित्र बनें या न बनें, मगर भावनात्मक और रचनात्मक रिश्ते को हमेशा सहेज कर रखें। मित्रता का यह भी एक तकाजा है। निभाएंगे न इसे?

राजीव चौक उतर रहा हूं। स्टेशन पर आज युवाओं की संख्या ज्यादा है। निश्चित तौर से दोस्ती के नाम समर्पित दिन को मनाने ये निकले हैं। गलबहियां डाले। हाथों में हाथ लिए। ऐसा बिंदासपन और ऐसी बेफिक्री हमेशा बनी रहे। गिले-शिकवे एक तरफ, हर दिन हो दोस्ती का नया पैगाम। इस सोशल साइट को धन्यवाद, जिसने कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और पहाड़ से लेकर नदियों व समंदर किनारे बसे शहरों में बैठे मित्रों की ऐसी शृंखला बनाई है, जिसमें भारतीयता का एक भावनात्मक बोध होता है। सहमति और असहमति के बीच विमर्श से एक दिशा मिलती है इस देश को, जिसके हम नागरिक कहलाते हैं।

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