सविता मिश्रा की दो लघुकथाएं

एक

“क्या हुआ बेटा ? तेरी आवाज क्यों काँप-सी रही हैं ? जल्दी से बता ..हुआ क्या ..?”
“माँ वो गिर गया था सुबह-सुबह…।”
“कैसे, कहाँ गिरा, ज्यादा लगी तो नहीं ? डॉक्टर को दिखाया! क्या बताया डॉक्टर ने ?”
“न माँ ज्यादा तो नहीं लगी, पर डॉक्टर कह रहे थे कि माइनर आपरेशन करना पड़ेगा। नाक में भीतरी चोट है।”
“आपरेशन…ऽ…ऽ…”
“अरे मम्मा, परेशान होने वाली बात नहीं हैं।”
“सुन, अभी मत कराना ऑपरेशन। मैं तुरन्त चलती हूँ, शाम तक पहुँच जाऊँगी।”
प्रभु को याद करती हुई मानसी फोन रखते ही रो पड़ी। तुरन्त ही बेटे के पास जाने की तैयारी में जुट गयी हबड़-तबड़।
अभी दो साल पहले ही मिक्कू के पैरों का आपरेशन हुआ था—बस में बैठ वह सोचने लगी—फिर दो-तीन बार और दुर्घटना हुई और अब ये नाक पर चोट! भगवान, तू इस तरह क्यों बार-बार परीक्षा ले रहा है मुझ गरीब की!!! सोचते-सोचते साड़ी के पल्लू से रास्ते भर अपने आँसू पोंछती रही वो।

घर पहुँचते ही मिक्कू को साथ ले, अस्पताल पहुँची। बरामदों तक में पड़े कराहते हुए, रोते और दर्द से तड़पते हुए मरीजों और उनके तीमारदारों को देख वह भौंचक रह गयी। उसने हँसते हुए उसके साथ चल रहे मिक्कू की ओर देखा।
सोचने लगी—मुझे तो काजल की लकीर सा हल्का धब्बा ही दिया प्रभु ने। इन सब मरीजों के जीवन में तो काली रात का अँधेरा भर रखा है। तू बड़ा दयालु है भगवान, यूँ ही कृपा बनाए रख।

अपने आँसू पोंछ वह मुस्कराती हुई डॉक्टर की केबिन में घुस गई।

दो

रविवार की अलसाई सुबह थी सब चाय ही पी रहे थे कि फोन घनघना उठा। खबर सुनकर सभी सकते में आ गये बड़े ताऊजी का जवान पोता दीपक (भतीजा) दो दिन के बुखार में चल बसा। अंतिम संस्कार तक गाँव पहुंचना मुश्किल था इसलिये बड़े भैया ने उठावने में शामिल होने का निश्चय किया।
रविवार सुबह के काम नाश्ते का मेन्यू सब स्थगित कर दिये गये। तय हुआ दोपहर बारह बजे बाद फीका खाना बनेगा तब तक वहाँ सब काम निपट जायेगा।
छोटे भाई मनोज का मन बहुत दुखी था वह और दीपक साथ साथ खेल कर बड़े हुए थे। वह उसके साथ बिताए बचपन की बातें याद कर बार बार भावुक हो जाता।
दोपहर हो गई थी शीला सोच ही रही थी कि अब खाना बनाऊं तभी उसकी जेठानी ने कहा
“अच्छा सुनो, शीला मैं तुम्हारे जेठ जी के साथ जरा यमुना किनारे जा रही हूँ | कुछ शांति मिलेगी, मन बेचैन हो उठा है यह सुनकर|”
शीला ने फीका खाना बनाया जो बड़ी मुश्किल से खाया गया। शीला के बेटे को स्वाद नहीं आया उसने कुछ खाया ही नहीं और भूखा ही सो गया।
शाम ढल चुकी थी| तभी जेठ और जेठानी हँसते-खिलखिलाते हुए आ गए |
जेठानी ने आम पकड़ाते हुए कहा, “लो शीला बड़ी मुश्किल से मिला, सबको काट कर दे दो|”
शीला कभी अपने भूखे सो गए बच्चे को देखती तो कभी घड़ी की ओर|
“अरे जानती हो शीला, यमुना के किनारे बैठे-बैठे समय का पता ही न चला|”
“हाँ दी क्यों पता चलेगा! दुखों का पहाड़ जो टूट पड़ा है!” शीला दुखी हो बोली|
“तुम्हारे जेठ की चलती तो अब भी ना आते| कितनी शांति मिल रही थी वहां | मैंने ही कहा कि चलो सब इन्तजार कर रहे होंगे..|”
“दीदी, साड़ी पर चटनी का दाग़ लग गया है|”
सुनते ही चेहरा फ़क्क पड़ गया| बोलीं – “इस बंटी ने लगा गिरा दिया होगा| फ्रीज से चटनी निकालकर चाट रहा था बदमाश|”
“परन्तु दीदी, चटनी तो कल ही .. “
“तू कुछ खाई कि नहीं ! आ ले आ आम काट दूँ, तुम सब लोग खा लो| मुझे तो ऐसे में भूख ही न लग रहीं |”

रहने दो दीदी परिवार की परंपरा छोटों पर ही लादी जाती है।
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