सारिका भूषण की दो लघुकथाएं

सारिका भूषण

शिक्षा - विज्ञान स्नातक

प्रकाशित काव्यसंग्रह ----  " माँ और अन्य कविताएं " 2015                            " नवरस नवरंग "  साझा काव्य संग्रह 2013

 "कविता अनवरत " (अयन प्रकाशन ) 2017 एवं

 " लघुकथा अनवरत " ( अयन प्रकाशन ) 2017 में प्रकाशित कविताएं ।

" समकालीन हिंदी कवितायेँ " काव्य संग्रह 2017 में प्रकाशित कविताएं

" कथादेश" , "कादम्बिनी " , " गृहशोभा" , " सेवा सुरभि " , " ब्रह्मर्षि समाज दर्शन "  आदि कई प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित

आकाशवाणी एवं दूरदर्शन रांची से समय समय पर कविताएँ , कहानियाँ व नाटक प्रसारित

राष्ट्रीय महिला काव्य मंच , झारखंड इकाई की राज्य अध्यक्ष

'झारखंड हिंदी साहित्य संस्कृति मंच 'की कोषाध्यक्ष एवं मंच की काव्यात्मक गतिविधियों  में निरंतर सक्रियता

" नव सृजन साहित्य सम्मान 2017 " से सम्मानित

"अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता " में नवां स्थान प्राप्त

 
 
पूंजी
 
 " हाय ! अब तो चेहरे पर रौनक ले आओ। आखिर दो साल बाद तुम्हारा दूल्हा आया है । " सुनीता के काम से निकलते ही बाहर उसका इंतज़ार कर रही सखियों ने चुटकी ली ।
" अरी कुछ तो बोल ! आज तो तुम्हारे घर पर मिलने वालों की भीड़ थी । हँस - हँस कर बड़ी खातिरदारी भी कर रही थी ।" मंदिर के पास वाले घर के आउट हाउस में रहने वाली अनीता ने तपाक से बोला ।
            स्वभाव से थोड़ी गंभीर ही रहने वाली सुनीता ने बस धीरे से मुस्कुरा दिया । सखियाँ सवाल पर सवाल कर रही थी और सुनीता सबकी बस सुन रही थी । मानो सखियों का साथ तो अच्छा लग रहा था पर दिल को कुछ जवाब देना उचित प्रतीत नहीं हो रहा था। कभी - कभी खुशियों से भरा माहौल भी ख़ामोशी के किस्से सुनाता है, जिसे दूसरे या तो देख - सुन नहीं पाते या समझना नहीं चाहते ।थोड़ी ही देर में सुनीता अपने उस घर के गेट पर आ पहुंची थी जिसके आउट हाउस में वह रहा करती थी । 
           " अच्छा - अच्छा अब मैं चलती हूँ , दोनों बेटियाँ कल से ही बाप से चिपकी हुईं हैं। अब उनके खाने पीने का भी इंतज़ाम करना है ।" थोड़ी भरी आवाज़ में मुस्कुरा कर यह कहते हुए सुनीता ने अपनी सखियों को विदा किया । जब अपनी ही आवाज़ में अपने दामन की खुशियाँ भी खनक कर नहीं बोले तब या तो दामन खाली है या दिल भारी है ।
                  चंडीगढ़ से लायी गयी चटकीली कुर्ती भी सुनीता को नहीं भा रही थी।मन में उठते कई प्रश्न बेचैन किये जा रहे थे । जिस व्यक्ति ने पिछले चार सालों में तीन या चार बार फ़ोन और कुल 500 रूपये भेजकर अपनी ज़िम्मेदारी निभाई है , वह आज अचानक इतना अपनापन क्यों जता रहा है ? पूरे पांच वर्षों तक सुनीता ने हरियाणा के एक गांव में अपनी शादीशुदा कड़वी ज़िन्दगी काटी थी । झारखण्ड से काम की तलाश में सुनीता अपनी सहेलियों के साथ चंडीगढ़ गयी थी और कुछ ही महीनों में उड़ते सपनों ने उसके पर काट डाले थे । इतनी उड़ान भरने की सजा वह आज तक बेटियों के साथ काट रही थी । बड़ी मुश्किल से वह सालों जिल्लतें सहन कर अपने शहर लौट पायी थी । 
                    " माँ , क्या सोच रही हो खड़ी- खड़ी ? जल्दी से आओ न । देखो तो सही पापा  और क्या - क्या लाये हैं ।" छोटी बेटी की तेज आवाज़ सुनकर सुनीता की तन्द्रा टूटी ।
 
            " क्या हुआ सुन्नो रानी ? दो दिनों से मारे ख़ुशी के बोल ही नहीं फुट रहे । अब तो चुप्पी तोड़ो ।" पति की कटाक्ष सुनकर सुनीता के सारे घाव हरे हो गए । शरीर में एक नया जोश महसूस हुआ जो पहले कड़वी गालियाँ सुनते ही दब जाया करता था। 
             " आखिर  मेरे पास अब क्या छीन कर ले जाने आए हो ? " बच्चों के सोने के बाद सुनीता ने अपने पति की आँखों में आँख डालकर कड़क आवाज़ में पूछा । सुनीता का पति उसकी अंगारे बरसाती आँखें और पाषाण बन चुके बदन को देखकर थोडा सकपकाया । फिर अपनी बेटियों की ओर देखा और कोने में सोने चला गया ।गजेन्द्र चौटाला ने फिलहाल धौंस दिखाना मुनासिब नहीं समझा । 
               " सुबह देख लूँगा सारी अकड़ " भुनभुनाते हुए करवट ले ली। 
                बाहर से आती आवाज़ों ने चौटाला की नींद तोड़ी तो देखा कि सूर्य की किरण उस खाली घर के अंदर फ़ैल चुकी थी । उसका सर भारी लग रहा था और सुनीता और उसके बच्चे कहीं नहीं दिख रहे थे । ठीक ठाक और टूटे फूटे सारे सामान वैसे ही पड़े थे बस सुनीता अपनी पूंजी आँचल में समेट कर ठीक वैसे ही निकल पड़ी थी जैसे चार साल पहले । 
              सुनीता को चौटाला की मंशा समझते देर न लगी थी । मगर इस बार उसने अपनी पूंजी ... अपनी मासूम बेटियों को बचा लिया था और बचा लिया था उस निश्छल मासूमियत को जो ज़िन्दगी के झूठे सपने , प्यार और उपहार  के झांसे में आकर कभी न कभी अपना सर्वस्व लुटा बैठते हैं ।
 
               
 गुफ्तगू
 
          " बड़ी मुश्किल से पार्किंग मिली है । मैं बस कुछ देर में आता हूँ । तब तक तुम गाड़ी में गाने सुनो ।" निहार ने ऋचा को बड़े प्यार से समझाते हुए गाड़ी के शीशे आधे खोले और गेट बंद किया । चाभी जेब में डाल कर ऋचा को एक बार फिर अपने जल्द लौटने का इशारा कर मॉल की बगल वाली गली में तेजी से निकल गया ।                         
             ऋचा समझ नहीं पा रही थी कि निहार उसे बच्चों की तरह क्यों समझा रहा है । पंद्रह मिनट बीत चुके थे । अब ऋचा बोर होने लगी थी । उसने गाना बंद किया और खिड़की के शीशे पूरे खोल कर बाहर देखने लगी । रास्ते पर चलते लोगों को देखकर उनकी परिस्थितियों व भावनाओं का अनुमान लगाने लगी ।जैसा कि अमूमन  हम सभी अकेलेपन दूर करने के लिए खुद से गुफ्तगू किया करते हैं ।बाहर का परिवेश  चलचित्र की भांति हमारे सम्मुख आता है और शुरू जाती है खुद से गुफ्तगू ।
             ऋचा बाईक पर चमगादड़ की तरह चिपके युवक युवतियों को देखकर कभी अफ़सोस करती कि अपने तो ये दिन आए ही नहीं तो कभी मॉल से निकलते हाथ में हाथ डाले जोड़ों को देखकर सोचती कि निहार को तो यह सब दिखावा लगता है ।
                        जब कभी ऋचा ने निहार से ऐसे रोमान्टिक मूड देखने की ख़्वाहिश जतायी तो निहार तुरंत झिड़क देता " क्या बचकानी बातें करती रहती हो ?"  ऋचा मुंह बनाकर रह जाती " तुम बचपन के बाद सीधे बूढ़े हो गए हो । उफ़ कहाँ फंस गयी मैं ।" निहार  उस वक़्त ऋचा को देखकर मुसकुरा देता ।
                   छोटे बच्चों की शैतानियाँ और उनके ज़िद्दी स्वभाव से परेशान माता पिता को देखकर ऋचा अपने अतीत में खो गयी ।" ऐसे ही ज़िद निशि और तरुण भी किया करते थे ।  मैं तो डाँट- डपट  देती थी । हमेशा की तरह निहार ही संभालते थे । मुझमें इतना धैर्य कहाँ । मैं तो हर समय उतावली हो जाती हूँ । " मन ही मन ऋचा मानो अपनी गलती मान रही थी । " अभी बच्चे इतने बड़े हो गए हैं । इतनी दूर चले गए हैं .... खुश हैं ..... मस्त हैं .... पर न जाने क्यों मैं बेचैन ......."
                      " ऋचा ! ऋचा!! आंखें खोलो ......प्लीज़ ऋचा ..... "  निहार की घबराई आवाज़ लगातार सुनायी दे रही थी । ऋचा ने बड़ी मुश्किल से आंखें खोली । पूरे शरीर में दर्द हो रहा था ।हाथ और पैर में चोट थी। सामने डॉक्टर नर्स सभी थे ।
                          " ऋचा ... तुम गाड़ी से क्यों और कब निकल गयी थी ? बीच सड़क में खड़ी होकर क्या सोच रही थी ? मैं तो दस मिनट में ही साइकेट्रिस्ट से तुम्हारे लिए अपॉइंटमेंट लेकर आ गया था । "
                              " तुम गाड़ी से क्यों निकली । मैं तो बीच सड़क में भीड़ देखते ही दौड़ पड़ा । अगर तुम्हें कुछ हो जाता तो ?? " निहार का चिल्लाना सुनकर ऋचा फिर से अतीत में खो गयी । अब उसे कोई दर्द नहीं हो रहा था ।कोई अकेलापन नहीं था । सिर्फ थी गुफ्तगू ।
 

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