सुरेंद्र भसीन की चार कविताएं

सुरेन्द्र भसीन 

पेशे से एकाउंटेंट, कई निजी  कंपनियों में काम किया।

पता

के 1/19A, न्यू पालम  विहार,

गुड़गांंव, हरियाणा

मो-9899034323    

मेरी बेटी /सबकी बेटी

मैं 
जब भी 
अपनी बीवी की आँखों में देखता हूँ 
उसमें मेरी बेटी का चेहरा नजर आता है। 
जो बड़ी होकर 
अपने पति को 
जैसे बड़ी उम्मीद से याचक होकर निहार रही है 
तो मैं बिगड़ नहीं पाता हूँ 
वहीं ढीला पड़ जाता हूँ। 
क्रोध नहीं कर पाता 
उबलता दूध जैसे छाछ हो जाता है.
हाथ-पांव शरीर और दिल 
अवश होकर जकड़ में आ जाता है 
और आये दिन अख़बारों में पढ़े 
अच्छे-बुरे समाचारों की सुर्खियाँ 
याद आ-आकर मुझे दहलाने लगती हैँ। 
और मेरी पाशविक जिदें, नीच चाहतें 
बहुत घिनौनी और बौनी होकर 
मेरा मुँह  चिढ़ाने लगती है। 

कोई भला ऐसे में कैसे 
अपने परिवार को भूल
अपनी बेटी के भावी सुखों को नजरअंदाज कर 
अपना सुख चाहता है ?
वह ऐसा बबूल कैसे बो सकता है 
जिसे काटने की सोचते ही 
उसका कलेजा मुँह  को आता है?


तभी जब मैं 
कुछ कहने को होता हूँ 
तो मेरी बीवी की आँखों में 
मुझे हरेक की 
बेटी का चेहरा नजर आता है।

भय के पार

वो काली छाया, 
जिनके भय से, 
मैं आँखें भी बंद नहीं कर पाता हूँ, कई-कई रात। 
अब आँखों के काले घेरे बन- बनकर 
मेरे चेहरे पर ही छाने लगी हैं,
और उनके भय से मैं कितनी रात सोया नहीं हूँ ,
दुनिया को सरे आम ये बताने लगी हैं। 

ये भयानक बेरूप उड़ती छायाएं, 
अब मेरे लिये दुःस्वप्न नहीं रहीं, 
सच बन भटकती हैं मेरे इर्द-गिर्द और कभी, 
बेखौफ इशारों से मुझे अपनी ओर बुलाती हैं, और 
कभी मुझे स्तंभित करते हुये,
मेरे में से होकर दूसरे पार निकल जाती हैं 
मुझमें अपने जैसा होने का विश्वास फैलाती हैं। 
लगता है, वे मुझसे पहले 
मेरे हौसले पस्त करेंगी फिर 
मेरे दिमाग को ध्वस्त करेंगी,
फिर बचा-खुचा तो ढह जायेगा 
अपने-आप ही भारी-बोझिल  होकर 
वजूद मेरा। 
और क्या मै देखता रहूँगा, 
ये सब कुछ अपने में, अपने आप होकर,
अपने साथ बीतते हुये। 
क्या न करूँगा विरोध ,उपाय इसका।  
नहीं उतारूँगा अपने भीतर 
रोशनी और विश्वास के भीमकाय बगौले। 
जो इनको देखते ही 
उनपर जा पड़ें, उन्हें जला दें। 
जो मेरे चेहरे की मुर्दनी हटा दें और 
मुझे एक भयमुक्त चैन की नींद दिला दें।  

मेरा भाग्य

मैं  पूछता हूँ 
मेरे किये परोपकार 
क्या कभी मेरे काम न आयेंगे ?
और मेरे दिन 
बेरोजगारी और मुफलिसी में 
क्या ऐसे ही गुज़र जायेंगे ?
इस खारे समुद्र में 
यूं हीं बिना किन्हीं साधनों के 
नाव ठेलते -ठेलते 
बिना चप्पू, बिना पतवार 
हवा और लहरों की मार झेलते-झेलते ?
मेरे कर्मों की फेहरिस्त में 
क्या गुनाह ही गुनाह बचे हैं बाकी 
जो मेरे दिन 
ऐसी अंधेरी खोह में 
बीतते जायेंगे ?
कब होगी सुबह ?
कब फूटेगी ?
आशा-परिवर्तन की किरण। 
कब बहुरेंगे (फिरेंगे) मेरे दुर्दिन ?
या जीना है मुझे 
अब बस 
टूटने की कगार तक 
किसी हादसे के इन्तजार में।  

नियति

सदियों से
वह पहाड़ था
तो अड़ के खड़ा था
राह रोकने की अपनी जिद लेकर...
उसमें छेद कर, बारूद भरके उड़ा दिया
उसके बारीक़ टुकडों में तारकोल मिलाकर
सड़क बना दिया...
उसको!
रास्ता बना
राहों में बिछा दिया!

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1 Response

  1. पंकज says:

    शानदार

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