सुषमा सिन्हा की कहानी ‘रिश्ता’

सुषमा सिन्हा

शिक्षा : बीए ऑनर्स (अर्थशास्त्र), फाइल आर्ट में डिप्लोमा

छात्र जीवन से ही चित्रकला और लेखन में रुचि

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। आकाशवाणी और दूरदर्शन पर कई बार रचनाओं का पाठ। चित्रकला के लिए कई बार पुरस्कृत।

कृतियां :  मिट्टी का घर (कविता संग्रह), बहुत दिनों के बाद  (कविता संग्रह)

संप्रति : झारखंड वित्त सेवा में अधिकारी

संपर्क : द्वारा श्री के के सिन्हा, फ्लैट नंबर 1ए, ब्लॉक नंबर एफ, अरगोड़ा चौक, रांची-834002

रात के 10:30 बज रहे थे। समिता सोने की तैयारी कर रही थी कि फोन की घंटी घनघना उठी। इतनी रात गए कौन हो सकता है? थोड़ी घबराहट के साथ उसने लपक कर फोन उठाया- 
'हेलो.. हेलो.. मैं मिसेज गुप्ता बोल रही हूँ राँची से।' आवाज पुरानी थी और बहुत सालों के बाद सुन रही थी।
'हेलो मैम कैसी हैं?' पहचानते हुए समिता ने पूछा। 
'मैं ठीक हूँ पर इनकी तबीयत बहुत खराब है। चार-पाँच दिनों से हॉस्पिटल में हैं....।' 
'क्या हुआ सर को?' वह घबरा गई। 
'हार्ट अटैक आया था घर पर ही। फिर यहाँ हॉस्पिटल में दुबारा आ गया।' थोड़ा रुक कर उन्होंने कहा- 'तुम्हें बहुत याद कर रहे हैं इसलिए मैंने फोन किया।' 
'कैसे ऐसे हो गया सर को...?' समिता चिंतित हुई।
'पता नहीं ऐसा कैसे हो गया। वो तो ठीक ही थे... शुगर भी कंट्रोल में था... लेकिन......" मिसेज गुप्ता बता ही रही थीं कि उन्हें बीच में रोकते हुए ही समिता ने पूछा- बातें कर पा रहे हैं? मुझसे बात कराएँगीं?'
'नहीं, अभी वह सो रहे हैं। अगर तुम आ पाती तो  अच्छा होता।' 
'ठीक है, देखती हूँ......।' समिता ने कहा ही था कि फोन कट गया। उसने हॉस्पिटल के माहौल के बारे में सोचकर दुबारा फोन नहीं किया और राँची जाने का प्लान करने लगी। बेंगलुरु से राँची पहुँचना समिता के लिए आसान नहीं था। पर वह जल्दी से जल्दी अपने सर के पास पहुँचना चाहती थी। नींद उसकी आंखों से दूर कहीं चली गई थी। वह लगातार सोच रही थी... ऑफिस से छुट्टी लेने में भी मुश्किल होगी और दीपक को कन्विन्स करना भी आसान नहीं होगा... अचानक राँची?.. इतनी दूर अकेली?.. और वह भी कॉलेज के जमाने के किसी शिक्षक की तबीयत खराब होने के कारण?.. क्या मतलब? दीपक के ऐसे ढेर सारे प्रश्नों से परे उसने मन ही मन इतना तो निश्चित कर ही लिया कि चाहे जैसे भी हो उसे राँची जाना ही है। जहाँ चाह वहाँ राह में विश्वास करने वाली समिता दो दिनों में सब कुछ व्यवस्थित कर राँची के लिए रवाना हो गई। एयरोड्रोम से सीधे हॉस्पिटल पहुँची। 'सर' समिता के सर बोलने का मतलब पूरी दुनिया में बस इसी सर से होता था। बाकी सभी सर के लिए वह हमेशा उनके सरनेम का उपयोग करती थी। जैसे- चौधरी सर, श्रीवास्तव सर इत्यादि इत्यादि।
हॉस्पिटल पहुँचते ही सर के कमरे के बाहर उनके एकलौते बेटे से सामना हुआ जो अब किसी मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत है। ऐसी बात नहीं कि समिता उससे पहली बार मिल रही हो। हाँ, बहुत दिन गुजर गये पर आज वह समिता को बड़ी अजीब नजरों से घूर रहा था। समिता पर इसका कोई असर नहीं पड़ा और वह हड़बड़ाई हुई सी सीधे सर के कमरे में घुसी। वहाँ सर की पत्नी उसके पास ही बैठी थी जो उन्हें पहले ही समिता के आने की ख़बर दे चुकी थी। इधर दो-तीन दिनों में सर को थोड़ा आराम भी हो गया था। वह समिता को देखते ही हल्के-से मुस्कुरा पड़े। समिता की आँखों में आँसू आ गए। उसके सर ऐसे तो नहीं थे। इतने लाचार, इतने कमजोर। एक जिंदादिल इंसान बात-बात पर ठहाके लगाने वाले उसके सर, हमेशा उसका स्वागत पूरी गर्मजोशी से किया करते थे। 
'अरे..अरे, रो क्यों रही हो? मैं तो अब ठीक हो रहा हूँ। आओ बैठो, कैसी हो? बीमार होने पर तुम मुझे पता नहीं क्यों बहुत याद आई...।' उन्होंने अपनी पत्नी की ओर इशारा करते हुए कहा- 'रीना ने बताया... कि बेहोशी की हालत में... मैं तुम्हारा नाम ले रहा था.., तुम्हें आवाज़ दे रहा था.. इसलिए इसने तुम्हें फोन कर दिया...।'  'अफ़सोस.... कि तुम्हें इतनी दूर से आना पड़ा.... पर आ गई तो.. अच्छा ही किया।' वे रुक-रुक कर बोले जा रहे थे जबकि उनकी पत्नी ने दो बार टोका उन्हें कि डॉक्टर ने ज्यादा बोलने से मना किया है। ऐसा लग रहा था जैसे बहुत दिनों से बहुत सी बातें रुकी हुई थीं जो जल्दी से जल्दी निकल जाना चाहती थीं। समिता की आंखों में आँसू भर-भर आ रहे थे। थोड़ी देर में खुद को संयत कर उसने सामान्य हाल-समाचार की जानकारी ली। थोड़ी-बहुत इधर उधर की बातें कीं। कल फिर आने का वादा किया और अपने चचेरे भाई, जो राँची में ही रहते थे, के घर चली गई। सर को ठीक-ठाक देख कर उसे थोड़ी तसल्ली भी मिली थी। 
समिता की पढ़ाई-लिखाई राँची में ही हुई थी। तब उसके पापा की नौकरी भी इसी शहर में थी।

स्कूल के बंदिश भरे दिनों से निकलकर कॉलेज के मुक्त वातावरण का पहला दिन था.. जब तीसरी घंटी बजते ही फिजिक्स पढ़ाने के लिए एक शिक्षक आए तो समिता उन्हें देखती ही रह गई। बड़ी बड़ी आंखों पर चश्मा चढ़ाए, साँवले और लंबे व्यक्तित्व के शिक्षक कक्षा में क्या पढ़ा कर गए, उसे कुछ याद नहीं रहा। याद रहा तो बस उस सर का आना, परिचय करना, बोलना, बातें करना और फिर जाना। समिता के मासूम मन में वह कहीं ठहर गए थे। अब वह उनका अता-पता रखने लगी थी। उन्हें छुप छुप कर देखना उसकी दिनचर्या में शामिल हो गया था। उसे पता ही नहीं चला वह कब, किस हद तक उनसे जुड़ती चली गई थी। 
चाहे उसकी कक्षा हो या न हो, वह कॉलेज शुरू होने से काफी पहले कॉलेज गेट पर पहुँच जाती ताकि जब सर कॉलेज आएँ तब वह सबसे पहले गेट पर ही उनको विश कर सकें। उस की यह हरकत उसके सर से छुपी नहीं थी। आखिर वह उसके गुरु थे। अनदेखा करते हुए भी वह उसकी सारी गतिविधियों पर नजर रखते थे। समिता अक्सर उनसे बातें करने का बहाना ढूँढ़ती। कभी बेवजह भी उनसे बातें करने की कोशिश करती। उनके सामने आने की कोशिश करती पर उसके सर उसे कभी यह एहसास नहीं होने देते कि वह उसकी सारी हरकतों से वाकिफ हैं। उससे भी वे हमेशा अन्य छात्र-छात्राओं की तरह सामान्य व्यवहार करते। 
'हमारे सर' कहने पर वह अपनी सहेलियों से लड़ पड़ती। 'नहीं,.... मेरे सर कहो।' उसकी सहेलियाँ भी उसे चिढ़ाया करतीं। 'अच्छा बाबा.. तुम्हारे ही सर।' वे उसका मजाक उड़ातीं, हँसतीं। लेकिन समिता पर उनकी बातों का कोई असर नहीं पड़ता। वह शर्माती, इठलाती और खुश होती हुई कहती- 'हाँ,  सिर्फ मेरे सर।' तब उसकी सबसे अच्छी दोस्त उसके सिर पर ऊँगली रख कर कहती- 'सुनो-सुनो तुम्हारा सर..... चुप रहो और अपना दिमाग ठिकाने पर रखो.. तुम मरवाओगी किसी दिन हम सबको।' समिता चुप लगा जाती क्योंकि वह जानती थी कि सर को वह जिस तरह से पसंद करती है वह उसकी बेवकूफी है। पर वह खुद से लाचार थी। सर अक्सर उसकी बातों, हरकतों को बचपना समझकर ध्यान नहीं देते। हँसते, ठहाके लगाते सर के द्वारा खुद को नजरअंदाज किया जाना उसे बहुत दुःखी करता। पर कुछ दिन उदास रहने के बाद वह खुद ब खुद सँभलती और फिर अपने सर के गुणगान में लग जाती। 
दिन गुजरता रहा अपनी रफ्तार से लेकिन समिता के हाथ एक भी मौका नहीं लगा कि वह अपने दिल की बात अपने सर से कह पाती। जहाँ तक पढ़ने में मन लगाने का सवाल था। वह सर में ही मन लगाती हुई किसी तरह पास मार्क्स लेकर आइ. एससी पास की। मजबूरन उसे बी.ए. में दाखिला लेना पड़ा लेकिन तब भी फिजिक्स वाले सर उसके जेहन में रचे बसे रहे। समिता का बस चलता तो वह पूरी उम्र उसी कॉलेज में पढ़ती रहती ताकि सर का साथ नहीं छूटे। पर समय को तो बदलना ही होता है और वह बदला। 
बी.ए. पास करने के बाद उसे कॉलेज छोड़कर जाना ही पड़ा। शहर की ही यूनिवर्सिटी में उसने एम.ए. में दाखिला लिया। फिर भी वह अक्सर पुराने कॉलेज पहुँच जाती और गेट के पास अपनी पुरानी जगह पर सर का इंतजार करती। कॉलेज से निकलने के बाद उसमें सर से बात करने की थोड़ी हिम्मत भी आने लगी थी और सर भी अब उससे कुछ-कुछ बातें करने लगे थे। उसे देख उसके पास थोड़ा ठहरते और उससे उसका हाल समाचार जरूर पूछते।

एक दिन उन्होंने उससे उसकी पढाई-लिखाई के साथ-साथ पूछा- 'इधर ही कहीं रहती हो क्या?' 
उसने सकुचाते हुए जबाब दिया- 'जी सर !'
तब सर ने कहा- 'मैं भी इसी कॉलोनी में रहता हूँ। उधर पोस्ट ऑफिस वाले रोड का पहला ही क्वार्टर मेरा है। कभी घर आओ, रीना और मेरा बेटा तुमसे मिल कर बहुत खुश होंगे।'
समिता ने धड़कते दिल से खुश होते हुए कहा- 'जी सर, जरूर आऊँगी।' 
समिता ने तो सर का घर पहले से ही देख रखा था। उनका आमंत्रण पा कर रोमांचित महसूस कर रही थी। मस्त-मगन वह घर पहुँची और अभी एक सप्ताह भी नहीं बीता था कि एक शाम वह उनके घर पहुँच गई। सर की पत्नी और उनके 8-10 वर्ष के बेटे से मिल कर उसे बहुत अच्छा लगा। अब अक्सर वह उनके घर जाने लगी। उनकी पत्नी और उनके बेटे से उसकी दोस्ती हो गई। पर सर अब भी उससे बहुत कम ही और काम की ही बातें करते। पर समिता को इस बात का आभास होता  और तसल्ली भी कि कम से कम सर मुझे और मेरी भावनाओं को समझते हैं। सर से मिलने के लिए अब उसका कॉलेज गेट पर जाना बंद हो गया था। समय के साथ वह सर की हर एक बात जानने लगी। उनकी पसंद-नापसंद, शौक, इच्छाएँ इत्यादि। साथ ही समिता का बचपना भी खत्म हो चुका था और एक बहुत ही समझदार समिता सामने आने लगी थी। पर उसके सर अब भी उसके लिये आकर्षण का केंद्र बिंदू थे। तथापि एक जबरदस्त बदलाव उसमें जरूर आया था कि अब वह सर से अपने दिल की बात कहने का विचार छोड़ चुकी थी। सर उसके लिए अब बेहद आदरणीय बनते गये थे।

पढ़ाई खत्म होते ही समिता की शादी उसके माता-पिता की पसंद के लड़के दीपक से हो गई और वह उसके साथ कोलकाता चली गई। लेकिन जब भी वह अपने मायके आती सर के घर जरुर जाती। सर और उनकी पत्नी को भी समिता का आना-जाना अच्छा लगता और वे उसे उसके घर के नाम 'सुमि' कह कर बुलाते और मायके आने पर उसे उसके पति के साथ साग्रह अपने घर पर बुलाते। उनके घर पर उसका आना जाना स्वाभाविक-सा था। समय के साथ दो बच्चों की माँ बनी समिता काफी मैच्योर हो गई पर उसके दिल दिमाग से सर नहीं निकले जबकि उम्र निकल गई। सामाजिक रिश्ते तो निभते ही रहे हैं सो निभते रहे। पर मन के रिश्ते को बाँधना बहुत मुश्किल था। भूलना और उससे निकल पाना तो और भी ज्यादा मुश्किल। समिता खामोशी से अपने साथ अपनी चाहत भरे रिश्ते को समेटती, समझती रही और उसी संबल पर दुनिया के सारे रिश्ते निभाती रही।
चार-पाँच वर्षों में जब उसके पति का ट्रांसफर बंगलुरु हो गया तो उसे मायके से दूर होने से ज्यादा सर से दूर होने का दुख हुआ था। पर समय को किसी के दु:ख-सुख से क्या लेना देना।  देखते ही देखते वह बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में व्यस्त हो गई। साथ ही उसके माता-पिता भी पटना शिफ्ट कर गए तो उसके राँची आने-जाने का आधार भी ख़त्म हो गया। पिछले कई वर्षों से वह सर से नहीं मिली थी। शुरू शुरू में अक्सर फ़ोन से हाल-समाचार लेना-देना हो जाता था पर धीरे-धीरे समय के साथ सामाजिक सीमाओं एवं पारिवारिक व्यस्तताओं के बीच वह भी कम होता गया। पर सच तो यही था कि सर हमेशा उसके दिल में रहते थे और दिल की गहराइयों में झाँक पाना किसी के लिए भी आसान नहीं था। पूरी उम्र वह मन ही मन सर का आदर करती रही और अपने पहले प्यार की तरह याद करती रही। नादान थी तो उन्हें बताना चाहा। समझ आई तो खामोश हो गई। पर मन की गहराइयों में सर के लिए वे कोमल भावनाएँ ज्यों के त्यों बनी रहीं।  
आज इतने वर्षों बाद सर से मिली भी तो उन्हें इस तरह हॉस्पिटल में पड़ा हुआ देख कर उसका कलेजा फटा जा रहा था। उसके सर बीमार हैं और वह उसे याद कर रहे हैं....... उसके लिए इतना ही काफी था। वह भाग कर आ गई अपने सर के पास, बिना किसी को ज्यादा कुछ बताये और यहाँ लगातार भगवान से उनके लिए प्रार्थनाएँ कर रही थी कि वे जल्दी से जल्दी स्वस्थ हो जाएँ। वह उन्हें पहले की तरह हँसता, मुस्कुराता, खुश और ठहाके लगाते हुए देखना चाहती थी। दूसरे दिन शाम में हॉस्पिटल पहुँची तो मिसेज गुप्ता बाहर ही मिल गईं। उन्होंने कहा- 'बहुत देर कर दी आने में ?' 
'सर तो ठीक है न??' समिता ने घबराकर पूछा।  
'हाँ, हाँ वो अब ठीक हैं।' उन्होंने कहा तो समिता निश्चिंत होकर बताने लगी- 'सुबह से बारिश हो रही थी और फिर मैंने सोचा, सर को आराम की भी जरूरत है...इसलिए..।' बातें करते करते वे सर के कमरे की ओर बढ़ने लगीं। समिता को देखते ही सर के चेहरे पर मुस्कान फैल गई। उन्होंने उसे अपने बेड के बगल वाली कुर्सी पर बैठने का इशारा किया तो वह उस कुर्सी को उनके पैरों के पास खिसका कर चुपचाप बैठ गई और उनकी तबीयत का अंदाज लगाती हुई उनकी ओर ध्यान से देखने लगी। तभी मिसेज गुप्ता ने उससे कहा-  'समिता, मैं थोड़ी देर में नीचे से आती हूँ। तुम कुछ देर तो ठहरोगी न ??'  
'हाँ, हाँ।' समिता ने कहा तो मिसेज गुप्ता ने अपना पर्स उठाया और सर की तरफ देखकर बोलीं- 'मैं आती हूँ।' और वह निकल गईं। समिता सर को अपलक देख 25 वर्ष पुराने अपने सर को याद कर रही थी जो आज यूँ बेड पर पड़े हैं। उनकी स्थिति देख कर अंदर ही अंदर छटपटा रही थी पर अपनी स्थिति को छुपाती हुई पूछी- 'कैसे हैं.. सर??'
'अच्छा हूँ... अच्छा हो रहा हूँ...। तुम बताओ कैसी हो?' उन्होंने पूछा। फिर पति, बच्चे और घर के सभी लोगों के बारे में भी पूछा। 
'अच्छी हूँ सर ...और सब कुछ ठीक चल रहा है... बस आप जल्दी से अच्छे हो जाइए।' उसने सभी सामान्य हाल-समाचार बताते हुए कहा और फिर चुप हो गई। तब सर ने कहा- 
'तुम बिलकुल भी नहीं बदली सुमि.... अभी भी वही फर्स्ट ईयर वाली समिता की तरह चुपचाप स्थितियों-परिस्थितियों को वॉच करती हुई...।' सर मुस्कुरा रहे थे। 
'सर....' समिता अवाक उनकी ओर देखने लगी। कॉलेज के दिनों की अपनी हरकतों को याद कर शर्मिंदा हो उठी- 'सर....आपको.....।' वह अपनी नादानियों के लिए उनसे माफी माँगना चाहती थी पर सर ने उसे चुप रहने का इशारा किया और फिर कहने लगे- 'क्या लगता रहा तुम्हें सुमि.., कि मैंने तुम पर ध्यान नहीं दिया...?' फिर धीरे-धीरे वह सब बातें समिता को बताने लगे जिन सबके बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं था कि सर को पता होगा। वे रुक-रुक कर बोल रहे थे- 'तुम हमेशा से मेरे लिए ख़ास रही हो, आज भी हो... पर रिश्ते तो निभाने होते है ना सुमि.... तुम्हारा हमारा रिश्ता तो छात्र और शिक्षक का था न.., इसे तो किसी भी हाल में निभाना ही था। कैसे भूल जाता इस रिश्ते को.. मैं शिक्षक था तुम्हारा... मेरा कर्तव्य था बच्चों को सँभालना.... और उन्हें अच्छे संस्कार देना।'  सर की बातें सुन समिता की आँखों में आँसू आ गए।  वह बोलते-बोलते थोड़े चुप हुए। लेकिन थोड़ी ही देर में फिर बोल पड़े- 'पर....उम्र के इस मोड़ पर, अब जबकि मैं इस दुनिया से कूच कर जाने वाला हूँ। पता नहीं कैसे... बेहोशी की हालत में तुम्हारा नाम ले लिया... अफ़सोस.... ?? फिर बोले- 'पर यह भी सच है कि मैं तुमसे मिलना चाहता था... तुम्हें देखना भी चाहता था...  बहुत दिन हो गए थे तुम्हें देखे हुए... इतने दिन तो कभी नहीं हुए थे न सुमि...।' 
सर की बातें सुन समिता रोने लगी थी- 'सर... मुझे माफ कर दीजिए प्लीज, नादानी में मैंने आपको बहुत परेशान किया। पर सच तो यह है सर... कि आप कभी भी मुझसे दूर नहीं रहे। जैसे-जैसे मुझ में समझ आती गई मेरे मन में आपके लिए आदर और बढ़ता ही गया। जीने का तरीका और रिश्तों को निभाना आपसे ही सीखा सर। मैं सारी उम्र आपको भूल नहीं पाई।'  समिता को आज यह कहने में थोड़ी सी भी हिचक नहीं हुई। सर की आँखों में भी आँसू छलक आए। उन्होंने कहा- 'प्यार का मतलब पाना नहीं होता है सुमि... अपना कर्त्तव्य निभाना होता है। मैंने भी निभाने की कोशिश की। मुझे मालूम है... मैंने कई बार तुम्हें बहुत दु:ख पहुँचाया है.... मुझे माफ कर देना प्लीज।' 
'नहीं सर...  ऐसा मत कहिए प्लीज...।' समिता ने कहा ही था तभी मिसेज गुप्ता आ गईं तो बातें औपचारिक हो गईं। अगले दिन सुबह ही बेंगलुरु के लिए ट्रेन थी। सर से जल्दी स्वस्थ होने और घर पहुँचकर फोन करने का वादा लेकर वह उनके कमरे से निकली फिर तुरंत वापस आकर आदर से उनके पाँव छू ली। सर चुपचाप उसे जाते देखते रहे। समिता हॉस्पिटल से बाहर तो आ गयी पर वह अपने आप में नहीं थी। उसका दिल दिमाग कुछ काम नहीं कर रहा था। वह घंटों बेचैन सी अपनी पुराने शहर के रास्तों पर टैक्सी में बैठी घूमती रही।  अपने कॉलेज की तरफ गई। सर के घर की ओर गई। अपने पुराने घर की ओर गई जबकि उसे पता था कि अब वहाँ उसका क्वार्टर नहीं रहा। वहाँ ऊँचे-ऊँचे फ्लैट्स बन गए हैं जहाँ कभी एक कॉलोनी हुआ करती थी। जहाँ एक मासूम-सी लड़की अपने सर को आँखों में बसाए घूमती थी। एक ऐसी लड़की जिसे अपने हमउम्र किसी लड़के से कभी दोस्ती नहीं हुई।  
बंगलुरु पहुँचकर समिता ने सबसे पहले अपने सर से बात करने के लिए कई बार फोन लगाया पर बार-बार रिंग होने के बाद भी किसी ने रिसीव नहीं किया।  दिन भर वह परेशान रही। रात में भी ठीक से सो नहीं पाई। दूसरे ही दिन उसके पास उसकी दोस्त निम्मी का फोन आया- 'एक बुरी खबर है सुमि...., तुम्हारे सर नहीं रहे...।'  
'क्या ?...कब..??' जोर से उसकी रुलाई निकल गई। निम्मी कह रही थी- 'कल ही हुआ है, तभी तो आज के अखबार में आया है....।'
समिता यह सोचकर तड़प उठी कि उसके सर अब इस दुनिया में नहीं हैं.... सर चले गए...। उसे इस बात का भी बहुत दुख हो रहा था कि इतनी बड़ी बात हो गई और सर के घर से उनकी पत्नी, बेटा या किसी ने भी उसे फोन तक नहीं किया। उसे आश्चर्य भी हो रहा था कि सर के कारण जिन्हें वह हमेशा अपना समझती रही, उनके जाते ही वे इतने पराए हो गए कि उनकी मृत्यु की खबर भी देने की जरूरत नहीं समझ रहे। कई-कई दिनों तक वह उन लोगों से बातें करने के लिए छटपटाती रही, फोन लगाती रही और निराश हो-हो कर यह उम्मीद करती रही कि शायद कभी उधर से फोन आए। पर दिन महीनों में बदल गए और उसकी उम्मीद भी नाउम्मीदी में बदलती गई। आख़िरकार उसे किसी ने फोन नहीं किया। समिता यह अच्छे से समझ गई कि भले ही सर के जाते ही उनके रिश्तेदारों के लिए उनसे संबंधित सारे रिश्ते खत्म हो गए हों पर उसके सर जो उम्र भर रिश्तों को समझते रहे, समझाते रहे, सहेजते रहे, निभाते रहे, उनसे समिता का रिश्ता कभी खत्म नहीं हो सकता। वह उसके सर थे..., हैं.... और हमेशा रहेंगे....।।

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2 Responses

  1. om sapra says:

    ATI SUNDER AUR SASAKT KAHANI PAD KAR MAN EK SUM BHAVUK HO GAYA–
    SIR CHAHE NAHI RAHE- UNKA RISHTA AMAR HAI- MATA -PITA- AUR GURU (SIR) ESE SAMANDH HAIN
    JO DUNIYA KE STAR PAR TO HOTE HI HAIN- APITU SPRITUAL LEVEL PAR SWA-ANUBHUT HOTE HAIN-
    SAMVEDNA SE PARIPOORN KAHANI HETU SAADHUVAAD-
    SHUBHKAMNAYEN-
    ——————————————–
    -OM SAPRA
    SAHITYA SACHIV,
    MITRA SANGAM PATRIKA
    N-22, DR. MUKHERJEE NAGAR,
    DELHI-110009
    M- 981818 0932

  2. Pooja singh says:

    Very nice story… Congratulations…

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