सेवा सदन प्रसाद की तीन लघुकथाएं

सेवा सदन प्रसाद

एक हिंदी लेखक

मोबाइल की घंटी बजी ।ऑन करने पे आवाज आई -- "हेलो,  सुधीर जी नमस्कार ।"
" नमस्कार भाई साहब ।"
" सुधीर जी, आपकी कहानी बहुत अच्छी लगी 
"कैसी कहानी  ? " सुधीर जी ने थोड़ा आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा ।
" अरे वही ' त्रासदी ' कहानी जो इस माह के मैगजीन में छपी है ।"

सुधीर जी को तो पता भी नहीं फिर भी अपने सम्मान की सुरक्षा हेतु बोल पड़े -- " हाँ, अभी देखी नहीं है ।"
" बस आपको मुबारकबाद देने के लिए फोन किया ।"
फोन कटते ही सुधीर जी दौड़ पड़े बुक स्टाल की ओर ।पत्रिका को उल्ट पुलट कर देखा ।कहानी तो छपी थी पर जेब में इतने पैसे नहीं थे कि पत्रिका खरीद सके ।बस वापस लौट पड़े ।
फिर लेखकीय प्रति के लिए पोस्ट आॅफिस का चक्कर ।जब एक सप्ताह तक पत्रिका नहीं मिली तो संपादक महोदय को फोन किया ।संपादक महोदय ने बिंदास उत्तर दिया -- " हमारे यहां जिनकी भी रचना छपती है, हम प्रति भेज देते हैं ।शायद डाक में गुम हो गईं होगी ।आप लेखक हैं इसीलिए दूसरी प्रति आधे दाम में मिल जायेगी।
सुधीर जी बुत बन गये ।

 

 डर 


         विधवा मां की मौत के बाद शालिनी ने एक अहम फैसला लिया कि वह अपनी छोटी बहन को अकेली नहीं छोड़ सकती ।उसे साथ रखने से उसकी चिंता भी खत्म हो जायेगी और मोहिनी अपने आप को अकेला भी महसूस नहीं करेगी ।पति की सहमति ने उसे बल प्रदान किया ।मोहिनी दीदी के इस निर्णय से अपने सारे गम भूल गई ।सोची - जीजा जी और दीदी का सहयोग रहा तो अपना भविष्य संवार लेगी ।महानगरी में आये दिन हादसों की वजह से उसके अंदर एक पैदा हो गया था और अपने आप को असुरक्षित महसूस करने लगी थी ।ऐसे में दीदी का संरक्षण एक ताकत बन उसके डर को दूर करने दिया ।वह बहुत खुश रहने लगी और जीजा एवं दीदी का भरपूर ख्याल रखने लगी ।
          अचानक पेट दर्द की वजह से शालिनी को नर्सिंग होम में भर्ती होना पड़ा ।थोड़ी देर के बाद दीदी की कुशलता की खबर सुनी तो आश्वस्त होकर सो गई ।पता नहीं जीजाजी नर्सिंग होम से कब लौंटे ।आखिर उन्हें अपनी पत्नी की स्वास्थ्य की चिंता जो है ।वैसे उनके पास डुप्लीकेट चाबी भी है या सुबह नर्सिंग होम जाकर जीजू को घर भेज देगी ।
       आधी रात में  किसी का स्पर्श पाकर मोहिनी जाग पड़ी ।सामने जीजू को देखकर चौंक पड़ी ।जो ' डर ' अब तक मर चुका था वह पुनः जीवित हो गया ।नफरत भरे क्रोध ने जीजा के चेहरे को नाखूनों से लहुलुहान कर दिया ।अब सिर्फ अपने घर में ही नहीं बल्कि पूरी दुनियां के डर से  लड़ने के लिए तैयार हो गईं ।प्रातः उसके कदम बढ़ चले -- गर्ल्स हाॅस्टल की तरफ ।

 हौसला


     ट्रेन जब देहरादून पहुंची तब रात के बारह बज चुके थे ।सविता ने तय कर लिया कि स्टेशन पर ही रात गुजार लेगी ।अतीत जो उभर आया ।इंटरव्यू के लिए दिल्ली गई थी तब भी रात के बारह ही बजे थे ।कोई सवारी नहीं मिला ।होटल करीब ही था,  अतः पैदल ही चल पड़ी ।अचानक सिलसिलेवार घटनाएं घट गई ।पहले छेड़छाड़ फिर अपहरण और अंततः बलात्कार ।जंगल की आग की तरह खबर पूरे हिन्दुस्तान में फैल गई और मीडिया वाले उस आग को हवा देते रहे ।किसी तरह छुटकारा पाकर सविता लौट पड़ी कानपुर ।
        पर यह क्या  ? सब ' अछूत ' की तरह व्यवहार करने लगे ।सांत्वना के बदले मिला सिर्फ - नफरत ।आखिर उसका कसूर क्या है? तब हिम्मत टूट गई ।मौत को गले लगाना सहज लगा ।तभी मीना की याद आई ।मोबाइल पे आंसू बहाकर थोड़ा जी हल्का कर लेना चाही , पर मीना के शपथ भरे वाक्य सुनाई पड़े  -- " तुझे कसम है मेरी  - - चली आ मेरे पास देहरादून  - - मैं सब संभाल लूंगी ।"
सहेली का आश्वासन ऐसा हौसला बना कि जीने की तमन्ना बुलंद हो गईं ।

 

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