सेवा सदन प्रसाद की लघुकथा ‘चैट’

सेवा सदन प्रसाद

— हेलो , सलमा कैसी हो  ?
— बस ठीक हूं यार – – जरा क्रिकेट का बुखार चढ़ा है ।
— इधर भी वही हाल है – –  मैं तो सचिन के बैटिंग की दीवानी थी पर अब विराट भी अच्छा लगने लगा है ।
— मुझे वसीम अकरम की बाॅलिंग पंसद है और अफरीदी तो सदा फेवरिट रहा – – अभी तो ऐसा कोई दीखता नहीं ।
— अरे तेरा धोनी तो सबको धो डालता है ।
— अरे धोनी के सर पे सवा सौ करोड़ के जीत का जुनून सवार हो जाता है इसीलिए वह सबको धो डालता है वर्ना लोग उसे ही धो डालेंगे ।
— मेरे यहां भी यही हाल है – – जीत का जुनून खेल के मैदान को जंग का मैदान बना देता है ।दोनों तरफ की आवाम एक जैसी ही है ।
—– हां सब पे जीत का ही जुनून सवार हो जाता है – – हारना किसी को मंजूर नहीं – – खेल की भावना तो मैदान से बाहर किसी कोने में दुबक कर रह जाती है ।
– – तुम ठीक कह रही हो सलोनी – – खिलाड़ी किसी भी देश का हो– चाहे हिन्दुस्तान या पाकिस्तान का — मैदान में तो खिलाड़ी के खेल की कद्र होना चाहिए ।
—  मैं भी तुम्हारी बात से पूरी तरह सहमत हूं —— फिर तुम्हारे यहां एयर पोर्ट पे अंडे एवं सड़े टमाटर फेंकना और हमारे यहां फतवा जारी करना,  टी, वी तोड़ना ।यह सब क्यों होता है ।
— कुछ राजनीति के खिलाड़ी क्रिकेट के मैदान को जंग का मैदान बना देते हैं और हौसला अफजाई के बदले चुनौतियाँ देते हैं ।
–‘- मेरे पास एक आइडिया है  ।
— सलमा बताओ कैसा आइडिया है?
— यार ! मैं अंपायर बनना चाहती हूं – – लड़कियाँ हर क्षेत्र में पहुंच चुकी है तो यहां भी पहुंचना चाहिए ।
—- तेरे अंपायर बनने से क्या होगा  ?
— अरे!  मैं ट्रिक से बराबरी के रन पे मैच फिनिश करवा दूंगी ।न किसी की जीत  ,न किसी की हार ।
और दोनों देशों के  फिजाओं में हंसी एवं ठहाके गूंजने लगे ।

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