हाफ गर्लफ्रेंड

संजय स्वतंत्र

हर शनिवार

द लास्ट कोच : किस्त 9

राजीव चौक से वह मेरे साथ ही आखिरी डिब्बे में सवार हुई है। वह जिस तरह बार-बार अपने चेहरे को पोंछ रही है, उससे लगता है कि वह काफी दूर से और कई काम निपटा कर आई है। रूमाल से वह अपने होठों को रगड़ कर सुर्ख लाल कर चुकी थी। उसकी डबडबाई आंखें बहुत कुछ कह रही हैं। वह बहुत दुखी है और गुस्से में भी। उसके स्मार्टफोन पर एक नंबर बार-बार चमकता है, जिसे देख कर बेचैन हो उठती है, लेकिन उस कॉल को वह हर बार काट दे रही है। ........ मगर क्यों?
हां, वो किसी की गर्लफ्रेंड ही रही होगी। संयोग से मेरे बगल की सीट उसे मिल गई है। मुझे चेतन भगत के उपन्यास की हॉफ गर्लफ्रेंड की नायिका रिया सोमानी की याद आ रही है, जब वह माधव से नाराज होकर कार से घर लौट रही होती है। वही अबूझ दर्द जो अक्सर जाने-अनजाने हो गए प्रेम में अक्सर मिलता है। मुझे नहीं मालूम इस लड़की का नाम, लेकिन इसे देख कर कह सकता हूं कि यह भीतर से पूरी तरह बिखरी हुई है। एक फितरत है कि जब अंदर से आप बिखरें हों तो बाहर से आप खुद को संवारने की शिद्दत से कोशिश करते हैं। यों वह काली कमीज और नीली जींस में खूब फब रही है।
कभी वह बैग को संभालती है, तो कभी अपनी किताबों को। बार-बार आ रही कॉल से खिन्न तो नहीं हो रही, मगर ऐसा लग रहा कि वह अपने ‘माधव’ से बहुत नाराज है। यानी फिर एक रिया और एक माधव के रिश्तों का टकराव चल रहा है। उसकी कजरारी आंखों से बार-बार आंसू छलक जा रहे हैं, जिन्हें वह अपनी पान-पत्र सी हथेलियों से पोंछ कर यों देखती जैसे कि कुछ हुआ ही न हो। वह मेट्रो के डेस्टिनेशन पैनल पर नजरें गड़ा कर न जाने क्या सोच रही है। उसकी खोई-खोई सी निगाहें उसकी उदासी बयान कर देती हैं। 
हां, वो गर्लफ्रेंड ही रही होगी। .......बार-बार आ रही कॉल से झुंझला कर उसने अब मोबाइल का स्वीच ऑफ कर दिया है। वह आंखें बंद कर सहज होने की कोशिश कर रही है। मगर कितनी सहज है, वह बेहतर जानती होगी। प्रेम भी एक विचित्र मनोभाव है। दिमाग कुछ कहता है, तो दिल कुछ और। ....... आश्चर्य! कुछ पल बाद ही यह लड़की मोबाइल का स्वीच ऑन कर रही है। उसने स्क्रीन को ध्यान से देखा। मुझे यकीन है कि उसका मित्र दर्जन भर कॉल कर चुका होगा। सच में प्रेम में उलझा इनसान वही करता है, जो उसका दिल कहता है। लड़की ने पलट कर कॉल किया है। उधर से धीमी सी आवाज जो मुझे भी सुनाई पड़ रही है- यार...सॉरी, आई एम रियली सॉरी। लड़की का जवाब है- क्या है? इन सब बातों में कुछ नहीं रखा है। बाद में बात करना। नहीं करनी अभी कोई बात। 
पक्की बात है। वह उसकी गर्लफ्रेंड ही रही होगी। ‘माधव’ अपनी दलीलें दिए जा रहा है। लड़की उसकी बातें खामोशी से सुन रही है। उसने तय कर लिया है कि वह कोई जवाब नहीं देगी। दो ही शब्द है उसके थरथराते हुए होठों पर- ‘हां.....हूं।’ बस और कुछ नहीं। एक अजीब सी संवादहीनता है दोनों के बीच। शब्दों का सन्नाटा है। यह लड़की छलछलाती आंखों से जिस तरह नजरें चुरा रही है, उसे मैंने भांप लिया है। अगर मैं इसका परिचित होता और इस वक्त दिलासा देता तो अभी आंसुओं की झड़ी लग जाती। उसने जिस तरह खुद को संभाला हुआ है, उससे लगता नहीं कि उसके मन का बांध टूटेगा। यह तो रिया सोमानी की तरह ही है एकदम जिंदादिल, जो ‘माधव’ से दूर होने के लिए इतनी कठोर हो जाती है कि वह विदेश चली जाती है। 
हां, वो गर्लफ्रेंड ही रही होगी। तभी तो अपने ‘माधव’ की बातें सुने जा रही है। उधर से आवाज है- कुछ तो बोलो। मगर इधर की खामोशी ने इस लड़की के चेहरे को भावहीन बना दिया है। उसके गुलाबी होठों पर शब्द उड़ान नहीं भरते। अब कुछ भी कहना मुश्किल है। ईश्वर ने स्त्री-पुरुष संबंध को इतना जटिल क्यों बनाया है? स्त्रियों में जितना धैर्य होता है, पुरुषों में उसका दसवां हिस्सा भी होता तो यह दुनिया कहीं अधिक खूबसूरत होती। ये बेसब्री ही तो है, जो पुरुषों के भीतर ‘मनुष्य’ तक को मार डालती है। ‘माधव’ को ही लीजिए, वह अपनी सुनाए जा रहा है, लेकिन इस लड़की की खामोशी को नहीं पढ़ रहा। प्रेम का यह ढाई आखर लोग क्यों नहीं पढ़ पाते? 
लड़की ने उसकी बातों से उकता कर एक बार फिर कॉल काट दिया है। वह बैग से कैडबरी चॉकलेट निकाल कर खाना चाहती है। वह पैकेट खोलने से सकुचा रही है। उसे हाथ में लिए कुछ पल सोचती रही। शायद इसे ‘माधव’ ने दिया होगा? आखिर लड़कों से लड़कियां क्या चाहती हैं? लड़के उन्हें खुश करने के लिए क्या-क्या जतन नहीं करते। शॉपिंग मॉल से लेकर मल्टीप्लेक्स तक के चक्कर लगाते हैं। फिर भी लड़के समझ नहीं पाते कि उनकी पसंद क्या है? चॉकलेट बाक्स देख कर वह उछल भी सकती है, तो कभी वह मुंह फेर लेती है। हो सकता है कि महज एक गुलाब पाकर वह खिल उठे। यह भी हो सकता है कि रंग-बिरंगे फूलों का गुलदस्ता भी उसे न भाए। वाकई मुश्किल है समझना इस दिल-ए-नादान को! 
वह गर्लफ्रेंड ही रही होगी। क्योंकि उसने कैडबरी का बाइट ले लिया है। मिठास घुलते ही उसका गुस्सा कम हुआ है और इस बार उसने ही कॉल किया है- कहां मिल रहे हो? ...........उधर से जो जवाब मिला है उसके मुताबिक डोमिनोज में उनका मिलना तय हुआ है। लड़की अब सहज हो गई है। ........सहसा उसने मुझसे पूछा-अशोकनगर कितनी दूर है? दरवाजा किस तरफ खुलेगा? मैंने जवाब दिया-मैं भी वहीं उतरुंगा। लड़की के चेहरे पर अब सुबह की शीतलता है और आंखों में उगते हुए सूरज की चमक। एक छोटी सी नोकझोंक के बाद फिर से मिलने की आतुरता ने उसके चेहरे को गुलाबी कर दिया है। 
......... तो अशोक नगर स्टेशन आने वाला है। मैं अपनी सीट से उठ गया हूं। उसने फिर पूछा- अशोक नगर आ गया? मैने मुस्कुराते हुए कहा- हां आ तो गया है। एक पल की चुप्पी के बाद वह बोली- क्या इस स्टेशन के पास कोई डोमिनोज़ है। इस पर अब मेरा सवाल था- क्या वहां तुम्हें जाना है? उसने झिझकते हुए कहा-जी, वहां किसी से मिलने का टाइम दिया है। क्या आप बता देंगे यह किस तरफ है। मेरा जवाब था- अरे, यह तो स्टेशन के नीचे ही है।
मेट्रो के रुकते ही वह साथ चल पड़ी है। स्टेशन से बाहर निकाल कर सीढ़ियों से उतर रहा हूं। बहुत दिनों बाद मन कर रहा है कि डोमिनोज़ में आज मैं भी कुछ ठंडा पी लेता हूं। यों भी बहुत गर्मी है और गला सूख रहा है। इसी बहाने उस ‘माधव’ को भी देख लूंगा, जिसकी वजह से प्यारी सी यह लड़की रास्ते भर दुखी रही। 
डोमिनोज़ में दाखिल होते ही मुझे सबसे कोने की टेबल के पास बैठा ‘माधव’ दिख गया है। उसने इशारा करते हुए आवाज़ लगाई - ‘सिमरन.......।’ ‘ओह.... तो इस लड़की का नाम सिमरन है।’ काउंटर से मैंने कोल्ड ड्रिंक ले ली है, लेकिन एक भी सीट खाली नहीं जहां मैं बैठ कर गला तर कर पाऊं। तो पास ही कोने में शीतल पेय का लुत्फ ले रहा हूं। ........ न चाहते हुए भी मेरी नजर उस युगल पर जा टिकती है, जो खुद भी ठंडा पीते हुए फिर किसी बात पर उलझ रहा है। कभी-कभी वे गरम भी हो जाते हैं। उफ, बाहर भी गरमी है और अंदर भी। अब किस बात पर विवाद हो रहा है? सच कहूं तो कई बार निरर्थक बहस रिश्तों में दरार डाल देती है। 
अगर यह ‘माधव’ सच्चा मित्र है तो उसे सिमरन के चेहरे पर आंसुओं की लकीरें क्यों नहीं दिखाई देती? क्यों नहीं दिखाई देती उसकी नम कजरारी आंखें? मैं अभी समझ नहीं पा रहा कि अगर माधव दोस्त से बढ़ कर है, तो सिमरन उसकी गर्लफ्रेंड से कम कैसे हो सकती है? रिश्तों का नया शब्द गढ़ रही नई पीढ़ी को हिंदी सिनेमा जो नया फंडा दे रहा है, उसी का नतीजा है, तेजी से रिलेशन का बनना और फिर टूट जाना। इसके बाद भी हॉफ का टैग? उफ! 
सिमरन और माधव के बीच तीखी हो रही बहस के बीच मेरा शीतल पेय ‘खौलने’ लगा है। मुझे अब चलना चाहिए। मैं बाहर निकल रहा हूं। .......तभी सिमरन भी तैश में उठी है। वह बैग और किताबें संभालते हुए मेरे पास आई और तमतमाते हुए पूछा- ‘आप मेरे साथ डोमिनोज़ में क्यों चले आए? उसने कुछ और ही सोच लिया है आपके बारे में।’ उसकी इस अटपटी बात से अचकचा गया हूं। मैं अवाक हूं। खुद को संभालते हुए पूछा-उसे क्या हुआ? उसने रुखा सा जवाब दिया-कुछ नहीं। .....और वह मेरे सामने ही आॅटो में जा बैठी है। हैरत यह कि माधव उसे मनाने के लिए डोमिनोज़ से बाहर तक नहीं निकला। 
मेरी नजरें बंगाली दादा के रिक्शे को तलाश रही हैं। साथ ही उस ऑटो को भी देख रहा हूं, जिसमें एक हॉफ गर्लफ्रेंड जा रही है। हां, वो ‘हॉफ’ ही रही होगी। अगर दोस्त से बढ़ कर होती तो वह महज मित्र भर नहीं होती। वह खास ही होती और खास लोग हमेशा दिल में होते हैं और मौसम की तरह नहीं बदलते। मुझे तो दोनों पर अभी गुस्सा आ रहा है। ...........बंगाली दादा अपना रिक्शा लेकर आ गए हैं। मैंने तुरंत बैठते हुए कहा- ‘दादा अब किसी लड़की को उसकी मंजिल नहीं बताएंगे।’ दादा मेरा मुंह देखने लगे कि ये आदमी कह क्या रहा है। सिर खुजाते हुए उन्होंने पूछा, ‘क्या हुआ?’ मैंने कहा, ‘कुछ नहीं दादा, अब चलो भी। दफ्तर के लिए देरी हो रही है। हम क्या जानें हॉफ गर्लफ्रेंड क्या होती है........?’

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