हाशिेए पर अब और नहीं

महिला दिवस पर विशेष

डाॅ. मृणालिका ओझा

अगस्त सन् 1910 में अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाना तय हो चुका था। महिलाओं को समानता, अधिकार व सम्मान प्राप्त हो सके इसके लिए कोपेन हेगेन में कुछ समाजवादी राष्ट्रों के सम्मेलन में इसे तय किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक रूप से लैंगिग आधार पर होने वाले मतभेदों को समाप्त करना था। 19 मार्च 1911 में जर्मनी स्वीट्जरलैंड, डेनमार्क, आस्ट्रिया जैसे कुछ देशों में इसे पहली बार मनाया गया। 1913 में फरवरी माह के अंतिम रविवार को यह रूस में मनाया गया। 1914 से अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च को प्रतिवर्ष, नये-नये उद्देश्यों के साथ मनाया जाने लगा। इसको अनेक देशों ने अपनाया। 1917 में महिलाओं ने अपनी शक्ति व महत्ता का प्रयोग करते हुए प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के लिए मांग की और उसे ‘‘रोटी व शांति’’ का नाम दिया। सचमुच विश्व को विनाश से बचाने के लिए, महिलाओं का यह सबसे महत्वपूर्ण प्रयास था। तब से आज तक महिलाओं के लिए समानता व सम्मान की लड़ाई पिछले एक सदी से जारी है। कुछ देशों में बहुत हद तक इस उद्देश्य की पूर्ति हो रही है, किंतु भारत अभी तक बहुत पीछे है। ध्यातव्य ये है कि यहाँ हर वर्ष एक (अंतर्राष्ट्रीय) उद्देश्य के साथ महिला दिवस मनाया जाता है। 1998 का वर्ष ‘‘महिला व मानवाधिकार’’ के उद्देश्य से मनाया गया। आज 19 वर्ष बाद भी महिलाओं के साथ लैंगिग आधार पर अनेक समाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक हिंसा जारी है। इन अनेक देशों में भारत का नाम उल्लेखनीय है। 1999 को महिलाओं के खिलाफ ‘‘हिंसा-मुक्त विश्व’’ के रूप में मनाया भी गया, पर ठोस सकारात्मक परिणामों का अब तक अभाव है। महिलाओं के साथ अत्याचार थमा नहीं। फिर ‘‘लैंगिग समानता’’ को आधार बनाते हुए 2003 को, और 2010 को ‘‘समानता के अधिकार’’ के रूप में भी मनाया गया। 2015 को तो महिला सशक्तिकरण के रूप में भी मनाया गया। तब से अब तक नये-नये उद्देश्यों को लेकर आयोजन हो रहे हैं।

आम तौर पर सच ये है कि महिला, माँ हो या पत्नी लगभग 24 घंटे परिवार व समाज के लिए समर्पित होती है। वह एक बिना अवकाश व पगार की अनेक पदों का प्रबंधन सम्हालती हुई कर्मचारी है। विश्व के किसी भी देश, समाज और परिवार के निर्माण में महिलाओं की अहम् भूमिका होती है। यह बेहद सम्मानजनक दायित्व है, जिसे महिलाएँ पूर्णतः समर्पित भाव से निभाती हैं। इस आधार पर ये बात तय हो जाती है कि महिला को समानता या सहानुभूतिपूर्ण अधिकार नहीं, बल्कि सम्मानजनक अधिकार चाहिए। सच ये भी है कि उसके सामाजिक, पारिवारिक अधिकार पुरूष से अधिक स्वयंसिद्ध हो जाते हैं। इसके ठीक विपरीत ये भी हम जानते है कि आदिकाल से अब तक महिलाएँ भेदभाव की शिकार होती आई हैं। पारिवारिक सामाजिक, आर्थिक दृष्टि से भी महिलाएँ यंत्रणाओं की त्रासदी झेलती रही हैं। आदिम या पिछड़े समाजों में यह बात उतनी लागू नहीं होती जितनी तथाकथित सभ्य समाज में। छत्तीसगढ़ में कुछ आदिम जातियाँ तो ऐसी हैं, कि घर में बेटी पैदा न हो तो उसे पाप का परिणाम मानती हैं, और बेटी पैदा होने पर उत्सव भी मनाती हैं। जो लैंगिग आधार पर महिलाओं को प्रताड़ित करते हैं, वे अपेक्षाकृत सभ्य व अभिजात है जो हद से गुजर चुके हैं। उनकी दृष्टि में तो अगर शादी के बाद बच्चे नहीं होते तो महिला दोषी, अगर बेटा नहीं तो महिला दोषी, पति नहीं तो भी महिला ही दोषी, घर मे अनर्थ हुआ तो भी महिला दोषी। धार्मिक, सामाजिक नियम भंग हों तो भी महिला ही ज़िम्मेंदार। आज भी कन्या भ्रूण हत्या होती है। बेटियाँ मारी जाती हैं। दहेज के नाम पर चिताएँ जलती हैं। टोनही और डायन के नाम पर बेहद अमानुषिक सजाएँ दी जाती हैं, यहां तक कि निर्वस्त्र कर घुमाया भी जाता है। अब तो कहीं दया, कहीं सहानुभूति-सहयोग, कहीं ख़ौफ दिखाकर उनकी आबरू से खिलवाड़ किया जा रहा है। इन हरकतों से पुलिस, अधिकारी या नेता कोई भी वर्ग अछूता नहीं रहा है। आदिकाल से अब तक युद्ध के सर्वाधिक दुःखद परिणाम भी महिलाएँ ही झेलती आ रही हैं। वे चाहे सती हों, जौहर हों या उनका हरण हो। समस्यायें अभी तक निर्मूल नहीं हुई।
दूसरी ओर सामाजिक दृष्टि से देखें तो बाल-विवाह और बाल-वैद्यव्य की पीड़ा भी औरतें ही झेलती आई हैं। बच्चा न होने पर सौतन की सजा व दर्द भी औरत ही झेलती है। ‘‘बांझ’’ की गाली भी औरत को ही दी जाती है। वह आदिकाल से बेची, खरीदी और निर्वासित भी की जाती रही है। आश्चर्य ये भी है कि लगभग सभी धर्मों ने अपने ईश्वरीय स्वरूप में महिला-पुरूष समानता को ही महत्व दिया है। उसे रूपांतरित करके, आडंबरों को जोड़ा गया है। स्त्री के अधिकारों का हनन किया गया, उसके वात्सल्य और प्रेम का गलत फायदा उठाकर उसे कमजोर बनाया गया, और बंधुआ मजदूर की तरह उसका उपयोग किया गया। विवाह के लिए जब कन्या तलाशी जाती है, तब उसकी कसौटियां ही देखें-प्राचीन काल में कुल-खानदान के नाम और धार्मिकता के आधार पर, फिर कुछ समय बाद सिलाई-बुनाई, गृहकार्य में दक्षता को आधार माना गया। कालांतर में थोड़ी पढ़ाई-लिखाई और खूबसूरती तलाशी गई। वर्तमान समय में तो हद हो रही है-पढ़ी-लिखी भी हो, कमाई वाली भी हो, घर-परिवार को भी निभाए, खूबसूरत भी हो और गोरी भी। आधुनिक भी हो और धार्मिकता भी निभाये। विदेशी कंपनियों ने उसमें अब गोरापन और जीरों साईज भी तथा फिटनेस-पर्सनाल्टी भी जोड़ रखा है। इसी नाम पर कंपनियां करोड़ों रूपये कमा रही हैं, पर भारतीय नारी के जीवन में समस्याओं को अंबार लग रहा है। आजकल राजनैतिक पकड़ या साख की विशेषता भी ढूँढ़ी जा रही है, यद्यपि इसका प्रचार-प्रसार अभी अधिक नहीं हुआ है। इस प्रकार के वैवाहिक संबंधों में समाज को खुद नहीं पता कि नारी का वास्तविक स्थान कहाँ है ? आज नारी मल्टीपरपज यूज़ की सबसे सस्ती वस्तु बन गई है। बाज़ार और विज्ञापनों ने उसके सम्मान को आर्थिक हथकंडों से कुचला है।
आज महत्व की बात और विमर्श का विषय ये है कि हम अपनी कलम का उपयोग अब महिला के पक्ष में करें। उसे सामाजिक अपमान से निज़ात दिलाने की हर संभव कोशिश करें। अपमानजनक आडंबरों और व्यवहारों का बहिष्कार तो होना ही चाहिए। सड़े-गले पुराने रूग्ण विचारों व परंपराओं से भी नारी को मुक्त कराना चाहिए। वह ससम्मान पुरूष के समतुल्य या उससे अधिक सम्मान व हक की अधिकारिणी है।
प्राचीनकाल से अब तक कन्या भ्रूण हत्या, बेटी की हत्या, और बेटी की माँ का परित्याग व हत्या जारी ही है। आधुनिक युग में पुरूष को भी अधिक समझदार, व ज़िम्मेदार होना चाहिए, परंतु इसके विपरीत वह अधिक अमानुषिक और अश्लील हो रहा है। आज नारी के जीवन से विश्वास और शांति किस तरह तिरोहित हो रहे हैं, ये एक औरत ही जानती है। इस वासना-लोलुप समाज ने नवजात व बच्चियों तक को नहीं छोड़ा। माँ अपनी बच्ची को किसी के भरोसे नहीं छोड़ पाती। स्कूल और कार्यालयों की पवित्रता पर, पड़ोसी पर और रिश्तेदारों पर भी विश्वास डगमगा गया है। स्त्री अपने ही घर में भी आतंक-मुक्त नहीं रह गई है।
अब तो ऐसा लगता है कि नारी जाति के लिए शायद इससे अधिक खतरनाक समय किसी युग में, कभी भी नहीं हुआ होगा। यहाँ नवजात बालिका से लेकर या वयोवृद्ध माँ भी, भयभीत है, असुरक्षित है। समाज या कानून कोई भी उसकी सुरक्षा के लिये बुलंदी के साथ तत्काल खड़ा नहीं होता। अपराधी बच जाते हैं, निर्दोष महिला यंत्रणा झेलती रहती है। पहले पति नाराज होता था तो पत्नी को मायका में छोड़ देता था। बाद में द्विपत्नी की धमकी व तलाक की सजा भी मिलने लगी, परंतु अब तो स्थिति बहुत नृशंस और भयावह होती जा रही है। पति अपनी पत्नी की अश्लील विडियों बनाकर उसे बाजार में खड़ा कर देता है और ब्लेकमेल भी करता है। कवि ‘‘उदय प्रकाश’’ जी की दो पंक्तियां याद आती हैं –

स्त्री नहाने से डर रही थी,
गुसलखाने में कैमरे लगे थे।

बेहतर और आवश्यक युग परिवर्तन के लिए हमें ही सबसे पहले संकल्पित होना होगा। हमें खुद को नारी की पहरेदार बनकर जीना होगा। हर नारी में सबसे पहले ‘‘मनुष्य’’ को देखें बाद में रिश्तों को मढें़। हर नारी की सुरक्षा को ही अपना धर्म मानकर अपनाएँ। ये लड़ाई संगठित और बुलंद होकर महिलाओं को ही लड़नी होगी। हाशिए पर खड़ी नारी को भी मुख्यधारा से जोड़ना होगा। ‘‘सावित्री बाई फुले’’ जो कि प्रथम महिला शिक्षिका र्हुइं, जिसने उसे कठिन युग में भी अछूतोद्धार की लड़ाई लड़ी, अवैध संतान को सामाजिक सम्मान दिलाने का बीड़ा उठाया, उनके आदर्शों को अपनाना चाहिए। समाज की धारणाओं को भी परिवर्तित करना होगा। आज सैकड़ों भारतीय नारियाँ विश्व पटल पर अपनी पहचान बना चुकीं हैं। हमें हर लड़की में विशेषता देखनी होगी। मुझे विश्वास है कि एक दिन दुनियां में औरतें भयमुक्त होंगी पुरूष हमारा साथ देंगे। भारतीय नारियाँ आकाश छूयेंगी। यह सब होगा ही। आईए कृत संकल्प हों, सक्रिय हों वो दिन दूर नहीं क्योंकि हम सभी मानवता, शांति व सम्मान के पक्षधर हैं।

——————–
डाॅ. मृणालिका ओझा
पहाड़ी तालाब के सामने
बंजारी मंदिर के पास,
कुशालपुर, रायपुर (छ.ग.), 492001
मो.नं. – 7415017400

You may also like...

Leave a Reply