हिन्दी साहित्य का बाजारकाल

भरत प्रसाद                                                       

नयी सदी, नया जमीन, नयी आकाश, नया लक्ष्य, नयी उम्मीदें, नयी आकांक्षाएँ। यकीनन मौजूदा सदी ने मनुष्य और उसके जीवन के प्रत्येक पहलू को नयेपन की आँधी में उलट-पलट कर रख दिया है। परम्परागत मूल्य, मान्यताएँ, रिवाज, संस्कार और तौर-तरीके विलुप्त प्रजातियों की नियति प्राप्त करने वाले हैं। आगामी पचास वर्षों के अन्दर करोड़ों वर्ष पुरानी धरती पर ऐसा अभिनव मनुष्य खड़ा होने जा रहा है – जो ‘न भूतो न भविष्यति’ के मुहावरे को चरितार्थ करेगा।

सृजन का जहर है बाजारवाद:

सृजन नैसर्गिक उर्जा है, प्राकृतिक उन्मेष और अलौकिक आग है। जेनुइन सृजन विशुद्धतः नैसर्गिक विस्फोट है। अप्रत्याशित, अज्ञात और अलक्षित रौशनी, जो कब, किस में, किस दर्जे तक प्रकट हो उठे, कह पाना मुश्किल है। नैसर्गिक होते हुए भी सृजन अभ्यास साध्य काबिलियत है – जो परिश्रम, साधना, धुन, लगन और जिद के बल पर असली रूप में सुरक्षित रह पाती है। सृजन अनवरत कांपती हुई लौ के मानिंद होती है। यह ऐसी हठीली आग है, जिसे बिरला ही सुलगा पाता है उसे दहकता गोला बना पाता है। सृजन शक्ति के पोषक तत्व हैं – उद्दाम भावुकता, जमीनीपन, आत्मधिक्कार, सृष्टिधर्मिता और दुस्साहसिक कल्पनाशीलता। इंकार का विवेक है तो सृजन  है, सच से आँख मिलाने का हौसला है – तो सृजन है, यथार्थ की नयी परिभाषा गढ़ने की जिद है तो सृजन है। प्रकृति के बीच पोषित सृजन शक्ति जहाँ सर्वाधिक मौलिक रूप में सक्रिय रहती है, वहीं सांसारिकता का व्यामोह सृजन की नैसर्गिक चेतना को दिशाहीन और कुंद बना देता है। भौतिक ऐश्वर्य का स्थूल आकर्षण, मोहजाल और जादू रचनात्मक व्यक्तित्वों को कुछ इस कदर दिग्भ्रमित करता है कि उस पर भौतिक माया का अखण्ड नशा छा जाता है और कई बार तो रचनाकार इस माया को निरन्तर हासिल करते रहने के लिए ही सृजन को मोहरा बनाता है। बाजार ने मनुष्य को सुख, सुविधा, ऐय्याशी, का कौन सा स्रोत बाकी रखा है ? फ्रिज, कूलर, टी. वी., वाशिंग मशीन, कार, मोबाइल अब घरेलू सुविधाओं की सामान्य श्रेणी में गिने जा रहे हैं। कम्प्यूटर, लैपटाॅप के बिना विद्यर्थियों के दिन सुकून से कटते ही नहीं। यांत्रिक विज्ञान और कम्प्यूटर क्रांति ने जीवन में सुविधाओं का ज्वार ला दिया है। सी. डी. की सुविधा आउटडेटेड है ; अब ‘पेनड्राइव’ की लोकप्रियता पृथ्वी की परिधि माप रही है। हार्डवेयर और साफ्टवेयर की असाधारण तकनीकी ने मानव ज्ञान की गति को विद्युती बना दिया है। मेमोरी कार्ड में हजारों गाने, फिल्में, चित्र, पुस्तकें, पत्रिकाएँ, वीडियो एक ही साथ लिए जा सकते हैं। आज तक के अर्जित ज्ञान को मेमोरीबद्ध करने की क्षमता यांत्रिक विज्ञान ने हमारे हाथों में दे दी है। किन्तु ग़ौर करने लायक पहलू यह है कि अव्वल दर्जे वाली रचनात्मक मेधा कहाँ विलुप्त हो गयी ? क्यों अन्तर्धान हो गयी ? समकालीन हिन्दी साहित्य अपनी किसी भी विधा में कालजयी सर्जक हासिल करने के लिए तड़फड़ा रहा है तो क्यों ? कविता में मुक्तिबोध और नागार्जुन के बाद, पूरे 40 वर्षों के दौरान एक भी सर्वस्वीकार्य अव्वल कवि नहीं ? आलोचना में रामविलास शर्मा और कथा साहित्य में रेणु के  बाद चमकता – रौशन करता एक भी ध्रुव तारा नहीं ?

भौतिक सृष्टि के इतिहास में एक से  बढ़कर एक सृजन के चमत्कार प्रकट हुए हैं और आगे भी अनिवार्यतः होंगे। बाजारवाद तो क्या ? सार्वभौमिक बाजार का युग छा जाय समूचे विश्व में, तब भी सृजन के आश्चर्य साकार होते ही रहेंगे। बाजारवाद ने मनुष्य की भौतिकप्रेमी आकांक्षा में समुद्रवत् उफान ला दिया है – यह ध्रुव सत्य है ; किन्तु इसी निराशा के घटाटोप के बीच कोई इंकारी दूरदर्शिता का अनम्य व्यक्तित्व जरूर तन खड़ा होगा, जो ठीक बाजारवाद के बीच, बाजारवाद के दर खिलाफ होगा, जो भौतिकता की चुम्बकीय माया के चक्रव्यूह में अकेला लड़ेगा, जो प्रलोभनों की भीड़ में निर्लिप्त वैरागी की तरह अकेले कबीरी राग छेड़ेगा, जो युग के प्रत्येक अन्धकार का जवाब अपने रौशन आत्मा की अचूक वाणी से देगा। प्रकाश के पक्ष में घूमती रहने वाली पृथ्वी की अमर रचनामयी क्षमता पर अखण्ड विश्वास न करने का कोई कारण ही नहीं हैं।

मन में न जाने कितने गहरे पैठे हुए इस अनंत विश्वास के बावजूद यह मानने को विवश होना पड़ता है कि बाजारवाद सृजन का जहर है। वह न सिर्फ सृजन की कल्पनाशीलता को भोंथरा कर देता है, न सिर्फ सृजन के उन्मेष को रोक देता है – बल्कि सृजन में विविधता लाने वाली कलात्मकता को भी सोख डालता है। दरअसल बाजारवाद किंकर्तव्यविमूढ़ कर देने वाला ऐसे चित्ताकर्षक महाजाल है – जो मनुष्य को अपने आप से दूर बहुत दूर ले जाता है, जो अपने को पहचानने वाली अन्तर्दृष्टि पर पर्दा डाल देता है, जो स्वीकार्य और अस्वीकार्य का निर्णयात्मक विवेक समाप्त कर डालता है – जो वर्तमान समय में अपना योगदान देने के संकल्प का अपहरण कर लेता है। यह बाजारवाद बौद्धिक, मानसिक, आत्मिक और शारीरिक रूप से मनुष्य को अघोषित गुलाम बनाता है – आजाद, अधिकार सम्पन्न, शक्तिशाली, सम्प्रभु और सर्वशक्तिमान गुलाम। बाजारवादी युग का मनुष्य किसी सत्ता, साम्राज्य या सरकार का भले गुलाम न हो- किन्तु वह ईश्वरनुमा बाजारवाद का घनघोर गुलाम बन चुका होता है। बाजारवाद की यह आकंठ गुलामी उसे मनुष्य के स्तर पर बौना कर डालती है। मनुष्य होकर भी वह विपरीत मानव बनने लगता है। न्यूनतम मानव मूल्य धारण करने लायक भी वह नहीं रह जाता। बाजारवाद की गिरफ्त में सोते हुए भावशून्य मानव के लिए मानवीय संबंध खेल से ज्यादा कुछ नहीं हैं। उसके लिए न विश्वास की कोई कीमत है, न पारिवारिक-सामाजिक कर्तव्यों की और न ही वैयक्तिक जिम्मेदारियों की। यह बाजारपरस्त गुलाम अपनी आत्मा के निर्णय के अनुसार कदम उठाने को आजाद नहीं है – क्योंकि नाप-तौल, गुणा-भाग, जोड़-घटाना, में बेतरह रमी रहने वाली उसकी सौदागर आत्मा बाजारवाद की माया के हाथों बिक चुकी होती है। आज मनुष्य के पारिवारिक, सामाजिक, वैचारिक और राजनीतिक ताने-बाने के नष्ट-भ्रष्ट, दिशाशून्य एवं अर्थहीन हो जाने का कारण यही बाजारवादी गुलामी है। बाजारवाद हमें आत्मिक रूप से पंगु बनाकर गूंगा भी कर डालता है, हमारे कदमों से दिशाओं की भूख छीन लेता है ; हाथों से रचनात्मक चमत्कार की संभावना को खत्म कर देता है। उद्योग ; प्रौद्योगिकी, यंत्र, और तकनीकी की असाधारण ताकत पर निर्भर यह बाजारवाद स्वयं निर्जीव सत्ता होते हुए भी आज समस्त सृष्टि की नियति को संचालित कर रहा है । अपने पूँजीपरस्त  हृदय की धड़कनों पर टिका बाजारवाद मनुष्य को   पूँजी का पुतला बनाने की ओर अग्रसर कर रहा है। चूंकि बाजारवाद पूँजी की महामाया पर टिका है – इसीलिए उसका प्रथम और अन्तिम लक्ष्य पूँजी की अपराजेय सत्ता को बरकरार रखना है । यह पूँजी व्यक्ति और उसके व्यक्तित्व  के बहुमुखी विकास का जब तक ‘साधन’ है – तब तक वह हृदय, मस्तिष्क और संवेदनशीलता को दिशाहीन नहीं करता, किन्तु वह जैसे ही साध्य का स्थान हासिल कर लिया सबसे पहले हमारे नैसर्गिक विवेक को लील जाता है। और जिस व्यक्ति ने हृदय में अभिनव एहसास की ताजगी, उर्ध्वगामी चेतना और अदूषित अन्तर्दृष्टि को खो दिया – वह सर्जक हो या आम इंसान- जिंदा रहने का मतलब ही खो दिया। आज दिन-ब-दिन ऐसे ही धनान्ध रचनाकारों की फौज बढ़ती जा रही है- जो नाम और दाम की कमायी करते-करते अपने अन्तःव्यक्तित्व की अलौकिक ताजगी ही खो बैठे हैं। विष्णुचन्द्र शर्मा के इस धारदार निष्कर्ष का कुछ तो कारण है – ‘एक खाया-अघाया वर्ग लेखकों में भी है, जो सोचना छोड़ चुका है। वह पुरस्कार के लिए जीता है और पश्चिमी जीवन पद्धति के लिए सौदा पटाता है। वह फ्रांस से आता है और एक सूचना प्रसारित कर अपने अभिजात वर्ग में सो जाता है। (सर्वनाम, जुलाई-सितम्बर, 2005) व्यक्तिगत हित का बलिदान, जहाँ भीतर से मनुष्य की रचनात्मक शक्ति को बल देता है, वहीं निजी लाभ का अन्धापन उसकी रचनात्मक क्षमता को घुन के माफिक चाल खाता है। लेखक के सामने आज आत्मप्रचार का दबाव है, बाजार में अपने नाम का सिक्का चलाने की हड़बड़ी है ; ढंग से खड़े होने लायक न होकर भी दीर्घ अवधि तक स्थापित रहने की सनक है, छपकर, पुरस्कृत होकर, व्याख्यायित, बहुचर्चित और उद्धृत होकर आज का लेखक सृजन के मार्केट में अन्तिम सांस तक बने रहना चाहता है। मार्गजनक रचनात्मकता और धनधर्मी बाजारवाद अपनी प्रकृति में एक दूसरे के जानी दुश्मन हैं। आज का रचनाकार इस सार्वकालिक सत्य को न समझ पाते हुए दोनों को एक साथ साधने की जुगत में लगा हुआ है; जो कि असम्भव से कई कदम आगे असम्भव है।

व्यक्तित्व का असाधारण साधारणीकरण:

यह बारम्बार दोहराया जाता है कि आज के साहित्य का समाज पर कोई प्रभाव नहीं रह गया है। आज समाज, संस्कृति, व्यवस्था और व्यक्ति के निर्माण में साहित्य की निर्णायक भूमिका लगभग समाप्त हो चली है। अर्थात् समाज को अब साहित्य की अब पहले जैसी जरूरत नहीं रही। समाज के प्रति साहित्य की सिमटती भूमिका को लेकर उठे हुए ये सभी प्रश्न, चिंताएँ और निष्कर्ष वाजिब हैं। स्वाधीनता के बाद से ही साहित्य की भूमिका सवाल के दायरे में आने लगी है। आजादी के बाद किसी भी दौर या दशक में साहित्य ने सीधे-सीधे समाज की चेतना को नेतृत्व दिया हो और अपनी निर्णायक भूमिका निभाते हुए सामाजिक परिवर्तन का नजारा पेश कर दिया हो- ऐसा दिखाई नहीं देता। दलित साहित्य ने दलित समाज और उनकी संस्कृति के प्रति प्रबुद्ध वर्ग को संवेदनशील, अवश्य किया है- किन्तु इससे क्षितिज की रेखा पर  जीती हुई सांवली दुनिया की  तस्वीर सचमुच बदल  गयी हो, ऐसा कहाँ दिखाई देता है ? सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक या मानसिक चेतना को प्रज्ज्वलित करने में सबसे  निर्णायक भूमिका  सदा ही साहित्य और दर्शन की रही। दुनिया के एक नही दर्जनों विशाल देश युगारम्भकारी साहित्य और नवोन्मेषी दर्शन के आलोक में अपने गौरव की दुर्लभ ऊँचाईयाँ हासिल किए हैं। कम से कम रूस, फ्रांस, इग्लैण्ड और भारत का इतिहास तो यही है। देश के मन, चित्त,  आकांक्षा, सपने और स्वभाव को रचने वाला  साहित्य ही युगधर्मी साहित्य कहा गया। इस बात में कुछ भी नयापन नहीं कि साहित्य हालात-ए-वक्त की धड़कन है- जिसमें तत्कालीन यथार्थ को धड़कता हुआ सुना जा सकता है। कई बार इतिहास की मोटी-मोटी पुस्तकें समय की आन्तरिक हकीकतें बताने से चूक जाती हैं तो यह दायित्व साहित्य पूरा करता है।

साहित्य अपने आप में कोई स्वतंत्र कला नहीं है – वह भी अपने मूल्य, महत्व, गौरव और अमरता के लिए किसी न किसी व्यक्तित्व पर ही निर्भर है। लेखक के व्यक्तित्व का स्तर अन्ततः साहित्य के स्तर को तय करता है। इतना ही नहीं, लेखक के भीतर अवस्थित भावना, कल्पनाप्रवणता, स्मृति की तीव्रता और असाधारण सूक्ष्मता के अनुपात में ही साहित्य का क़द सुनिश्चित होता है। साहित्य समाज के हर तबके तक पहुँचे, हर वर्ग, हर समाज, हर जाति, के बीच समान रूप से जगह बनाए, इसके लिए खुद लेखक को अपने व्यक्तित्व का असाधारण रूप से साधारणीकरण करना होता है। उसे अन्दर-अन्दर अपनी भावनाओं को मिट्टी के कण-कण में भिन जाने वाले पानी की तरह विस्तार करना पड़ता है। मन-मस्तिष्क को सैकड़ों दिशाओं में कुछ इस कदर बिछा देना होता है- मानो वह समस्त अलक्षित तथ्यों, सत्यों और रहस्यमय मर्मों का अखण्ड साक्षात्कार कर रहा हो। लेखक सिर्फ एक शरीर, एक हृदय, एक मस्तिष्क, एक आत्मा और एक सोच वाला ही रह गया तो फिर क्या लेखक हुआ ? वह तो अबाध विचरण करता है अपने सम्पूर्ण वजूद के साथ अन्य शरीर में, घटना की शिराओं में, निर्जीव वस्तुओं की काया में, रहस्यों की माया में, दृश्य और अदृश्य में, विशला और सूक्ष्म में, सत्य और असत्य में, आदि और अनंत में। लेखक के आत्मान्तरण की कोई सीमा नहीं, कोई शर्त या बंधन नहीं, कोई पूर्णविराम नहीं। अपने समय की आवाज वही रचना बनती है ; जिसका रचनाकार खुद साकार और निराकार, शरीरी और अशरीरी सत्ता में प्रवेश करने की क्षमता रखता हो। जो अपनी जुबान से नहीं, विषयों की जुबान से लिखता हो। प्रत्येक विषय की अपनी मौलिक वाणी होती है – वह उसी वाणी में बात करना चाहता है, किन्तु उसके पास हमारी तरफ जुबान नहीं है। जिस क्षण लेखक ने विषय को उसकी वाणी में अभिव्यक्ति दे दी, समझिए-युगान्तकारी रचना का जन्म हो गया। विषय हमसे किस भाषा में बोल रहा है- यह जानने के लिए विषय को उसके इतिहास, भूगोल, व्याकरण और गणित के साथ आत्मसात करना पड़ता है। एक प्रकार से सुमिरना पड़ता है विषय को, ध्यान के शिखरत्व और संवेदना के अतल आवेग के साथ। मौजूद सदी के महा बाजारवाद ने रचनाकार के साधारणीकरण की क्षमता को बाकायदा सोख लिया है। जिस साधारणीकरण के बूते वह न सिर्फ सर्वजन ज्ञानाय अपनी रचना का जमीनीकरण करता था, बल्कि खुद के व्यक्तित्व को भी पानी बनाये रखता था – आज विलुप्त  और नष्ट  हो रहा है। बाजारवाद  न तो व्यक्तित्व के साधारणीकरण की इजाजत देता है, न ही सृजन के साधारणीकरण की । वह रचनाकार और रचना दोनों को ‘स्पेशल’ दिखने के लिए प्रेरित करता है। यह दिखता, चमकता, झलकता हुआ स्पेशलाइजेशन लुभाने के लिए, निगाहों को खींचने के लिए और बुद्धि को विवेकशून्य दीवाना बनाने के लिए है। सर्जक के भीतर नैसर्गिक तौर पर कूट-कूटकर भरी असीम और अप्रत्याशित मौलिक दृष्टि का जितना क्षरण बाजारवाद ने किया है, उतना भौतिक मायाजालों के किसी भी रूप ने आजतक नहीं किया है। सर्जक अपनी रचना को स्पेशलाइजेशन के सांचे में इसलिए नहीं गढ़ रहा कि – वह साहित्य में कोई अभूतपूर्व आयाम स्थापित होगा, बल्कि वह इसलिए विशेषीकरण कर रहा है कि रचना बिके, बेस्ट सेलर का रूतबा हासिल करे, मार्केट की स्टार पुस्तक सिद्ध हो, रातोंरात आसमान में चाँद-सितारों की जगह बना ले, और पलक झपकने, उठने के बीच उसकी लाखों प्रतियाँ पाठकों के हाथों में विराजमान दिखें। लद-फन गये सृजन के वे दिन, जब बाजार की अपसंस्कृति के खिलाफ आग उगलने वाली कृतियों का अपना रूतबा होता था, जो बाजार की माया से दूर गुजर बसर करने वाले बेखास भारतीय की जीवन संरचना को साकार करके कालजयीपन की उपाधि पाती थीं, अब तो वही रचना कालजयी है, जो आजजयी है, भीड़जयी है, प्रचारजयी है और सबसे बढ़कर मार्केटजयी है। रचनाकार को यदि सचमुच साहित्य के गिरते स्वास्थ्य और घटते कद को बचाना है तो अपने व्यक्तित्व का अभूतपूर्व साधारणीकरण करने के साथ-साथ अपने सृजन का भी साधारणीकरण करना होगा। सृजन का यह साधारणीकरण सर्वप्रचलित, सर्वज्ञात और सर्वसामान्य विषयों का सम्मान करने एवं उनकी अभूतपूर्व मीमांसा करने से आरम्भ होता है – जैसा कि कथा साहित्य में प्रेमचन्द, रेणु और शरतचंद्र ने किया और कविता के क्षेत्र में कबीर, तुलसी, जायसी एवं नागार्जुन ने। साधारण के असाधारण मूल्य की स्थापना सिर्फ दूरदर्शी चेतना का अनमोल कलाकार ही कर सकता है।

बाजारपरस्त साहित्य का कल:

सृजन का कालजयी होना बहुत दूर की बात, अब उसका आजकलजयी होना ही संदिग्ध हो गया है। दैनिक अखबार की घटनाओं की तरह रचनाएँ बारिश की शक्ल में प्रकट हो रही हैं। उन पर चर्चाएँ, गोष्ठियाँ एवं समीक्षाएँ भी कुछ इसी फटाफट वाले अंदाज में। साल भर के अन्दर या साल बीतते-बीतते शून्य बटा सन्नाटा। रचनाकार गदगद कि 25-30 समीक्षाएँ उसकी किताब को त्रिकालजयी सिद्ध करने के लिए काफी हैं। बाजारोन्मुख आलोचक तृप्त कि उसने मित्रता, स्वार्थ और गठजोड़ का बारीकतम ख्याल रखते हुए रचना को दुर्लभ कृति की श्रेणी में पहुँचाकर बेमिसाल दायित्व निभा दिया और प्रकाशक आनन्दित कि उसके द्वारा प्रकाशित बहु समीक्षित पुस्तकों पर जहाँ-तहाँ से लखटकिया आर्डर सुनिश्चित। अपनी पुस्तकों पर पकड़-पकड़ कर समीक्षा उगलवाना और सम्पादकों को ‘सेट’ करके उसे छपाने का जुगाड़ गांठना अधिकांश लेखकों की नियति बन चुकी है। सम्पादक को सिर्फ किताब भेज कर आलोचना के दो शब्द पाने का ख्वाब बुनने वाला लेखक शर्तिया पिछड़ा हुआ माना जा रहा है। हालात तो इस ऊँचाई (?) तक पहुँच गये हैं – कि ‘मैंने तुम पर लिखा’- अब तूँ भी मेरे ऊपर लिख। मैंने साक्षात्कार में तेरा नामोल्लेख किया है- तू अपने लेख  में मुझे अमरता की गद्दी पर अपने हाथ से उठाकर बिठा।’ आज वरिष्ठ रचनाकारों में ऐसे अनेक चमकते नाम हैं जो अपनी  ढोल पिटवाने के लिए देश के शहरों, कस्बों, गाँवों में संघर्षरत  युवा नामों को अपनी महिमा और मान्यता के जाल में फंसाते हैं, उनकी पुस्तकों का ब्लर्ब लिखते हैं, अपनी पत्रिकाओं में, सभाओं में या नियमित काॅलमों में उसका नाम-गायन करते हैं और बदले में जगह-जगह अपनी कृतियों की समीक्षाएं, अपने व्यक्तित्व के असाधारणत्व पर लेख लिखवाते हैं। युवा अंधभक्त और बुर्जुग काव्येश्वर के ऐसे अबूझ स्वार्थतंत्र को धन्य-धन्य कहें या ? इस तंत्र का  जन्मदाता है बाजारवाद । प्रचार के ज्वारीय वातावरण पर टिका साहित्य अपनी स्तरीयता में दो तो क्या एक कौड़ी का भी न होने के बावजूद पाठक के दिमाग पर कितना मादक प्रभाव छोड़ता है- इसका सबसे प्रत्यक्ष उदाहरण है – इक्कीसवीं सदी का हिन्दी साहित्य। प्रसिद्ध आलोचक विजय कुमार ने बाजारवादी युवा पीढ़ी की दर नंगई का जैसा नजारा पेश किया है- वह देखिए – ‘नये और युवा कवि का दुर्भाग्य यह है कि हिन्दी में अब एक भयावह नैतिक स्खलन का दौर है। चारों तरफ केवल उत्सवधर्मिता है। अफरातफरी और धमा-चौकड़ी मची हुई है। प्रत्यक्ष और परोक्ष तरीकों से साहित्य के मठाधीशों द्वारा अपनी शक्ति संरचनाओं का अश्लील प्रदर्शन है।’ (नया ज्ञानोदय, मई-2007,पृ. 12)

जुगाड़ से लिखने, तिकड़म से छपने और जोड़-घटाना-गुणा-भाग की कलाकारी से स्थापित होने का समय हमारे-आपके ठीक बीच तनकर खड़ा है। आज जो लेखक व्यवहार निभाने में अप-टू-डेटेड नहीं है, जो सम्पादकों, सृजनेश्वरों को साहित्येतर सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा सकता- जीवन भर कलम पकड़कर रोने के लिए तैयार रहे। आजकल वह कौन सी महामाया का चक्र माहौल में घूम रहा है कि बेमिसाल सृजन की आग पहचानने वाली आँखें ही नहीं बची हैं। जिस कलम में तब्दीली लाने वाली पदचाप है, उसे न आलोचक सुन पा रहा, न ही साहित्य जगत। जिस रचना में वक्त से अपलक निगाहें मिलाने का माद्दा है- उसे गुमनामी के कूड़ेदान में फेंकने की साजिशें हो रही हैं। जिस शिल्पी में समय की मुकम्मल प्रतिमा स्थापित करने की दुर्लभ क्षमता है वह आम पाठकों को छोड़कर किसी को फूटी आँखों नहीं सुहा रहा। हालात के बदतर से बदतर होने का आलम यह कि जो साहित्य के संकट पर ताली पीट-पीटकर रो रहा है- वही उदात्त अर्थों से लबरेज रचना पढ़ते ही छँटा हुआ गूंगा बन जाता है। वह न जाने किस गहन ग्रंथि के कारण प्रत्यक्ष दिखती प्रकाशधर्मी रचना पर मौन साध लेता है। इतना ही नहीं दोयम-तेयम-चैथम दर्जे की रचना की बेशर्मी के साथ ऐसी प्रशंसा भूंकता है कि आंधी मचने लगती है। निश्चय ही, निश्चय ही अब विशुद्ध साहित्येतर कारणों से रचनाएँ लोकप्रिय हो रही हैं और जबरन मील का पत्थर घोषित की जा रही हैं। वे कारण हैं – लेखक की राजनीतिक और आर्थिक हैसियत, वरिष्ठ शब्देश्वरों और साहित्य के शतरंजबाज मित्रों से आत्मबद्ध सम्पर्क। इस संबंध का विषवृक्ष अंगूर का लाल पानी पाकर और हराभरा होता है। यूँ कहिए कि शरीर में अकड़ जगा देने वाला लाल रस साहित्य में साहित्य के खिलाफ मची हुई अंधेरगर्दी का सबसे बड़ा कारण  है। यह पानी जिस किसी के गले उतर गया- कुछ न कुछ कारनामा करवा ही देता है- किसी लम्पट शब्दकार को पुरस्कार दिलवा देगा, किसी कवयित्री को रातोंरात स्टार बनवा देगा, किसी पिछलग्गू को विदेश यात्रा करवा देगा, किसी चेला को काॅलेज या यूनीवर्सिटी में स्थापित करवा देगा। यहाँ तक कि अपनी उम्र, पद, प्रतिष्ठा, कद भुलवा कर नवोदित रचनाकारा से एकाकार होने के सपने पलवा देगा। दारूबाज साहित्यकारों  की विवेकशून्य जमात इसी बाजारवाद की ही देन है, जिसके भीतर न पवित्र संकल्प है, न पक्षधरता की आग, न आम जन हृदय से एकाकार होने की तड़प, न सृजन के हथियार से समय को पराजित करने का औघड़ी आत्मविश्वास, न लौ में तब्दील होने की ताकत, न आकाशधर्मी चेतना हासिल करने का आत्मसंघर्ष और न ही सृजन के प्रति अटूट समर्पण का जज़्बा। निर्जीव किन्तु प्राणलेवा लाल रस का आकंठ गुलाम बन चुके इन साहित्यकारां की आँखें सपने देखना कब का भूल चुकी हैं। इन आँखों के आँसू माया-जाल के हाथों कब के बिक चुके हैं । इन मुर्दा आँखों ने सत्ता-प्रभुसत्ता से समझौता कर लिया है। साहित्य के वर्तमान संकट या भावी पुनर्निमाण को लेकर कोई ‘विजन’ नहीं है। ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान’ स्टाइल में जबरन स्थापित हुए जा रहे हैं- ये लालरसवादी कलमबाज। यह अद्भुत संयोग है कि ऐसे ही रसाचार्यों के खाते में सर्वाधिक पुरस्कार हैं और साहित्य जगत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सेनापति भी हैं।

दोयम दर्जे की रचनाओं को प्रथम श्रेणी में चिरस्थापित करने का खेल चारों ओर मचा हुआ है। आम पाठक जिस रचना को पढ़कर साहित्यिक के प्रति अपने प्रेम पर पछता रहा है, न जाने किस रहस्यमय तंत्र के अन्तर्गत उस पर प्रतिष्ठित पुरस्कार मिलना आम बात हो गयी है। आज का साहित्य प्रेमी पाठक खुद को ऐसा ठगा सा महसूस कर रहा है- मानो उसकी अतृप्त साहित्यिक अभिरूचि से साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। भाषा, शैली, शिल्प और संवदेना की कसौटियों पर साधारण से साधारण सिद्ध होने वाली कृतियाँ घनघोर प्रचार, समीक्षा, चर्चा और भजन-कीर्तन की वैसाखियों पर असाधारण दर्जे की घोषित हो रही हैं। यह साहित्यगिरी कविता, कहानी, उपन्यास और आलोचना जैसी सभी प्रमुख विधाओं में जारी है। यदि कृति में मौलिक चमक से भरी भाषा नहीं है, यदि अर्थों की बहुमुखी तरंगे पैदा करने वाली शैली नहीं है और हमारे अन्तस्थल में जज्बातों का ज्वार खड़ा कर देने वाली नवोन्मेषी संवेदना नहीं है तो फिर किस लिए वह असाधारण है ? गुणवत्ता के आधार पर कृति की श्रेष्ठता प्रमाणित होने के दिन लद गये। अब उसके कालजयी होने की शर्तें हैं- सरनाम पुरस्कार, आलोचना के मठाधीशों की चरण भक्ति, अपने उपर लिखवाने की विलक्षण कलाकारी और साहित्येतर मधुर संबंधों की परम साधना। ये सभी दक्षताएँ दिन-प्रतिदिन मांजते, चमकाते, धारदार बनाते रहने से न सिर्फ आपकी सड़ी-गली कृतियाँ अविस्मरणीय घोषित की जाएंगी, बल्कि आपको भी किसी न किसी क्रीम विधा में मूर्ति की तरह स्थापित कर दिया जाएगा। साहित्य के बाजारकाल ने रचनाओं का स्तर, साहित्य में उसकी जगह तय करने की कसौटियों को इस कदर गड्मगड् कर दिया है कि असली सृजनात्मकता का सर्वोच्च सम्मान लगातार सपना होता जा रहा है।

साहित्य के पतन का पलायन वेग: साहित्य में जैसे-जैसे पूँजी, बाजार, राजनीति की सत्ता ने अपने फन फैलाए हैं, वैसे-वैसे साहित्य का छद्म रूप विकसित होता चला गया है। छद्म साहित्य समय के सख्त सवालों से न टकराता हुआ, आँखें न मिलाता हुआ, तन कर न खड़ा होता हुआ साहित्य है। ऐसे साहित्य में भाषा की जादूगरी हो सकती है, मनेाहारी शिल्प की तूति बोल सकती है, लच्छेदार और तरंगमय वाक्यों की भरमार हो सकती है- किन्तु उसमें आत्मा नाम की चीज नदारत मिलेगी, उसमें  समय की धड़कनें नहीं सुनाई देंगी, उसमें जनता की चीखों, आहों, और आँसुओं के लिए जगह नहीं होगी, यदि होगी भी तो विश्वास न करने योग्य, अस्वाभाविक और ग़ैर प्रामाणिक। छद्म साहित्य को माहौल में टिकाए रखने का आधार भाषाई, शिल्पगत या शाब्दिक कला ही देती है। अपने पोर-पोर में उद्दाम संवेदना से कसी हुई रचना कला शून्य होकर पाठकों के दिलों पर जहाॅं सदियों तक राज करती है – वहीं खांटी कलात्मकता में झलक मारती हुई रचना फटाफट सम्मोहन पैदा कर हमेशा के लिए ठण्डी पड़ जाती है। यह साहित्य का ऐसा बाजारकाल है- जहाँ रचना जन्म ली नहीं कि अमरता का स्वाद चख लिया, चार दिन बीते नहीं कि इतिहास में स्थान पक्का । वह पाठक जो सदियों से कृति की महत्ता की अन्तिम कसौटी माना जाता रहा है, अब खारिज किया जा चुका है। सृजन की इस सार्वकालिक कसौटी की फिक्र न रचनाकार को है और न ही आलोचक को। मौजूदा काल के पहले सृजन की असाधारणता को या तो बहुसंख्यक पाठक सिद्ध करते थे, या फिर न्यायाधीशनुमा समय। किन्तु बाजारवाद न पाठक के निर्णय का इंतजार करता है, न ही समय के फैसले पर यकीन करता है। अपना और अपनी रचना का जितना, जिस हद तक हला-भला होना है- उसके जीते जी, उसकी आँखों के सामने हो जाय। रचनाकार देख ले कि उसकी रचना ने अपनी विधा में अमरता की सीट पक्की कर ली। रचनाकार खुलेआम बस यही नहीं लिख रहा कि उसने अमर रचना लिख डाली है, किन्तु उसका असहज व्यवहार, दम्भपूर्ण प्रसन्नता, आसमानी प्रयत्न, प्रचार का जुगाड़, पुरस्कृत होने के लिए अपनायी गयी नवधा भक्ति कुल मिलाकर किस निष्कर्ष का संकेत देते हैं ? साहित्य में अब ऐसे कलमेश्वरों की भरमार है जो बढ़चढ़ अपनी कविताओं, कहानियों, आलेखों पर मौखिक कसीदे गढ़ते हैं, तारीफों की बारिश करते हैं और उसकी अद्वितीयता का लोहा मनवा लेने के लिए एड़ी-चोटी की सारी ताकत झोंक देते हैं। यह आत्मप्रशंसा कभी आत्महत्या से कम घातक नहीं मानी जाती थी, किन्तु आज वही अहमियत हासिल करने की अनिवार्य योग्यता है।

स्पष्ट तौर पर इस बाजारवाद ने साहित्य में समय और आम पाठक की ऐतिहासिक भूमिका को ही समाप्त कर दिया है। पाठक के विश्वास की मुहर लगे बग़ैर रचनाएँ इतिहास में जगह बनाने लगी हैं यह वर्तमान साहित्य के भयावह पतन की इन्तहा तो है ही, भविष्य में विलुप्त हो जाने वाली कला की नियति का संकेत भी है। भविष्य का हिन्दी साहित्य अपनी भयानक नियति प्राप्त करने की ओर अग्रसर है। पिछले पचास-साठ वर्षों से साहित्य का दिन तिगुना-रात दस गुना राजनीतिकरण, जुगाड़ीकरण, स्वार्थीकरण हुआ है। साहित्यकार -न भूतो, न भविष्यति’ के स्तर का पतनवादी प्राणी बन चुका है। भ्रम उठता है कि साहित्य, लेखक के लिए कहीं ऐय्याशी का अखाड़ा तो नहीं, कहीं रूतबा झाड़ने का अड्डा तो नहीं, कहीं गुमनामी की भड़ास निकालने का मंच तो नहीं ? आखिर कारण क्या है कि संघर्ष के दिनों में एक-एक कदम बढ़ने के लिए जान लगा देने वाला कवि, कहानीकार, आलोचक साहित्य में चर्चित, स्थापित या सरनामित होते ही बड़बोलेपन में ताक्धिनाधिन् नाचता हुआ पुतला बन जाता है। सृजन से कीमती है- तपा हुआ व्यक्तित्व और तपे हुए व्यक्तित्व से मूल्यवान है-साहित्य का गौरव और साहित्य के गौरव से भी ऊपर का महत्व रखती है- मानवता। इसलिए जो सर्जक मानवता का माथा बुलन्द रखने के लिए कलम का वजन उठाता है- अन्ततः वही युगप्रवर्तक साहित्यशिल्पी सिद्ध होता है। ग़ौर करने लायक है- शिव कुमार मिश्र के वाक्य-दर-वाक्य, यदि पतन की ओर पलायन वेग से अग्रसर होते हिन्दी साहित्य को समझना है तो- ‘बाजार का मायालोक, अपसंस्कृति का सैलाब, सुख-भोगवाद की आंधी, निजीकरण का बढ़ता दायरा, विदेशी पूँजी का निवेश, यह सब एक ओर और वंचितों, उपेक्षितों की एक बड़ी दुनिया दूसरी ओर। सुख भोगवाद में आकंठ डूबा समाज का एक छोटा तबका एक ओर तथा दमन, उत्पीड़न, अभाव और वंचनाओं का शिकार, दलित, आदिवासी, स्त्री तथा हाशिए पर जीने वालों का संसार दूसरी ओर।’ (परिकथा; मार्च-अप्रैल-2008, पृ. सं. 8)

भरत प्रसाद

एसोसिएट प्रोफेसर

हिन्दी विभाग

पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय

शिलांग – 22 (मेघालय)

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