वीणा भाटिया की तीन कविताएं

वसीयत साहित्यकार की

शब्दों के भंडार

कलमें जो हैं चार

कुछ पेपर सफ़ेद

एक टेबल-कुर्सी

खूंटी पर टंगी हुई जर्सी

 

क्या लिखूँ वसीयत इसकी

किसे ज़रूरत है मार्क्स-लेनिन की

कौन समझेगा टैगोर-निराला-गोरख की लेखनी

कोई नहीं जानना चाहता

समाजवाद धीरे-धीरे आए,

काले-काले अच्छर चम्पा है चीन्हती

राग दरबारी का राग

मुर्दाघर की क्या थी व्यथा

कितने पाकिस्तान

आसमान के घर में खुली थी

क्यों खिड़कियाँ

वेश्या एविलन रो का जख़्म

कोई नहीं पहचानता

 

कौन लेगा

मेरे बाद

कौन समझेगा

शब्दों का भंडार

किसे ज़रूरत है

आज क़लम की

 

सबके हाथ में टंगा है माउस

माउस में बंद

बाज़ार-अख़बार

न अक्षर पढ़ना न लिखना

एक क्लिक में

काम होता हर बार

 

कुछ भी नहीं करना मेरे बाद

छोड़ देना यदा-कदा

ज़रूर आएगा कोई

मुझे खोजता

समझेगा शब्दों को

छुएगा करीने-सलीके से रखी

मेरी पुस्तकों को।

 

तितली के रंग

बच्चा किताबों में

ढूँढता है

तितली के रंग

मछली की आँखें

चिड़िया के पंख

 

बच्चा ढूँढता है

दादी-नानी की कहानी

परियों की रानी

 

पढ़ते हैं पुस्तकें

करते हैं चित्रकारी

दुनिया देखते

इसमें सारी।

 

मित्रों की यादें

पुस्तकें ज़िन्दगी का

अहम हिस्सा हैं

इनसे हमारा एक

अटूट रिश्ता है

 

हमारे गुलज़ार

लिखते हैं –

“किताबों से अगर गुज़रो तो

यूँ क़िरदार मिलते हैं

गये वक़्तों की ड्योढ़ी में

खड़े कुछ यार मिलते हैं।”

 

किताबें मित्र उम्र के

हर पड़ाव में

घर, सफ़र या पेड़ की

छाँव में

किताबें ही सहेजती हैं

मित्रों की यादें

 

सूखे फूल का मिल जाना

किसी किताब में

पढ़ते-पढ़ते महक जाना

उसकी याद में

 

किताबों का कोई

वक़्त नहीं होता

रात नहीं होती

दिन नहीं होता

किताबें स्याही और

काग़ज़ों के वज़ूद में

किसी दुआ

किसी नज़राने के रूप में।

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2 Responses

  1. बेहद सुन्दर कविताएँ।

  2. मनोहर नोतानी says:

    बढ़िया

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