…तो सभी पत्रकार उपन्यासकार होते

जयप्रकाश मानस

हर शुक्रवार, किस्त 12

20 सितंबर, 2015

22 भाषा 43 कवि

हिंदी अकादमी शायद देश की पहली सरकारी संस्था है जो भारतीय भाषाओं के कवियों को निरंतर दो दिनों तक एक मंच पर जोड़कर उनके मध्य संवाद रचती है । ‘भारतीय कविता बिम्ब’ नामक यह महत्वपूर्ण आयोजन दिल्ली में पिछले कई सालों से हो रहा है। इस वर्ष 22 भाषाओं के 43 कवियों के व्यक्तित्व और कृतित्व को समादृत करते हुए एक पुस्तिका (संपादक:डॉ. हरिसुमन बिष्ट) भी इसी नाम से प्रकाशित की गई  है, जिसका विमोचन 19 सितंबर को त्रिवेणी सभागार में विश्वनाथ प्रसादत्रिपाठी, मैत्रेयी पुष्पा, डॉ. ओम निश्चल और रमेश तिवारी (भाषा-संस्कृतिसचिव, दिल्ली सरकार) की समुपस्थिति में हुआ ।

 

3-3 साहित्य अकादमी सम्मान से विभूषित कवियों के साथ कविता पाठ करने का उजला संयोग कम ही आता है । यह सुंदर संयोग बनाया था हिंदी अकादमी, दिल्ली ने । ‘भारतीय कविता बिम्ब’ का अंतिम सत्र ऐसा ही था जहाँ मंगलेश डबराल (हिंदी), डॉ. आईदान सिंह भाटी (राजस्थानी) और मोहन सिंह (डोंगरी) 3 अकादमी सम्मान प्राप्त दिग्गज कवि, साथ में हिंदी के वरिष्ठतम् और अनन्यतम् कवि नरेश सक्सेना के बीच मुझे अपनी प्रतिनिधि कविताओं के पाठ का सफलतम् अवसर मिला ।भाटी जी की अध्यक्षता में अन्य सहभागी कवि थे – डॉ. जूटूर शरीफ़ (तेलुगु), अनुपमा बासुमतारी (असमिया), भूपेन्दर सुब्बा (नेपाली), संतोष पटेल (भोजपुरी) और बरजिन्दर चौहान (पंजाबी)दिल्ली में 20 सिंतबर, 2015 वाले इस अच्छे दिन के लिए अकादमी के सचिव हरिसुमन बिष्ट और उपाध्यक्षा मैत्रैयी दीदी के प्रति विशेष आभार ।!

 

पढ़ते-पढ़ते : लिखते-लिखते

जब वे लिख रहे थे तब हम पढ़ रहे थे । आज वे पढ़ रहे हैं और हम लिख रहे हैं ।हमारा लिखना उनको पढ़ना ही हो सकता है और उनका पढ़ना हमारा अपने को ही लिखना ।वे चाहते तो बिलकुल नहीं पढ़ते आज । हम न चाहते तो बिलकुल नहीं लिखते आज ।वे क्यों छोड़ें लिखना-पढ़ना !हम भी छोड़ें क्यों पढ़ना-लिखना !!बहुत दिनों के बाद मिले अग्रज मदन कश्यप जी तो कहा यही – “बिलकुल नये कथ्य, नयी भाषा, नये शिल्प को ला रहे हो भाई ! ” “शायद लिखते-लिखते – शायद पढ़ते-पढ़ते !”लालित्य ने कंधे उचकाकर मन-ही-मन कहा हो जैसे : “लटेसर की दुनिया” ग़र सुना देते तो क्या होता ?

 

और ज़रा समीप आयें तो

हिन्दी अकादमी, दिल्ली का आयोजन । समय यही कोई लगभग ढलती दोपहरी ।त्रिवेणी सभागार के प्रवेश-द्वार पर ही मिल गये – हमारे बुजुर्ग और मार्गदर्शक रचनाकार विश्वनाथ त्रिपाठी जी !मैने विनम्र-भाव से यथोचित सम्मान के बाद आग्रह किया – “हजारी प्रसाद द्विवेदी जी को तो हम और हमारी पीढ़ी देख ही न सकी…..।”बे बोले – “मानस, इसका अर्थ क्या यह भी कि हम आपकी पीढ़ी से दूर रहें ?” मैंने निवेदन के साथ कहा – “सर और ज़रा समीप आयें तो इस क्षण को कोई क़ैद भी कर ले। समझेंगे द्विवेदी जी से ही मिले थे ! ” “तुम न मानस………! “फिर क्या ! फ़्लैश अनगिनत चमक उठीं !

 

झट से ख़रीद लिया

हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा प्रकाशित बहुत सारी कृतियों में सदा पठनीय और संग्रहणीय एक यह भी : ‘शताब्दी का निबंध !’ भई, मैं तो निबंध का सच्चा पाठक ठहरा, झट से ख़रीद लिया 550 रूपयों में ।आख़िर 100 वर्षों की हिन्दी निबंध परंपरा को एक जगह पढ़ने-समझने का अवसर भी तो देती है यह ।

 

उन दोनों का मिलना

दिल्ली में मेरे दो अतिशय प्रिय युवा रचनाकार दंपति। एक कथा में प्रभावशाली तो दूसरा कविता में, इससे अधिक प्रभावशाली दोनों का नम्र और आत्मीय व्यवहार । उन दोनों का मिलना जैसे वर्षों बाद महानगर में एकाएक अपने गाँव के दो सबसे सरल और तरल जनों का मिल जाना ।मेरे जैसे सबको हो नसीब ऐसी बहन और ऐसा भाई !बहन कहूँ तो प्रज्ञा ! भाई कहूँ तो राकेश !!

 

हुआ यह पहली बार

 ‘रुला दिया सर आपने ! ‘ ‘चंबल’ कविता पढ़कर तो पहले अकेला अकुलाता था कभी । कल तो आपसे कविता क्या सुनी आपके पास बैठकर सबके साथ रोता रहा …..मानस यह तो केवल प्यार तुम्हारा ! (नरेश सक्सेना जी के साथ घंटों बतियाते हुए दिल्ली में)

 

25 सितंबर, 2015

लखनऊ चलकर रायपुर आया

उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की तारीफ़ की जानी चाहिए कि घर पहुँच कर रचनाकारों के सम्मान की स्वस्थ परंपरा का निर्वाह करता आया है । ऐसा नहीं कि कोई सम्मानित रचनाकार समारोह में नहीं पहुँच पाया तो सरकारी ढर्रे की तरह कोरियर से भिजवा दिया या किसी चपरासी के हस्ते ।हमारे शहर के कवि-कथाकार आदरणीय विनोद कुमार शुक्ल जी बीमारी की वज़ह से उस दिन समारोह में नहीं पहुँच सके थे ।आज हिंदी संस्थान के संवेदनशील निदेशक और सुपरिचित कथाकार सुधाकर अदीब जी खुद चलकर रायपुर आये हैं। श्री अदीब ने आज श्री शुक्ल जी को हिंदी गौरव सम्मान (पुरस्कार राशि 4 लाख रु. आदि ) सौंपा ।

 

संवेदना एक झरना है जो केवल लेखन में नहीं, लेखक की वाणी और व्यवहार में भी कलकल कलकल करती हुई बहती है और यही संवेदनात्मक साम्य लेखक को बाहर-भीतर दोनों से संपूर्ण बनाता है ।आप भी जब वरिष्ठ उपन्यासकार, उ.प्र. हिन्दी संस्थान के निदेशक डॉ. सुधाकर अदीब जी से मिलेंगे तो चाहेंगे एक अतिशय विनम्र और आत्मीय रचनाकार को सदा-सदा के लिए मित्र बना लें ।युवा कवि प्रवीण भाई तो यही कह रहे हैं ।हम दोनों अंतरजाल के प्रारंभिक दौर से ही एक दूसरे से जुड़े रहे हैं पर आज साक्षात् मिलने का सुअवसर मिला (विनोद कुमार शुक्ल जी की घर पहुँच सम्मान-सेवा के बाद) लखनऊ जब रायपुर चलकर आ सकता है तो रायपुर भी चलकर लखनऊ के पास क्यों नहीं जा सकता और तब, जब ‘रंग राची’ का आनंद लखनऊ के हाथों ही संभव हो !

 

शर्मनाक लेखन

देश के कुछ मीडियाकर और उत्सवप्रिय लेखकों ने आदिवासी इलाके के जिस लेखक को पिछले कई साल से ग्लोबल लेखक-उपन्यासकार बताकर सिर चढ़ा रखा है, उसे पढ़ा तो माथा पीट डाला !वह अपने उपन्यास में लिखता है : शिवनाथ नदी छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में बहती है जिसे एक कंपनी को बेच दिया गया ।दुर्ग जिले वाले इस उपन्यासकार को पढ़ेंगे तो सालों तक पागल बने रहेंगे ।अब पाठकों / समीक्षकों / प्रकाशकों / आलोचकों / प्रशंसकों / प्रचारकों को कौन समझाते फिरे कि : अख़बार पढ़कर उपन्यास लिखा जाता तो सभी पत्रकार उपन्यासकार न होते ।

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