Monthly Archive: April 2016

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राज्यवर्द्धन की तीन कविताएं

राज्यवर्द्धन एकांत भीड़  में एकांत की तलाश एकांत में एक अदद चेहरे की ललक अकुलाने लगते हैं शब्द नि:शब्द में स्मृतिहीन कैसे बन जाऊँ वह भी तो संचित सम्पदा है कलकल छलछल की अहिर्निश ध्वनि बीच सुनना चाहता है कान किसी चिर -परिचित की मधुर तान खेल चॊर सिपाही मंत्री...

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आनन्द गुप्ता की तीन कविताएं

शब्द शब्दों में ही जन्मा हूँ शब्दों में ही पला मैं शब्दों में जीता हूँ शब्द ओढ़ता बिछाता हूँ। जैसे सभ्यता के भीतर सरपट दौड़ता है इतिहास सदियों का सफर तय करते हुए ये शब्द मेरे लहू में दौड़ रहे हैं मैं शब्दों की यात्रा करते हुए खुद को आज...

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सुषमा सिन्हा की तीन कविताएं

सुषमा सिन्हा एहसास किसी के होने का एहसास बचा रहता है वर्षों तक जबकि गुजरे उसके बीत चुका होता है बहुत सारा समय किसी का वजूद खड़ा रहता है दीवारों-सा जबकि उसका अस्तित्व ही नहीं होता है इस दुनिया में कोई आवाज करती है पीछा ताउम्र जबकि उस आवाज की...

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सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की तीन कविताएं

 सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव भूख और मुहब्बत मैंने ठंडे चूल्हे में मुहब्बत को दम तोड़ते देखा है भूख दीवानी है किसी को नहीं छोड़ती दिवास्वप्न हां यह एक दिवास्वप्न है कि आदमी कभी आदमी भी बनेगा। अंधेरे से क्या डरना? अंधेरे से क्या डरना? अंधेरा है तो उजाला आएगा ही आखिर...

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हेमन्त वशिष्ठ की कविता ‘वो सिर्फ एक शरीर है …’

हेमन्त वशिष्ठ एक अजीब सा… गुनगुनाता हुआ सन्नाटा … सामान्य होने की कोशिश करती सांसें… औऱ चेहरे पर… जैसे उदासी की भाप लिए… 22 साल की वो … और उसका साथी …. पुरानी ब्लैक एंड व्हाईट फिल्मों सरीखा… फुल स्पीड से … लहराता सीलिंग फैन… और नीचे लेटी उस लड़की...

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शहंशाह आलम की कविता ‘घर वापसी’

घर वापसी सहसा मेरा घर कहीं खो गया है कहीं गुम हो गया है जो चीन्हा-पहचाना था   आपने देखा आपने सुना…   मैं किस सूराख़ से झाँककर अपने चीन्हे-पहचाने घर को तलाशूँ ढूंढूँ   जबकि इस बीते-अनबीते में सबका घर है सदृश्य   बस मेरा ही घर खो-गुम गया...

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शुक्ला चौधरी की 5 कविताएं

शुक्ला चौधरी युद्ध न मिसाइलें दाग न अस्त्र दिखा तू देखता जा युद्ध आरंभ हो चुका है एक बूंद पानी के लिए एक और युद्ध की तैयारी रात सरपट दौड़ रही है पानी के लिए बरतन खाली कर रही है औरतें/रात दो बजे सार्वजनिक नल से पतली सी धार पानी...

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योगेंद्र कृष्णा की तीन कविताएं

योगेंद्र कृष्णा मछुआरा एक मछुआरा समुद्र को जितना जानता है उतना तुम कहां तुम तफरीह में आते-जाते रहे दूर से निहारते या छूते रहे पानी को जैसे सहलाता हो कोई खरगोश तुम उसकी लहरों से उठता संगीत सुनते रहे नहीं जाना कभी ये लहरें उठती ही क्यों हैं अजनबी सैलानियों...

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बुद्धिलाल पाल की तीन कविताएं

बुद्धिलाल पाल असंतोष जनता का असंतोष राजा के राज्य में पानी के बुलबुलों-सा उठता …… फुस्स हो जाता राजा जनता को स्वामी-भक्ति सिखाता उसकी जड़ों में मठा डालता जनता से हाय-हलो, कैसे हो कहता दारू वालों को दारू भीख वालों को भीख निकम्मे ज्ञानवादियों को दान अपने सूबेदारों को सूबे...

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जीवन से छूट रहे जीवन को बचाने का उपक्रम

शहंशाह आलम कुँवर रवीन्द्र जिस दुस्साहस से सजग, विनम्र, पानीदार होकर कवितारत रहते आए हैं, मुझे इनका इस तरह कवितारत रहना अचंभित करता है, जैसे इनकी रंगों से दोस्ती मुझे विस्मित करती रही है। अब इनकी अस्सी से अधिक कविताओं का संग्रह ‘रंग जो छूट गया था’ जिस उम्दा तरीक़े...

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अनवर सुहैल की तीन कविताएं

एक नफरतों से पैदा नहीं होगा इंक़लाब लेना-देना नहीं कुछ नफ़रत का किसी इंक़लाब से नफ़रत की कोख से कोई इंक़लाब होगा नहीं पैदा मेरे दोस्त ताने, व्यंग्य, लानतें और गालियाँ पत्थर, खंज़र, गोला-बारूद या कत्लो-गारत यही तो हैं फसलें नफ़रत की खेती की… तुम सोचते हो कि नफ़रत के...

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निर्मल गुप्त की तीन कविताएं

निर्मल  गुप्त लोग घर वापस जा रहे हैं लोग घर वापस जा रहे हैं कंधे पर लटकाये बेलनाकार टिफिन जिसमें अब भी पड़े हैं रोटी के कुछ सख्त कुतरे हुए कोने भूख चाहे जैसी भी हो बचा रहता है फिर भी कुछ न कुछ। लोग घर वापस जा रहे हैं...

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घर : एक आत्मकथा

सिनीवाली मैं बोल नहीं सकता। पर मैं संवेदनहीन नहीं हूं। जिसमें तुम सब और तुम्हारी विगत पीढि़यों ने जिंदगी गुजारी है, हां मैं ही तो हूं….. तुम्हारा घर । तुम्हारे बाप दादा ने मुझे खून पसीने की कमाई से एक एक रूपया जोड़कर बनाया। जिस दिन मेरी नींव पड़ी थी,...

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मैं पतझड़ में बसंत लिख रहा हूं

नित्यानंद गायेन   आधुनिक हो गया है हत्यारा बहुत आधुनिक हो गया है हत्यारा | उसने सीख ली है नई तकनीक अब वह हथियार से नहीं करता वार नहीं मिलते उसके हाथों में खून के धब्बे अब उसके इशारों पर हो जाते हैं हजारों क़त्ल एक साथ |  मैं पतझड़ में...

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स्मिता मृणाल की तीन कविताएं

स्मिता मृणाल रिफ्यूजी बचपन एक कोलाहल सा गुजरता है हर पल उन बदबूदार सीलन से भरे टेंटों में विस्मृत सी धुंध से उठता एक शोर तोड़ता चुप से सन्नाटे को बेतहाशा बदहवास भागती हुई सी एक भीड़ और पीछे आग की कुछ तेज़ लपटें जलते हुए कुछ घर छूटती हुई...

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सुशांत सुप्रिय की तीन कविताएं

सुशांत सुप्रिय इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं देह में फाँस-सा यह समय है जब अपनी परछाईं भी संदिग्ध है ‘ हमें बचाओ , हम त्रस्त हैं ‘ — घबराए हुए लोग चिल्ला रहे हैं किंतु दूसरी ओर केवल एक रेकॉर्डेड आवाज़ उपलब्ध है — ‘ इस रूट की...

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मामाजी

रागिनी पुरी करीब छह बज रहे हैं। पूरा घर सुबह की पहली अंगड़ाई ले रहा है। सुमेधा के कानों में हल्की हल्की आवाज़ें छन कर आ रही हैं। कभी बाथरूम की हल्की फुल्की उथल पुथल, तो कभी रसोई में बर्तनों के खड़कने की आवाज़ें…इसका मतलब मामीजी जाग गई हैं। लॉबी...

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मनुष्य और लोकजीवन के कभी न अंत होने की कविताएँ

शहंशाह आलम   मेरा मानना है कि कविता की आँखें होती हैं, तभी तो जिस तरह कवि की पुतली अपने समय को देखने के लिए हर तरफ़ घूमती-घामती है, वैसे ही कविता की भी पुतली चहुँओर घूमती रहती है। कवि और कविता के लिए यह ज़रूरी भी है कि दोनों...

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शैलेंद्र शांत की चार कविताएं

शैलेंद्र शांत   उसके सीने पर सवार थी इमारत मछलियां बार-बार ऊपर आ जाती थीं और पलट कर गोताखोर बन जाती थीं इस छोर, उस छोर कुछ लोग उन्हें फंसाने की फिराक में बैठे थे बंसी डाले और उधर उस छोर पर बैठे थे कुछ जोड़े अपनी सुध खोए और...