Monthly Archive: April 2016

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तीन लघु प्रेम कथाएं

सत्येंद्र  प्रसाद  श्रीवास्तव महबूबा तुम भूख की तरह आती हो, प्यास की तरह तड़पाती हो, खुशबू की तरह लुभा कर उड़ जाती हो, अभाव की तरह रोम-रोम में बस जाती हो, सपनों में खुशी बनकर आती हो, नींद खुलती है तो महंगाई की तरह इठलाती हो,पूस की ठंड की तरह...

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हमारे समय की पटकथा

राजकिशोर राजन   हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब साहित्य भी बाजारवाद के ढाँचे में समाहित हो रहा है। प्रतिरोध के स्वर नेपथ्य में जा रहे हैं। वैसे में एक कविता ही है जो सबसे ज्यादा बेचैन है, चूँकि उसका सपना संसार को सुन्दर, कलात्मक, भय-भूख और शोषण...

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दशरथ की कहानी

सुनील मिश्रा कमाकर अपना व परिवार का पेट भर लेना, ये सपना भले ही देखने-सुनने में बड़ा छोटा लगता हो, मगर बहुत सारे लोगों की आँखों में तैरता ये सपना उन्हें अपने घरों से दूर बहुत दूर ले जाता है, पिछले दिनों नोएडा में ऐसे ही एक मुस्कराते हुए शख्स...

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शहंशाह आलम की चार कविताएं

शहंशाह आलम जिस तरह झरना गूँजता है जिस तरह झरना गूँजता है आत्मीय-आत्मविभोर बार-बार वैसे ही आकाश को गूँजते देखता हूँ हुगली नदी के गान में आनंदित झरने में आकाश में जो कुछ गूँजता है उस गूँज में तुम्हारी भी भाषा की गूँज सुनता हूँ घनीभूत अपनी इस यात्रा की...

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नित्यानंद गायेन की दो कविताएं

नित्यानंद गायेन   अगले वर्ष अगले वर्ष फिर निकलेगी झांकी राजपथ पर  भारत भाग्य विधाता  लेंगे सलामी  डिब्बों में सजाकर परोसे जाएंगे  विकास के आंकड़े शहीदों की विधवाओं को पदक थमाएं जाएंगे राष्ट्र अध्यक्षों के शूट की चमक और बढ़ जाएगी  जलती रहेगी अमर ज्योति इंडिया गेट पर  मूक खड़ी...

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मेरे काम के लोग

हेमन्त वशिष्ठ   यहां आबादी बहुत है… लेकिन किसी काम की नहीं… क्षत-विक्षत शरीर, छिन्न-भिन्न अंग वैसे भी किस काम आते हैं… उनका मकसद उनकी आत्माओं को छल चुका है वो पाक-पवित्र रूहें, जो मैने भेजी थी ज़्यादातर दूषित वापिस आ रही हैं खंडित यानी डैमेज़्ड उनकी रहने की वजह...

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कभी आओगे ख़्वाबों में

गीत मुहम्मद अब्यज ख़ान कभी आओगे ख्वाबों में कभी नींदें चुराओगे मुझे छुप छुप निहारोगे कभी बातें बनाओगे मेरे घर की गलियों में तुम चक्कर लगाओगे मेरी ख़ातिर तुम कितने बहाने बनाओगे कभी पूछोगे मुझको तुम कभी नज़रें बचाओगे पतंगों के बहाने से कभी कपड़े सुखाने के मुझे तुम देखने...

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जंगल ज़िन्दगी

कहानी नूर मुहम्मद नूर पिछले पांच दिनों के भयावह अंतर्द्वन्द्व से आज कहीं जाकर नसीम को मुक्ति मिली। सोमवार की दोपहर अपने दो साल के मटमैले चिथड़े पहने, बेटे को अपनी गोद में सुला रही, उस पागल जैसी औरत को देखने के बाद से, निरंतर पांच दिनों की लंबी मानसिक...

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नंदना पंकज की दो कविताएं

नंदना पंकज   ज्वार-भाटा चढ़ती हुई चाँदनी के साथ चिर-विरह को अभिशप्त समुद्र के हृदय की तरल वेदनाएं उबलने लगती हैं चाँद का गुरुत्व बढ़ा देता है मिलन की आतुरता और किसी विक्षिप्त प्रेमी की भाँति व्यग्र हो छटपटातीं हैं लहरें दहकते लपटों सी उछलतीं हैं टीस भरी लालसाएं प्रेयसी...

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स्मिता मृणाल की दो कविताएं

स्मिता मृणाल रेस्ट इन पीस प्रत्यूषा कितना आसान होता है झूठ के आवरण में सच को छुपा देना जाने कितने ही रहस्य कैद होते हैं इस सच और झूठ के बीच और इन रहस्यों की खोज में हम पाते हैं खुद को तर्क और वितर्क के दो अंतिम छोरों पर...